सोमवार, 29 जून 2009

भूखों मर गया संगीत का शहंशाह

शोर-शराबा संगीत के बेताज बादशाह माइकल जैक्‍सन इतना लोकप्रिय अपने कैरियर के दौर में नहीं हुए जितना की अपनी मौत के बाद होते जा रहे हैं। माइकल को भूल चुके लोग तथा नई पीढी के बच्‍चे इस बात को सुनकर बेहद परेशान हैं कि संगीत का बेताज बादशाह भूखों मर गया। अमर होने की चाहत जब इंसान करने लगता है तो वह कुदरत की दी हुई जिंदगी भी पूरी नहीं जी पाता। जो भी प्रक्रति के साथ खिलवाड करता है वह कहीं का नहीं रहता। माइकल ने अपनी सफलता हासिल करते ही सबसे पहले यही काम किया। चेहरे को बंदर के आकार का बनाने के लिए प्‍लास्टिक सर्जरी का सहारा लिया। अपना सेक्‍स चेंज करवाने का प्रयत्‍न किया। जिस तरह से जिंदगी माइकल पर हावी हो रही थी वह अंधविश्‍वास से घिरता जा रहा था। पंडितों की बातों पर उसका विश्‍वास जम रहा था। तांत्रिकों की बातें उसे रास आने लगी थीं। उसे संसार अपनी मुटठी में दिख रहा था। उसे लगता था कि वह वो सबकुछ कर सकता है जो इस जगत में कोई और नहीं कर सका। पर जब माइकल की मौत हुई तो वह चिल्‍ला भी नहीं पाया बस बडे आराम से मौत की आगोश में सो गया। पर इसके बाद पूरी दूनिया में तहलका मच गया। यह होना स्‍वा‍भाविक भी था क्‍योंकि जो माइकल सैकडों साल जीने की ख्‍वाहिश रखता था वह अपनी जिंदगी की हाफ सेंचुरी ही लगाने में सफल हो पाया। अगर माइकल को दवाओं का सहारा नहीं होता तो वह कई साल पूर्व ही इस दुनिया को अलविदा कह जाता। क्‍योंकि बहुत समय पहले ही उसके पापों का घडा भर चुका था।
माइकल जैक्सन की लीक पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चलता है कि महान पॉप गायक पिछले कुछ समय से कुछ नहीं खा रहे थे और हड्डियों का ढांचा मात्र रह गए थे और जिस समय उनकी मौत हुई, उनके पेट में केवल गोलियां थीं। दी सन द्वारा प्रकाशित पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, जैक्सन गंजा हो चुका था, उसके शरीर पर खरोंच के निशान थे और उसकी पसलियां टूटी हुई थीं। जैक्सन के कूल्हों, जांघों और कंधों पर सुइयों के घाव थे, जिनके बारे में कहा गया है कि ये उन मादक दर्दनिवारक इंजेक्शनों का परिणाम रहे होंगे जो सालों से उन्हें दिन में तीन बार लगाए जाते थे। अभी भी दुनिया के कोने में मौजूद माइकल के प्रशंसक उन्‍हें महान बनाने में जुटे हुए हैं। पर सच्‍चाई में माइकल महान नहीं हैं क्‍योंकि अगर ऐसा हुआ तो महानता की परिभाषा बदल जाएगी। विवादों से गहरा नाता रखने वाला माइकल कभी भी किसी का नहीं हुआ उसने जो कुछ किया वह अपने स्‍वार्थ के लिए। अपनी अय़याशियों के लिए पैसे पानी की तरह बहाए। आज जब माइकल मरा तो वह कर्ज के बोझ तले दबा हुआ था। मैं नहीं मानता माइकल के जाने से संगीत जगत को कोई क्षति हुई है। पर इस घटना से मुझे एक बात समझ में आ गई है कि आदमी जितना बडा होता जाता है अंधविश्‍वास उसकी सबसे बडी दोस्‍त बनती जाती है जो बाद में बर्बादी का कारण बनती है। ईश्‍वर है बस यही सच है कोई भी इस जगत में ऐसा नहीं है जो तंत्र मंत्र के सहारे आपका कुछ बिगाड सकता है। अगर तुम अपने अंदर के ईश्‍वर को नहीं पहचानोगे तो जिंदगी इस बिखर जाएगी कि उसे समेटना मुश्किल हो जाएगा। सबसे बडा सत्‍य यही है कि संगीत का बेताज बादशाह भूखों मर गया। मरने के बाद उसने दुनिया में कमाया तो वह बदनामी और बडा सा कर्ज। अगर पुराणों की बातों पर भरोसा किया जाए तो जैक्‍सन को गधा बनकर यह कर्ज उतारना ही पडेगा। यह संसार है जो यहां आया है वह जाएगा।

शुक्रवार, 26 जून 2009

अमेरिका की खुली चमचागिरी है न्‍यूयॉर्क

इरफान खान के इस मूवी के डायलॉग हमेशा सही बताने में लगे रहे कि अमेरिका कितना अच्‍छा देश है। बीच-बीच संवादों को संतुलित करने के लिए उन्‍होंने यह बात भी स्‍वीकार की अमेरिका ने कई बडी गलतियां की हैं। पर इसके अलावा इस मूवी में एक बात ही समझ में आई कि इस मूवी का निर्माण आदित्‍य ने सिर्फ यह बताने के लिए किया कि अमेरिका में वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद 12 सौ मुसलमानों पर एफबीआई ने जुर्म ढाए थे जिन पर सभी आरोप बाद में खारिज हो गए थे। यह ऐसी बात है जिसे इंटरनेट के माध्‍यम से हर कोई जानता है पर मूवी समाप्‍त होने पर यह संदेश दिखता है। इस मूवी में कहीं रोमांच दिखता हो यह याद नहीं आता क्‍योंकि सभी को पता था कि न्‍यूयॉर्क की एफबीआई बिल्डिंग को जान अब्राहम नहीं उडाएंगें। पर मुझे इस बात पर काफी गुस्‍सा आया कि जब जान यानी की समीर को गोली लगी तो निर्देशक कबीर खान साथ में कटरीना यानी की माया को क्‍यूं मरवा दिया। वो जिंदा रहती तो कम से कम दर्शक यह तो कह पाते चलो अच्‍छा हुआ नील नितिन मुकेश को उसका प्‍यार वापस मिल गया भले ही वह एक बच्‍चे के साथ मिला। पर मूवी के अंत में नील को ढेर सारे संघर्षों के बाद अपनी प्रेमिका का बच्‍चा मिलता है। इस मूवी को जिस वर्ग को ध्‍यान में रखकर बनाया गया है वह पढा लिखा तपका है इसलिए अंग्रेजी के संवादों की कमी नहीं है। हिंदी जानने वालों के लिए ट्रिकर का प्रयोग किया गया है पर वह उतना प्रभावशाली नहीं है। जान ने अपनी भूमिका को सजीव बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोडी है। नील और कटरीना की भूमिका औसत है। न्‍यूयार्क का कोई ऐसा संवाद नहीं जिस पर हंसी आती हो पर कहीं-कहीं हास्‍य के पुट डालने की कोशिश जरूर लगती है। उदाहरण के लिए जब इरफान नील को कुछ माइक्रोफोन देता है और नील उसे पटक देता है इस पर इरफान कहता है कि तुम इसे पटके बिना भी अपनी बात कह सकते थे। अगर संगीत की बात की जाए तो जुबान पर कोई गाना याद नहीं आता। जिस हाल में मैंने यह मूवी देखी वहां के दर्शक कलाकारों से अधिक प्रतिभाशाली थे। एक द्रष्‍य में जब इरफान को यह बताता है कि माया यानी की कटरीना की शादी हो गई है और उसके एक तीन साल का बच्‍चा भी है। इस पर दर्शकों की प्रतिक्रिया थी, साला मामू बन गया। अब मजे कर। कुल मिलाकर इस मूवी में ऐसा कुछ नहीं है जिसे दर्शक पसंद करें। अगर अमेरिका की बहादुरी देखनी है उसकी तारीफ सुननी है तो जरूर इस मूवी को देखें।

सोमवार, 22 जून 2009

गलत जवाब पर भी मिली नौकरी

15 नवंबर 2006 को दोपहर 1 बजे का समय था। मैंने एक तय अप्‍वांटमेंट के तहत अमर उजाला के संपादक शशि शेखर जी के दफतर में दस्‍तक दी। फार्मल परिचय के बाद सर ने पूछा जयशंकर प्रसाद ने कितने महाकाव्‍य लिखे थे ? मैंने जवाब दिया आठ महाकाव्‍य। इतना सुनते ही चेहरे का गंभीर भाव बनाते हुए सर ने कहा सामने वाले को तुम मूर्ख समझते हो। अगर तुमसे कोई सवाल कर रहा है इसका मतलब उसको जवाब जरूर पता होगा। अगर तुम ऐसे सवालों पर तुक्‍का लगाते हुए इसका मतलब हुआ कि तुम सामने वाले को मूर्ख समझते हो। जवाब न आना दूसरी बात है पर झूठ बोलना सबसे बुरी बात है अगर तुम्‍हें किसी सवाल का जवाब नहीं पता तो साफ मना कर सकते हो। वैसे भी नौकरी मिलने का मतलब ये नहीं होता कि आप पढना छोड दें। पुरानी चीजें दोहराने में कोई बुराई नहीं है। चलो कोई बात नहीं तुम्‍हें जब नौकरी ज्‍वाइन करनी होगी शंभूनाथ जी को बता देना वे तुम्‍हें तुम्‍हारा काम समझा देंगे। ये मेरा अमर उजाला का अनोखा साक्षात्‍कार है जिसमें मैंने किसी ऐसे व्‍यक्ति से मुलाकात की जिसे मैंने कई आदर्श पात्रों के रूप में किताबों में पढा था। इस घटना ने मुझे एक ऐसी सीख दी जिसे आजतक मैंने याद रखा है। मैंने पहली बार इंटरव्‍यू दिया और उसमें सवाल का गलत जवाब दिया और मुझे उस दिन परमानेंट नौकरी मिल गई।यहां पर मैं जागरण से आया था। जागरण में मैं पूरे ढाई साल रहा। वहां स्टिंगर था पर खुश था क्‍योंकि बहुत सारी बाईलाइन छपती थी।
अचानक वहां पर एक ऐसी घटना घटी जिसमें मेरे बास का ट्रांसफर हो गया। एक दूसरे बॉस का आगमन हुआ जो शक्‍ल से भले मालूम होते थे। पर नोएडा में ज्‍वाइन करते ही अपने असली रंग में आ गए। शराब से महोदय का गहरा नाता था। कार्यालय में उनके साथ काम करने वालों के लिए एक नया फार्मूला बनाया गया जिसमें हर सप्‍ताह एक बंदे को शराब का इंतजाम करना था। मुझे इससे परेशानी नहीं थी कि कोई शराब पीता है क्‍योंकि यह किसी की स्‍वतंत्रता हो सकती है। पर उनके इस नए प्रावधान का मैं जबरन शिकार होने लगा। मैं दारू नहीं पीता पर उनकी पार्टी में मुझे जबरदस्‍ती शिरकत करना था। मैंने इसका विरोध किया तो मेरी बीट चली गई। एक दिन महोदय ने मुझसे माफीनामा लिखने को कहा और मेरा धैर्य जवाब दे गया और मेरे मुंह से ऐसी बातें निकल गईं जिसे एक कार्यालय के लिए अच्‍छा नहीं समझा जाता। मैंने उनसे लडाई करके नौकरी छोड दी। उस शराबी ब्‍यूरो चीफ को अपना सबसे बडा दुश्‍मन समझने लगा। पर जब मुझे अमर उजाला में नौकरी मिली तो मुझे ऐसा लगा बुरा आदमी भी अगर कुछ करता है तो उससे भी आपका भला हो सकता है। आज मैं जिस मुकाम पर हूं इसमें एक शराबी का भी हाथ है मैं उस व्‍यक्ति को मिलकर धन्‍यवाद तो कहने नहीं जाउंगा पर हां उसके लिए मेरे दिल से कोटि-कोटि थैंक्‍स निकल रहा है।
मेरे कैरियर को अमर उजाला ने जो दिशा दी उसे मैं जिंदगी भर नहीं भूलूंगा क्‍योंकि यह ऐसा हिंदी संस्‍थान है जहां पर सच में काम करने का कारपोरेट माहौल है। अच्‍छा काम करो तो उसका फल जरूर मिलेगा। बास के पांव छूने की परंपरा नहीं है किसी को कोई समस्‍या हो तो वह सीधे शशि जी से संपर्क कर सकता है। जहां तक मैं जानता हूं संस्‍थान के 80 फीसदी लोग जब कुछ कहना होता है तो सीधे संपादक जी को मेल करते हैं। जून में सबका प्रमोशन हुआ तो मैंने सोचा मेरा पिफर कुछ नहीं हुआ। 8 को मैं अयोध्‍या से लौटा तो मेरी सेलरी का संदेश मेरे मोबाइल पर आया। सेलरी देखकर मैं चौंक गया और सीधे अपने बास के कमरे में गया। मैंने उनसे कहा सर गजब हो गया देखिए न मेरी सेलरी इस बार कितनी ज्‍यादा आई है। सर ने मुस्‍कराते हुए कहा अच्‍छा एक काम करो जितना ज्‍यादा आई है उसे मुझे दे दो। इतना कहकर वे हंसने लगे और बोले तुम्‍हारा प्रमोशन हो गया है साथ में इंक्रीमेंट भी मिला है। पर इसके साथ ही सर ने यह शर्त रख दी कि देखो तुम इसे किसी को बताना मत।
मैं सीनियर सब एडिटर/सीनियर रिपोर्टर बन गया और ये बात किसी को न बताउं ये मेरे लिए बहुत बडी बात थी। मैंने इस बात को कुछ वि‍श्‍वसनीय लोगों से शेयर किया। पर संस्‍थान में और किसी को पता नहीं चला। पर मैं इस बात को शब्‍दों में बयां नहीं कर सकता कि इस प्रमोशन ने मुझे कितनी खुशी दी। पर इस खुशी को सेलीब्रेट करने का मौका मुझे अधिक नहीं मिला। दूसरे दिन मुझे हिंदुस्‍तान से फोन आ गया जिसके लिए मैं कई महीनों से इंतजार कर रहा था। पर हिंदुस्‍तान को ज्‍वाइन करने से पहले मेरे साथ दो ऐसी घटनाएं घटीं जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता। पहली बार जब हिंदुस्‍तान में मैं टेस्‍ट देकर लौट रहा था तो फोन पर बात करते हुए यातायात पुलिस ने मुझे पकड लिया। पर पत्रकार होने के नाते उन्‍होंने रेड लाइट तोडने का 100 रुपये का जुर्माना लगाकर छोड दिया। इसके कुछ महीने बाद जब एचटी से फाइनल काल आई तो मैं भजनपुरा के तरफ से हिंदुस्‍तान की ओर जा रहा था गाडी की स्‍पीड 80 से भी अधिक थी। पता नहीं किन ख्‍यालों में खोया हुआ था वहां पहले से तैनात पुलिस की स्‍पीड चेक करने वाली वैन में मैं रिकार्ड हो गया। आगे ट्रैफिक पुलिस से मेरा सामना हुआ। उन्‍होंने मेरी गलती बताते हुए अपनी चालान काटने की किताब निकाली। मैंने बिना कोई प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त किए हुए अपनी गलती का खामियाजा भुगता और चालान के रूप में एक हजार रुपये भरे।
मुझे हिंदुस्‍तान से 20 को आफर लेटर मिला। मैंने 30 जून 2009 को ज्‍वाइनिंग डेट तय की और इसकी सूचना अपने सर को दे दी। मैंने नोटिस दिया पर मुझे तुरंत कार्यमुक्‍त कर दिया गया। 21 तारीख को मैं आखिरी बार अपने प्‍यारे संस्‍थान अमर उजाला में गया। वहां से जब मैं निकला तो ऐसा लगा जैसे मैं कुछ ऐसा छोड रहा हूं जिसकी कमी मुझे जरूर खलेगी। नौकरी छोड दी यहां के अच्‍छे लोगों का साथ छूट गया। दूसरे दिन घर में बैठा हुआ ऐसा लग रहा था जैसे मैंने कुछ खो दिया है। पर एक नए चैलेंज को स्‍वीकार करते हुए मैंने यह कठोर फैसला लिया। मैंने अपने कैरियर को संवारने के लिए यह कदम उठाया। बहुत से लोगों ने मेरे इस कदम की खुलकर सराहना की। अमर उजाला में मेरा बुरा चाहने वाला या सोचने वाला कोई भी शख्‍श नहीं था। इस संस्‍थान ने मुझे सौरव, गौरव और महेश जैसे दोस्‍त दिए। ये ऐसे लोग हैं जो हमेशा मेरे साथ खडे रहते हैं। मैं बहुत नया हूं नौकरियां बदलने का मेरा कोई शौक नहीं रहा है पर अब तक जहां तक मैंने काम किया उसमें अमर उजाला को अव्‍वल पाया हर मामले में। चाहे कोई कारपोरेट कल्‍चर की बात करे या कर्मचारियों के हितों की। पर अब मैं एक ऐसी जगह पहुंच गया हूं जहां पर आने का सपना मैं कई सालों से देख रहा था। हिंदुस्‍तान के लिए मैंने बहुत सारी फ्रीलांसिंग की है। पर अब यहां की एडीटोरियल टीम का हिस्‍सा बनकर खुश हूं।

बुधवार, 17 जून 2009

दो पवित्र आत्‍माओं का ठरक्‍कपन है आधुनिक बलात्‍कार

एकदिन मैं एक घर में बैठा हुआ था। जिसके यहां पर मैं गया हुआ था उनके यहां एक पांच साल का बच्‍चा था। एक खिलौने के लिए वह बुरी तरह से नाराज हो गया हाथ पैर चलाने लगा उसके पिता उसे बहलाने की कोशिश कर रहे थे पर वे उसे उठा भी नहीं पा रहे रहे थे। उसके पैर की चोट से उसके पिता जी के नाक से खून निकलने लगा। इस घटना से मुझे एक बात पर संदेह हुआ कि जब एक पांच साल का बच्‍चा कोई अकेला आदमी संभाल नहीं सकता तो ऐसे में पांच फुट से भी लंबी लडकियों का एक आदमी भला कैसे बलात्‍कार कर लेता है। आजकल अभिनेता शाइनी आहूजा बलात्‍कार के केश में फंसे हुए हैं। पर यह केस अगर सही से देखा जाए तो इससे सिर्फ शाइनी की चरित्रहीनता ही साबित हो सकती है न कि उन्‍हें बलात्‍कारी करार दिया जाएगा।
एक लडकी ही सहमति के बिना उसके साथ सिर्फ एक व्‍यक्ति जबरदस्‍ती नहीं कर सकता। बलात्‍कार पांच लोग मिलकर या पिफर दो लोग करें तो यह बात हजम होती है। आजकल पुरुषों से कंधा मिलाने के चक्‍कर में लडकियां पहले सहमति से किसी के साथ संबंध बनाती हैं पर उसमें डबल मजा करने के लिए लडकी होने का फायदा उठाकर उस व्‍यक्ति को फंसा देती हैं। अब चाहे मोनिका लिंविस्‍की या पिफर शाइनी की नौकरानी की ही क्‍यों न हो। अगर प्‍यार की बात की जाए तो इसे दो आत्‍माओं का मिलन कहा जाता है लेकिन अगर इसे इस केस में डिफाइन किया जाए तो इसे दो आत्‍माओं का ठरक्‍पन कहा जाएगा। जिसमें लडकियों की पवित्र आत्‍माएं पुरुषों की ठरक्‍कपन भावनाओं की बलि चढा देती हैं। यह सब नाम रोशन करने और पैसा कमाने का रोचक जरिया है जिसमें गंभीर दिलचस्‍पी लेकर हमारे मीडिया और कानून वाले इसे लोगों के सामने आदर्श के रूप में प्रस्‍तुत कर रहे हैं जिससे और लडकियां बलात्‍कार का नाम लेकर कुछ धन अर्जित कर सकें। जब भी कोई मुझे कहेगा कि एक आदमी ने बलात्‍कार किया मैं उसे कतई नहीं मानूंगा क्‍योंकि एक आदमी द्वारा किया गया बलात्‍कार दो आत्‍माओं का पवित्र ठरक्‍कपन है। इसमें इससे ज्‍यादा और कुछ नहीं है। बलात्‍कार उस समय होता है जब किसी अबोध मासूम बच्‍ची को कोई दरिंदा हवस का शिकार बनाता है या पिफर एक से अधिक लोग मिलकर किसी अबला की इज्‍जत लूटते हैं।

सोमवार, 25 मई 2009

हिम्‍मत है तो आस्ट्रिया में जाकर आग लगाओ

अमेरिका में एक हिंदू की हत्‍या कर दी गई, आस्‍ट्रेलिया में सिखों पर कहर बरपाया, आस्ट्रिया में झडप में एक सिख गुरू की मौत। इस खबर को सुनते ही हमारे प्‍यारे देशवासी अपने घरों से निकले ट्रेनें फूंक दीं। पटरियां उखाड दीं। कारों में आग लगा दिया। पुलिस की गाडियों को फूंक दिया। रास्‍ते जाम कर दिए। जितना हो सका अपने देश की प्रापर्टी को फूंक दिया जिससे बाहर देश के लोगों को पता चले कि अगर तुम हमारे आदमियों पर बुरी नजर डालोगे तो हम अपने देश को ऐसे ही बर्बाद करेंगे। आज सुबह पंजाब में जिस तरह से लोगों ने अपने देश की प्रापर्टी को नुकसान पहुंचाया इससे क्‍या उन सिख गुरू को न्याय मिल पाया जो इस घटना का शिकार हुए थे। अगर किसी में दम है तो यह काम जो आज भारत माता को जलाकर किया जा रहा है यही आस्ट्रिया में होना चाहिए था। पर वहां की खुंदक अपने देश पर उतारकर सिर्फ एक मूर्खता की मिशाल पेश कर रहे हैं हमारे देशवासी। बसें जल जाएंगी तो कल से लोगों को चलने में दिक्‍कत होगी। ट्रेनें नहीं रहेंगी तो यात्रा कैसे करोगे। शहर फूंक दोगे तो उसे व्‍यवस्थित कौन करवाएगा। आज आप जोश में आकर अपने देश को उजाड रहे हो कल जब पानी की कमी होगी, परिवहन के साधन नहीं होंगे, सडकें तालाब का रूप ले लेंगी। तो एक बार आप के दिल में सरकार के प्रति रोष पनपेगा और आप इसे सरकार के उपर थोपकर पिफर अपने ही देश को तोडोगे। मुझे लगता है अगर धर्म के नाम पर लोग सरकारी प्रापर्टी जो कि हमारी ही है उसको नुकसान पहुंचाना बंद कर दें तो हमें बहुत सी समस्‍याओं से निजात मिल जाएगी। आज जिस घटना पर पंजाब जल रहा है उसमें पंजाब का कोई दोष नहीं है दोषी तो वे हैं जो यह क्रत्‍य कर रहे हैं। इससे उन पवित्र संत रामानंद जी की आत्‍मा को भी ठेस लगेगी। क्‍योंकि कोई भी संत उग्रवाद का पाठ नहीं पढाता। भाई जब पंजाब की इसमें कोई गलती नहीं तो उसे बर्बाद क्‍यों कर रहे हो? अगर कुछ करना ही तो चलो आष्‍ट्रिया चलते हैं और उसका अस्तित्‍व मिटाते हैं क्‍योंकि वहां हमारे संत पर हमला हुआ है। पर किसी को भारत माता को नुकसान पहुंचाने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसा कोई भी दुनिया का मुल्‍क नहीं करता। अरे हम पर दुनिया हंस रही होगी और हमें पागल कह रही होगी कि देखो घटना कहीं घटी और आग कहीं और लग रही है। भाई अपने आप को संभालो और अपना देश बचा लो।
जय हिंद जय भारत

मंगलवार, 19 मई 2009

समर्थन ले लो समर्थन ले लो, बिना शर्त समर्थन ले लो

समर्थन ले लो समर्थन ले लो। फ्री में समर्थन ले लो। कैबिनेट में जगह भी मत दो मुझे मंत्री भी मत बनाओ पर समर्थन ले लो समर्थन लो। आजकल देश में समर्थन कुछ इस अंदाज में बिक रहा है जैसा कि उस सब्‍जीमंडी में सब्‍जी धेले के भाव बिकने लगती है जहां बरसात शुरू हो जाती है। यूपीए से कई दलों ने चुनाव पूर्व गठबंधन इसलिए नहीं किया क्‍योंकि उन्‍हें लगता था कि कांग्रेस सत्‍ता से बाहर होने जा रही है। पर सबको इसके उलट परिणाम मिला। कांग्रेस इतनी मजबूती के साथ लोगों के बीच आई कि उसे किसी से समर्थन मांगने की जरूरत ही नहीं है। अब ऐसे में कई छोटी पार्टियों को पांच साल बाहर रहने के सिवा और कोई चारा नहीं रह जाता। खासकरके लालू और मुलायम के लिए यह बनवास जैसा है क्‍योंकि उनकी सरकार प्रदेश में भी नहीं है। अब यह बनवास पांच साल तक विपक्ष में बैठकर काटना इन पार्टियों को गंवारा नहीं है। लालू यादव अब अपनी गलती स्‍वीकार रहे हैं और कह रहे हैं कि भाई याद करो मैंने पिछली यूपीए सरकार में कितनी अहम भूमिका निभाई ऐसे में कुछ तो आप हमारी इज्‍जत करो। ये वही लालू हैं जिन्‍होंने मुलायम और पासवान के साथ एक मंच पर खडे होकर कहा था कि कांग्रेस बाबरी मस्जिद तोडवाने की जिम्‍मेदार थी। इतने सालों की राजनी‍ति में पहली मर्तवा लालू के साथ ऐसा हो रहा है कि उन्‍हें कोई नहीं पूछ रहा है अब वे ही लालायित होकर कांग्रेस की तरफ आस भरी नजरों से देख रहे हैं। इन पार्टियों को छोडो जिन्‍होंने एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लडा था अब वे भी कांग्रेस में जाना चाहती हैं रालोद के सामने तो कांग्रेस ने विलय जैसी बडी शर्त रख दी है इसके बावजूद अभी भी अजीत कह रहे हैं कि समर्थन ले लो बिना शर्त समर्थन देने को हम तैयार हैं। वहीं दूसरी ओर मायावती ने भी अपना समर्थन केंद्र सरकार को देने का ऐलान कर दिया है। यह स्थिति देखकर हंसी आती है और उन नेताओं पर दया जो अपने लाभ के लिए चंद महीने पहले कांग्रेस का साथ छोड गए थे। आज सरकार बनाने जा रही कांग्रेस को इन सबकी जरूरत नहीं है बल्कि इन सबको कांग्रेस की जरूरत है। इसीलिए हर कोई आज कांग्रेस के नगर में जोर-जोर से आवाज लगाकर कह रहे हैं कि समर्थन ले लो, बिना शर्त समर्थन ले लो, हमें कुछ नहीं चाहिए बस हम आपकी पार्टी का साथ देना चाहते हैं। ऐसी मार कभी जनता ने नेताओं को नहीं दिया जैसा इस बार दिया है। जिसके चलते अब इन नेताओं को फेरी वाले की तरह आवाज लगाकर समर्थन बेंच रहे हैं।

शनिवार, 16 मई 2009

2009 की दो शामें भुलाए न भूलेंगी

15 मई तक आए एग्जिट पोल से परेशान बडी पार्टी के नेताओं ने छोटे दलों के नेताओं को पटाने के लिए दूर-दूर तक जाल बिखेरा। एनडीए ने माया से लेकर जयललिता तक से बात कर ली तो वहीं दूसरी ओर यूपीए ने लालू मुलायम और पासवान जैसे लोगों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की। इस जद्दोजहद में एक शाम गुजर गई और वह दूसरी सुबह आ गई जिसका सबको बेसब्री से इंतजार था। पर यह सुबह कुछ ऐसी घटी जिसमें यूपीए सबको भूल गया तो छोटी पार्टियों की जमानत जब्‍त हो गई। तीसरा मोर्चा चौथा मोर्चा और पांचवें मोर्चे जैसे कुकुरमुत्‍ते की तरह उगे इन मोर्चों की मिट्टी पलीत हो गई। एनडीए के पीएम इन वेटिंग आडवाणी का दिल इस कदर टूटा की उन्‍होंने राजनीति से संन्‍यास लेने का ही मन बना लिया। पर इस चुनाव में सबसे दिलचस्‍प कहानी बिहार में घटी। लालू यादव जो कि पूरी दुनिया में अपने हिलेरियस अदा के लिए जाने जाते हैं। को बिहार ने ऐसे नकारा कि महोदय अपनी भी एक सीट से हार गए। उनकी पार्टी के पास सिर्फ दो सीटें बचीं। अब कांग्रेस उनको पिफर से रेल मंत्री बनाएगी या नहीं यह कांग्रेस की दया पर निर्भर करता है। क्‍योंकि अब तो लालू के हाथ में कुछ नहीं रहा। लालू यादव ने रामविलास पासवान के साथ कुछ इस कहावत को चरितार्थ किया, हम तो डूबेंगे ही सनम तुम्‍हें भी ले डूबेंगे। पिछले साल पासवान के पास चार सांसदों की फौज थी पर इस बार तो पासवान जी ही संसद से आउट हो गए हैं उनकी पार्टी के पास सिर्फ अब पार्टी का नाम बचा है कोई सीट नहीं। महोदय अपनी भी सीट नहीं बचा सके। ये भी दो गुजरीं शामें जिनका जिक्र हमेशा इतिहास में किया जाएगा कि किस कदर जनता ने बामपंथियों के मुंह पर तमाचा मारकर एक पार्टी को जनाधार दे दिया। इस चुनाव की सबसे बडी खासियल बाहुबलियों का हारना रहा। डीपी यादव और अंसारी जैसे लोगों के मुंह पर जनता ने ऐसा तमाचा जडा है जिसकी चोट इन्‍हें कई जन्‍म तक नहीं भूलेगी। ये था जनता का फैसला जिसने कई बडबोलों के मुंह पर ताला लगा दिया है। अब तो मुझे लगता है कि लालू यादव जी किसी हास्‍य धारावाहिक में बैठकर चुटकुलों को जज करेंगे और पैसे कमाएंगे जैसा कि शेखर सुमन और सिद्धू अब तक करते आए हैं। पर बुरा ही क्‍या है राजनीति में अगर जनता ने इनके साथ ही यही व्‍यवहार जारी रखा है तो कुछ न कुछ तो करना ही पडेगा ना।

शनिवार, 9 मई 2009

आखिर ओवर स्‍पीडिंग क्‍यों करते हैं लोग

आज सुबह मुझे अपने दोस्‍त सौरव के यहां जाना था। वह दिल्‍ली के ज्‍वालानगर में रहता है। सुबह जल्‍दी जाकर जिम करके आया और तैयार हो गया। बाइक उठाकर सुबह साढे आठ बजे हौजखास से निकला। रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा भीड नहीं थी आधे घंटे में मैं आईटीओ पुल क्रास करके लक्ष्‍मी नगर के मोड पर पहुंचा जहां पर कुछ निर्माण कार्य की वजह से रास्‍ता परिवर्तित किया गया है। इसके चलते एक खतरनाक मोड लक्ष्‍मीनगर में प्रवेश से पहले बन गया है। मेरे सामने से एक पल्‍सर बाइक पर सवार दो युवक तेजी के साथ मोड पर आए जिनकी स्‍पीड 90 से भी उपर रही होगी सडक के साथ डिवाइडर पर टकरा गए। उसमें से एक व्‍यक्ति की मौके पर ही मौत हो गई जबकि दूसरे युवक को पुलिस हास्पिटल ले गई उसकी हालत बहुत ही नाजुक थी। यह दर्दनाक हादसा सुबह-सुबह देखकर दिल द्रवित हो उठा। उन दोनों युवकों ने हेलमेट नहीं पहना था मुझे ऐसा लगा अगर आज इन भाइयों ने हेलमेट पहना होता तो शायद इनकी जिंदगी बच जाती। इतना कुछ नियम बनने के बाद भी लोग पता नहीं क्‍यों ओवर स्‍पीडिंग करके अपनी मौत को दावत दे रहे हैं यह बात समझ से बाहर है। आखिरकार अपने लिए न सही अपने परिवार के लिए तो ऐसा नहीं करना चाहिए। भले ही इस घटना के कुछ घंटे बाद सबकुछ सामान्‍य हो गया उस रोड पर यातायात गुलजार हो गया पर जिस घर का चिराग भरी जवानी में बुझ गया उस पर क्‍या गुजरी होगी यह सोचने वाली बात है। आजकल हम लोगों को हर तरह से जागरूक बनाने की बात करते हैं ऐसे मैं लोगों से एक और बात के लिए गुजारिश करना चाहूंगा कि ओवरस्‍पी‍डिंग कभी भी किसी के लिए अच्‍छी नहीं होती अपने अमूल्‍य जीवन के लिए ऐसा मत कीजिए। मैं पूरे देश को इस माध्‍यम से यह जागरूकता फैलाना चाहता हूं अगर इस बात को सिर्फ एक ही युवा मान ले तो मेरा प्रयास सार्थक हो जाएगा। आखिरकार जिंदगी के इस सुहाने सफर को हादसे का सफर बनाने का हमारा क्‍या अधिकार है। आइए प्रण करें हम अपने जीवन को अमूल्‍य समझेंगे और ओवर स्‍पीडिंग से हमेशा बचेंगे। इसके साथ ही मैं इस घटना के शिकार हुए युवकों के परिवार के प्रति संवेदना व्‍यक्‍त करते हुए यही गुजारिश करुंगा कि इस मुश्किल घडी में भगवान उनको धैर्य दे।

गुरुवार, 7 मई 2009

इसलिए लोग बन जाते हैं पप्‍पू

रात में सोते समय मैंने अपना मतदाता पहचान पत्र निकालकर बाहर रख दिया क्‍योंकि मुझे ब्रहस्‍पतिवार की सुबह वोट देने जाना था। सुबह होते ही बडे उत्‍साह के साथ पोलिंग बूथ पर पहुंचा पर उन लोगों ने मुझे निराश कर दिया। क्‍योंकि ऐन वक्‍त पर भाइयों ने बूथ ही बदल दिया एमसीडी स्‍कूल के बजाय पोंलिंग बूथ लक्ष्‍मण पब्लिक स्‍कूल में भेजा। बहुत से लोगों को जिसे पहले एमसीडी स्‍कूल वाला पता बताया गया था सब वहीं पहुंचे जिसके बाद सबको लक्ष्‍मण पब्लिक स्‍कूल भेजा गया। बहुत से लोग तो नाराज होकर पप्‍पू बन गए और फैसला कर लिया कि वोट नहीं करेंगे। यहां की दुर्व्‍यवस्‍था देखकर मुझे लगा कि बहुत सारे पोलिंग स्‍टेशनों पर सरकार के तरफ से बरती जाने वाली इन अनियमितताओं के चलते बहुत से लोग वोट नहीं करते। यहां पर मुझे लगा कि पप्‍पू वाले विज्ञापनों के साथ-साथ सरकार को इन चीजों पर भी विशेष ध्‍यान देना चाहिए। जिससे बहुत से लोगों को वोट करने में सहूलियत मिल सके। पर एक बात इस बार मुझे बहुत अच्‍छी लगी मैंने वोटिंग करते हुए बहुत से ऐसे लोगों को देखा जो कि वोटिंग प्रणाली में इसके पहले भरोसा नहीं करते। एक एलीट क्‍लास वोट करने के लिए निकली। मेरे एक दोस्‍त का फोन आया मैंने उससे पूछा भाई कहां उसका जवाब मिला वोट करने के लिए लाइन में लगा हूं एक घंटे में फ्री हो जाएगा। मेरे इस दोस्‍त को इस बात की खुशी थी कि वह पहली बार वोट कर रहा है। इससे पता चलता है कि लोग अब पप्‍पू बनने से कितना दूर रहना चाहते हैं। वैसे पप्‍पू कहलाने से तो अच्‍छा ही है कि हम अपने मता‍धिकार का प्रयोग कर दिया करें। आखिर ये देश तो हमारा ही है घटिया लोग यहां आएंगे तो इससे देश का बंटाधार हो जाएगा। हम अपने अधिकार का प्रयोग करते रहे तो एकदिन जिन नेताओं का हम सपना देखते हैं वैसे नेताओं का निर्माण शुरू हो जाएगा। अभी तो यह शुरुआत है जिसमें सभी को अपना योगदान देने की जरूरत है। अंत में यही कह सकता हूं कि पप्‍पू वोट कर सकता है।

शनिवार, 2 मई 2009

आओ मिलकर खरीदें कोलकाता नाइट राइडर्स


कोलकाता नाइट राइडर्स के मालिक शाहरुख खान अपनी टीम केलचर प्रदर्शन से इस कदर आहत हैं कि अब वे अपनी इस प्यारी टीम को बेंचने का सपना संजोने लगे हैं। हो सकता है कि कुछ दिनों में शाहरुख अपनी टीम को बेंचने के लिए बाजार में आ भी जाएं तो मैंने सोचा कि क्यों न शाहरुख की इस टीम को हम खरीद लें। मैंने यहां पर हम इसलिए कहा क्योंकि मेरे अकेले की बस की 300 करोड़ की टीम खरीदना तो है नहीं इसलिए सोचा चलो हम सभी ब्लागर बंधु मिलकर अपनी एक आईपीएल की टीम खरीद ही लेते हैं।
देखो भाई हमारे पास पैसे भले ही कम हैं लेकिन अगर एक साथ मिलकर हजारों लोग पैसा लगाएंगे तो एक आईपीएल की टीम को हम आसानी से खरीद सकते हैं। इसके बाद हम अपनी टीम मैदान में उतारेंगे मुझे पता है कि किंग खान की यही हारी हुई टीम हमारे लिए मैच जीतकर ढ़ेर सारा मुनाफा कमाएगी जिसे हम बराबर-बराबर बांटेंगे। मैं चाहता हूं कि आटिüकल को आप गंभीरता से लें मेरी इस बात में दम है यह मानकर आप सब मेरा साथ दें। साथियों अगर एक बार मेरा साथ आपने दिया तो एक पूरी दुनिया में हम कम पैसे वाले लोग एकता का परिचय देकर यह बता देंगे कि देखो एकता में कितनी शçक्त है। अगर आप हमारे साथ हैं तो बस हां कीजिए और एक पोस्ट के जरिए अपना पता और फोन नंबर हम तक पहुंचाइए एक लीगल प्रक्रिया के तहत मैं वादा करता हूं कि शाहरुख की कोलकाता नाइट राइडर्स को हम खरीदने के लिए कदम उठाएंगे। अभी मुझे आपसे पैसे से अधिक सहयोग की जरूरत है। हो सकता है कि आपको मेरी ये बात सिर्फ कोरी कल्पना ही नजर आ रही हो। पर जिस तरह से आप एक कंपनी में शेयर खरीदने के लिए हजारों लाखों रुपए लगाते हैं तो अपनी टीम के लिए कुछ सौ रुपये अपने जेब से नहीं निकालेंगे। अभी आप हां करें पैसा नहीं देना है। अगर एकता में शçक्त नजर आई तो आम आदमी की टीम आईपीएल में खेलेगी। जिसका फायदा हम सबको होगा और हम गर्व से कह सकेंगे कि हम मध्यमवगीüय लोग कितनी ताकत रखते हैं। तो आइए मेरे सुर में सुर मिलाइए और आईपीएल की एक टीम खरीदने के लिए हाथ बढ़ाइए। यह मेरा नहीं आम आदमी का सपना है जिसे साकार करने में सिर्फ आम आदमी ही मददगार साबित हो सकता है। देर मत कीजिए अपना नाम फोन नंबर और ईमेल केसाथ हमें मेल कीजिए या फिर कमेंट में पोस्ट कीजिए। मेरा पता है adwivedi09@gmail.com

शनिवार, 18 अप्रैल 2009

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

जनरैल ने जो किया वो एकदम सही किया

जनरैल सिंह ने जो किया वह एकदम सही है। सिखों की बात कोई सुनने का प्रयास तो कर नहीं रहा है। सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर जैसे खुले भेçड़ये समाज में घूम रहे हैं जिन पर सरकार का कानून भी नहीं चलता। ऐसे में सिर्फ एक रास्ता बचता था जो कि जनरैल ने अपनाया। हो सकता है कि यह उनकी सोची समझी चाल हो पर कुछ भी हो यह एक ऐसे जायज आक्रोश का नतीजा है जिसे पूरे देश ने देखा। यह बात दूसरी है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया केटुटपुजिए पत्रकारों ने उन्हें किसी अखबार का तथाकथित पत्रकार कहा जो कि एक वरिष्ठ पत्रकार केमर्यादा के खिलाफ है। इलेक्ट्रानिक मीडिया केछिछोरे पत्रकार जिनकी समाज में सिर्फ एक हास्यास्पद इमेज है उन्होंने इसे अनैतिकता भरा करार दिया जबकि वे अपनी गिरेबान झांकना भूल गए कि वे कितने नैतिक हैं। गृहमंत्री पर जनरैल ने जूता नहीं मारा बल्कि उनकेऊपर जूता उछाला था जिसमें उनका मकसद सिर्फ एक संदेश देना था न कि उनको मारना इसलिए किसी भी कीमत पर इसे अनैतिक नहीं कहा जाना चाहिए। हो सकता है कल जागरण उन्हें नौकरी से निकाल दे क्योंकि वह अखबार अपनी साख पर आंच नहीं आने देना चाहता पर जो किसी का जज्बा था वह खुलकर सामने आ चुका है। मुझे नहीं लगता कि जनरैल ने हीरो बनने के लिए यह सब किया है यह एक व्यçक्त की त्वरित प्रतिक्रिया थी जो कि गुस्से के रूप में निकली है इसका समान होना चाहिए तथा इस पर हर किसी को गंभीरता से विमर्श करना चाहिए बजाय कि जनरैल की निंदा करने के।

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

अगर आप वोट नहीं दे रहे हैं तो सो रहे हैं


मैंने दिल्ली में संपन्न हुए कुछ माह पूर्व विधान सभा चुनावों के लिए एक बुजुर्ग महिला से कहा,`चलो आज मैं आपको वोट दिलवाकर लाता हूं।` महिला ने जवाब दिया,`बेटा आई हैव नो इंट्रेस्ट इन वोटिंग, बीकाज आई नो आल लीडर्स आर कोरप्ट। सो व्हाई आई शुड गो देयर टू वेस्ट माई टाइम।` बुजुर्ग महिला की ये बातें सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। वे एक अच्छे परिवार से संबंध रखती हैं उनके पति आईएस आफीसर थे दुनिया के न जाने कितने देशों की वे सैर कर चुकी हैं। पर उनका वोटिंग के प्रति रवैया देखकर मुझे बहुत बुरा लगा। लोक सभा चुनावों को लेकर हर नेता न जाने कहां-कहां चुनाव प्रचार में जा रहे हैं। वोटरों को रिझाने के लिए न जाने कौन-कौन से हथकंडे अपना रहे हैं। आपको एक बात जानकर हैरानी होगी जो लोग इन नेताओं का भविष्य तय करते हैं उसमें से अधिकतर लोग अशिक्षित या गंवार हैं। किसी ने कहा हम मंदिर बनवा देंगे तो उनका भगवान प्रेम जग गया। किसी ने कहा हम तुहें आरक्षण दिलवाएंगे तो वोटर उधर चला गया। बहुत से वोटर जो खामोश रहते हैं उनको दारू की जरूरत होती है ऐसे अधिकतर वोटर महानगरों के झुग्गी झोपडियों का हिस्सा हैं। अब आप ही सोचिए सरकार किसने बनाया? जवाब मिलेगा सरकार उसने बनाया जिसे कोई फैसला लेने का सलीखा नहीं बस थोड़े से लाभ के लिए वे पार्टियों के साथ हो लिए। माना हर तरफ भ्रष्ट नेता हैं पर आप नजर दौड़ाएं तो उसमें से एक निर्दलीय प्रत्यासी भी आपको लिस्ट में जरूर मिलेगा जिसकी इमानदारी का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि वह करोड़ों रुपये चुनाव अभियान पर नहीं फूंक रहा है। आप अगर वोट देंगे तो बड़े नेताओं को उनकी औकात समझ में आ जाएगी। अगर आप सिर्फ ये सोचकर घर में बैठे हैं कि सब भ्रष्ट हैं मैं किसको वोट दूं तो इसका मतलब है कि आप सो रहे ऐसे निर्जीव प्राणी हैं जिन्हें अपने आसपास का माहौल अच्छा करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। आप निकम्मे और डरपोक इंसान हैं जिसमें कोई फैसला करने की हिम्मत नहीं है। भाई मत दो भ्रष्ट आदमी को वोट पर वोट जरूर दो कम से एक बार देकर तो देखो इस राजनीति की कितनी अहम कड़ी हैं इसका अंदाजा आपको लग जाएगा। मत बनाओ भ्रष्ट नेता अपने में से किसी को निकालो जो इमानदार हो उसे वोट दो पर यह पुण्य का काम जरूर करो। देश के हर युवक की यह जिम्मेदारी है कि वह मताधिकार को अपने आने वाली पीढ़ी में बोझ की तरह नहीं बल्कि एक संस्कार केरूप में ढ़ाले जिससे मताधिकार को लोग अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझें। यह मेरा एक अभियान है उम्मीद करता हूं इसके माध्यम से आप एक जागरूक समाज को बनाने में अहम रोल निभाएंगे। तो आइए मेरे साथ और प्रण कीजिए की वोट देना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम इसे देखकर रहेंगे।

मंगलवार, 31 मार्च 2009

ये वही शमशाद बेगम हैं


तेरी महफिल में किस्मत आजमाकर हम भी देखेंगे...., सइयां दिल में आना रे..., बूझ मेरा क्या नाम रे...., मेरे पिया गए रंगून किया है वहां टेलीफून...., एक दो तीन आज मौसम है रंगीन...., बूझ मेरा क्या नाम रे..., कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना....। इन गीतों केये अमर बोल पढ़कर आपने यह अंदाजा लगा लिया होगा कि मैं किसकी बात कर रहा हूं। हां आप एकदम सही सोच रहे हैं मैं बात कर रहा हूं महान गायिका शमशाद बेगम की। जैसे ही इन गीतों को मैं सुनता हूं मुझे उनके बारे में याल आने लगता है। अचानक आज(31 मार्च 2009) जब मैंने अपने आफिस में न्यूज प्रो आन करकेतस्वीरें चेक करनी शुरू की तो मुझे शमशाद बेगम की व्हील चेयर पर बैठे पुरस्कार लेते हुए एक तस्वीर दिखाई दी। इस तस्वीर को देखकर मैं खुश हो गया क्योंकि मैं इस गायिका के बारे मे न जाने कितने लोगों से सवाल कर चुका हूं पर किसी ने भी मुझे उनकेबारे में कोई जानकारी नहीं दी। मैं कई बार मुंबई गया और इस महान गायिका का साक्षात्कार करना चाहा पर मुझे कोई क्लू नहीं मिला। पर आज इस गायिका को रास्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल के हाथों समानित होते देखना काफी अच्छा लगा। शमशाद बेगम को 2009 का पद्म भूषण समान दिया गया है। मैं ऐसे बहुत से पुराने कलाकारों के बारे में जानने की वाहिश रखता हूं जो अभी इस दुनिया मे हैं पर मुझे लगता है कि बहुत से कलाकार धीरे-धीरे गुमनामी केअंधेरे में खो गए हैं। पर ये जानकर अच्छा लगा कि चलो सरकार अभी इस महान गायिका को भूली नहीं है। मुझे सबसे अधिक उस समय लगा जब 2007 में महान भजन गायक श्री हरिओम शरण जी का निधन हो गया उनकी इस खबर का पता भी नहींं चला। अखबारों ने उनकी सिंगल कालम खबर तक नहीं छापी न ही टेलीवीजन चैनलों ने उसे कवर किया। पर हां किसी भलेमानुष ने उनका 5 सेकंड का वीडियो अंतिम यात्रा का यू ट्यूब पर जरूर पोस्ट कर दिया जिससे बहुत से लोगों को धीरे-धीरे यह पता चल रहा है कि एक हरिओम जी अब हमारे बीच नहीं रहे। आखिर कलाकारों के प्रति ऐसी उदासीनता क्यों?

रविवार, 22 मार्च 2009

एक थी जेड गुडी.....


रियालिटी टीवी शो कलाकार के रूप में प्रसिद्ध पाने जेड गुडी को मौत की सच्चाई का आभास उस समय हुआ जब उन्हें पता चला कि वह कैंसर से जूझ रही हैं। पर गुडी ने अपनी बीमारी के दौरान वह सबकुछ जी लिया जिसे वह चाहती थीं। हर किसी की तरह वह मरना नहीं चाहती थीं पर मौत थी कि वह उनसे अपना रिश्ता बनाने को बेकरार थी। मरना हर किसी को है यह सच्चाई है पर मौत जब बताकर आती है तो वह कितनी कारुणिक होती है उसका अंदाजा गुडी की मौत को देखकर लगाया जा सकता है। गुडी की पंक्तियाँ जो उन्होंने अपने मौत के लिए कहीं थीं वह लोग एक सूक्ति बचन के रूप में हमेशा याद करेंगे। गुडी ने मरने से पहले कहा,`इतने कम उम्र में मर रही हूं इसका मुझे अफसोस है पर कम जिंदगी में मैंने इतना कुछ पा लिया इसका मुझे गर्व है।' मरने से पहले गुडी ने शादी रचाई, जिसके लिए बुरा सोचा तथा जिससे लड़ाई की थी उन सभी से माफी मांगकर सभी के दिलों पर छा गईं। शिल्पा के साथ उन्होंने जो किया था उसके लिए चलकर भारत आईं और यहां के हिंदी के एक शो में पूरे भारत को अपना सकारात्मक पहलू दिखाना चाहती थीं। पर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था और बिग बॉस उनकी जिंदगी का आखिरी रियालिटी शो बन गया। बिग बॉस का बुलावा आया तो गुडी कंफेशन रूप में गईं पर वह बुलावा बिग बॉस का नहीं बल्कि भगवान का था जिसने गुडी को चेतावनी दे दी कि अब तुम्हारे पास कुछ महीने बचे हैं जितना जीना है जी लो। शायद गुडी की अंतर्रात्मा ने उसे बता दिया था कि अब उसकी कहानी में सिर्फ एक दुखद अंत के सिवा कुछ और नहीं है। गुडी ने एक मां का रोल निभाते हुए बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने का प्रयास करती रहीं। जब डाक्टरों ने कहा कि उनकी जिंदगी में अब सिर्फ कुछ घंटे शेष हैं तो वह अस्पताल से अपने घर चली गईं और वहीं पर अंतिम सांस ली। खबरों के मुताबिक अपनी अंतिम सांस लेने से पहले तक गुडी अपने बच्चों से बात करती रहीं। इसी बीच उनकी सांसे रुक गईं और माहौल आंसुओं में डूब गया। गुडी के प्रवक्ता मैक्स ने इस खबर की पुष्टि की। दो बच्चों की मां 27 साल की गुडी ने दक्षिणी इंग्लैंड में स्थित अपशायर के अपने पैत्रिक गांव में अंतिम सांस ली। अंतिम समय में उनके पति जैक ट्वीड, मां जैकी बडेन और पारिवारिक दोस्त केविन उनके साथ थे। गुडी की मां ने कहा,`मेरी खूबसूरत बेटी हमेशा के लिए शो गई।' फोर्ड ने कहा कि यह कितना विचित्र संयोग है कि गुडी की मौत `मदर्स डें के दिन हुई। एक मां के तौर पर गुडी ने अपने दो बच्चों-पांच साल के बॉबी और चार साल के फ्रेडी के बेहतर भविष्य के लिए अपनी शादी के लाइव प्रसारण तथा अपने परिवार के चित्रों के प्रकाशन के लिए मीडिया के साथ लाखों डॉलर का करार किया था। फोर्ड ने कहा, ``मेरे हिसाब से गुडी को मजबूत दिल वाली युवा लड़की के तौर पर याद किया जाएगा। वह बहुत बहादुर थीं। उन्होंने मौत का ठीक उसी तरह सामना किया, जिस तरह उन्होंने अपना बहादुरी भरा जीवन जिया था।' इसी के साथ गुडी और टीवी के बीच जो अटूट रिश्ता बना था, वह उनकी मौत तक कायम रहा। रिएलिटी शो कार्यक्रमों के माध्यम से लोकप्रियता हासिल करने के बाद गुडी ने अपने साथी कलाकार जेफ बैरिजर से शादी की। दो बच्चों की मां गुडी ने कई फिटनेस डीवीडी जारी किए। उन्होंने न सिर्फ अपना सैलून खोला, बल्कि अपनी जीवनी-`जेड-माइ ऑटोग्राफीं भी लिखी। उनकी जीवनी भी प्रकाशित हुई थी। इसके बाद गुडी ने अपने नाम पर परफ्यूम जारी किया। उन्होंने इसे `शश..जेड गुडीं नाम दिया। वर्ष 2007 में गुडी अपने करियर के सबसे बड़े विवाद में उलझीं, जब उन्होंने `सेलीब्रेटी बिग ब्रदरं कार्यक्रम के दौरान शिल्पा के खिलाफ नस्लीय टिप्पणी की थी।इसके बाद हालांकि गुडी ने शिल्पा के साथ संबंध सुधारने के कई प्रयास किए। भारत जाकर गरीब बच्चों की मदद करना उनके इसी प्रयास के तहत उठाया गया एक कदम था। पिछले साल वह `बिग बॉसं कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए भारत गई थीं लेकिन कैंसर का पता चलने के बाद वह इलाज के लिए स्वदेश लौट आई थीं। यह उनके करियर का अंतिम रिएलिटी कार्यक्रम था। भारत में रहने के दौरान गुडी ने हिंदी सीखने के अलावा भारतीय नृत्य शैली सीखे की कोशिश की। `बिग बॉसं कार्यक्रम के दौरान उन्हें `गुडिया की संज्ञा दी गई थी। पिछले महीने ही गुडी ने अपने बचपन के प्रेमी जैक ट्वीड से शादी रचाई थी।

शनिवार, 14 मार्च 2009

बुढ़ापे का प्यार ठरक्पन नहीं है क्या???

आज(शनिवार 14 मार्च) जब मैंने अपना जीमेल का अकाउंट लागिन किया तो उसमें एक बड़े भाई केचैट स्टेटस में कुछ इस तरह की लाइनें नजर आ रही थीं(मेरे टूटे हुए दिल से, कोई ये आज तो पूछे कि तेरा हाल क्या है, कि तेरा हाल क्या है...)। मैंने उनको बोला भाई इस उम्र में आपका ये हाल किसने किया? इस पर उन्होंने जवाब दिया कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती। भाई साहब शादी शुदा हैं उनको मैं करीब से जानता हूं लड़कियों में कोई खास दिलचस्पी नहीं रखते फिर भी मेरे से इस बात पर उलझ पड़े कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती। आपने अक्सर इस वाक्य को सैकड़ों अधेड़ या फिर बुजुर्ग लोगों के मुंह से सुन रखा होगा। मैंने जवाब दिया नहीं प्यार की उम्र होती है कि अगर सही समय में 25, 30 साल की अवस्था तक आपको प्यार नहीं हुआ और इसकेबाद आप प्यार सिर्फ ये बात सोचकर करना चाहते हो कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती तो मुझे ये गलत लगता है। मेरा मानना है कि एक उम्र के बाद होने वाला प्यार सिर्फ ठरक्पन है। अब उदाहरण के तौर पर कई नामों को गिनाया जा सकता है पर मैं मौजूदा परिप्रेक्ष्य में चांद मोहमद और फिजा मोहमद केठरकी प्यार की ही बात यहां पर करूंगा। प्यार की उम्र होती है यह बात इनकी ऊलजुलूल कहानी से पता चलता है। आफिस में एक लड़की अपने बूढ़े या अधेड़ बास से सिर्फ प्रमोशन केलिए दोस्ती करती है। हिंदी मीडिया में इसे हर जगह कोई भी देख सकता है लड़की देखी बास की सारी जवानी की तमन्नाएं जवां हो गईं। कोई उनका जानने वाला मिला तो चाय केसमय पर यह बात भी कहना नहीं भूले कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती। घर में उसी उम्र की लड़की है जिससे महोदय प्यार की पीगें लड़ाने की कोशिश कर रहे होते हैं। जो लड़कियां समझौतरा नहीं करतीं वे या तो संस्थान से विदा हो जाती हैं या फिर उन्हें बदनाम करके निकाल दिया जाता है। ये सिर्फ इसलिए कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती। मैं दुनिया का सबसे बड़ा ठरकी आदमी सलमान रुश्दी को मानता हूं उनकेसाहित्य में क्या दम है सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ना चाहता कि जिसका आचरण इतना घिनौना है तो उस व्यçक्त की लेखन शैली कितनी घटिया होगी। `प्यार की कोई उम्र नहीं होती´ इस वाक्य केनाम पर प्यार को बदनाम करने वालों की दुनिया में कमी नहीं है। पर आपको एक चीज बता दूं ये निशŽद वाला प्यार सिर्फ उसी समय साकार रूप लेता है जब बूढ़ा बंदा पैसे वाला होता है या फिर उसके हाथ में पावर होती है। इस उदाहरण में चाहे सलमान रुश्दी को देख लो या फिर मटुक नाथ या चांद मोहमद की उदाहरण ले लो। ऐसे में मैं आप से जानना चाहता हूं कि क्या सच में प्यार की कोई उम्र नहीं होती? क्या यह सही है जिसे एक बुजुर्ग व्यçक्त को अपनी बेटी वाला प्यार देना चाहिए वह उससे पत्नी की तरह व्यवहार करना चाहता है। मेरे बातचीत के बीच में भाई साहब ने खफा होकर कहा राधा-कृष्ण की शादी नहीं हुई थी। पर वे एक दूसरे से प्यार करते थे उनकी इस बात पर मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि कृष्ण भगवान ने इसके अलावा कई और बड़े काम किए थे जिसमें कंस के सहित ढेरों राक्षसों का बध शामिल है। अगर हम उनकेइस आचरण को नहीं अपना सकते तो बुरे आचरण पर ध्यान केंद्रित क्यों करते हैं। मैंने तो लिख दिया कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती यह सही है या गलत इस पर मेरी यह राय है। अब आप बताएं कि आपको क्या लगता है।

सोमवार, 9 मार्च 2009

अयोध्या के विकास की अनदेखी क्यों?

अयोध्या के विकास की अनदेखी क्यों?
अमित द्विवेदी
अगर वेदों पुराणों की बातों पर आस्था रखते हुए भरोसा किया जाए तो अयोध्या भगवान राम की जन्मस्थली है। यह उत्तर प्रदेश के अन्य धार्मिक शहरों मथुरा, वृंदावन वाराणसी और इलाहाबाद के तरह ही एक आस्था की नगरी है। पर अब इस शहर को लोग सिर्फ विवादित शहर के रूप में जानते हैं। भाजपा जब कभी मौका मिलता है राम मंदिर निर्माण की बात करकेअयोध्या का नाम कुछ दिनों केलिए सुर्खियों में ला देता है। अन्य पार्टियां इससे अपने जनाधार को मजबूत बनाए रखने के लिए इसे भाजपा का घर समझकर अपनी दूरी बनाकर रखती हैं। इसकेचलते इस शहर का विकास अवरुद्घ हो गया है। दो दशक पहले जहां यह शहर धर्मनिरपेक्षता की मिसाल बना हुआ था वह आज अपने उद्घार केलिए तरस रहा है। पांच हजार से भी अधिक मंदिरों वाले इस अद्ïभुत शहर में इन विवादों केचलते न पर्यटक आना पसंद करते हैं न ही प्रदेश सरकार इसकेविकास को जरूरी समझती है। मैंने इस शहर को बहुत करीब से देखा है। बीस साल पहले अयोध्या के राम की पैड़ी आसपास केशहरों में एक रमणीक स्थल के रूप में वि यात थी। यहां पर लोग दूर-दूर से तैरने व जल क्रीड़ा करने के लिए आते थे। सरयू तट से सटी इस पैड़ी केपार्कों की हरी-भरी घासें और रंग बिरंगी लाइटों से इंद्रधनुषी छटा बिखेरते फव्वारे लोगों का मन मोह लेते थे। उस समय शाम होते ही यहां का नजारा मेले में तब्दील हो जाता था।पर अब यहां का माहौल बदल चुका है। इस पैड़ी से अब सिर्फ बदबू आती है और लोग अपने घरों के कूड़ेदान केरूप में इसका इस्तेमाल करते हैं। हर किसी को लगता है कि यहां केलोग राम मंदिर बनवाने केपक्ष में हैं। पर ऐसा नहींं है यहां केलोग शांति और स्वच्छता चाहते हैं। पूरे देश की तरह यहां पर मुस्लिम आबादी केसाथ-साथ कई धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। इस शहर केभाईचारे को अगर उदाहरण के रूप में देखा जाए तो इससे बड़ा धर्मनिरपेक्ष शहर कोई पूरी दुनिया में नहीं देखने को मिलेगा। तुलसी की माला, भगवान राम की तस्वीरें, धार्मिक कैसेटें और सीडी तथा चंदन की लकड़ी बेंचकर ना जाने कितने मुस्लिम परिवार यहां पर अपनी रोजी रोटी कमा रहे हैं। अब इन लोगों से अगर शहर केसाधुओं और वहां की जनता को परेशानी नहीं है तो फिर ये पार्टियां इस शहर के पारिवारिक माहौल को खराब करने की कोशिश क्यों करती हैं? यह बात मुझे आज तक समझ में नहीं आई। मैं नहीं कहता कि यहां पर राम मंदिर बने या फिर मस्जिद बने। पर अगर इस शहर की मान्यता के अनुरूप इसे पर्यटकों केलिए संवारा जाए तो क्या बुरा है। इस शहर में पर्यटकों का टोटा सिर्फ इसलिए है क्योंकि यहां पर सुविधाएं न के बराबर हैं। अगर भूले भटके राम की नगरी में आ भी जाए तो वह दोबारा और किसी को इस शहर में नहीं आने देने के लिए प्रेरित करेगा। भाजपा यहां पर एक मंदिर की बात करती है जबकि इस शहर को मंदिरों का शहर कहा जाता है। यहां केहर घर मे मंदिर है। कई किलोमीटर दूर से ही इन मंदिरों पर लगे चमकते खूबसूरत कलश एक धार्मिक शहर होने का लोगों को अहसास कराते हैं। अयोध्या के कई प्राचीन मंदिर धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होते जा रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि इन मंदिरों को बचाने की बजाय सिर्फ एक मंदिर पर ध्यान क्यों केंद्रित किया जा रहा है। भाजपा के राम मंदिर केराग का प्रभाव इस शहर की व्यवस्था पर पड़ रहा है क्योंकि प्रदेश की सत्ता में काबिज होने वाली अन्य पार्टियों की सरकारें इस शहर को उपेक्षित कर देती हैं उन्हें लगता है कि इससे उनका जनाधार कम होगा। कल्याण सरकार के शासनकाल में कुछ करोड़ रुपये अयोध्या केलिए पास हुए थे जिससे सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए सरयू तट पर कई तरह के निर्माण कार्य कराए गए पर अब व निर्माण धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं। मेरा मानना है कि इस शहर को एक पर्यटन स्थल के रूप में देखते हुए सरकार को इसकेविकास पर ध्यान देना चाहिए जिसकेमाध्यम से पर्यटकों को इस खूबसूरत शहर की ओर आकर्षित किया जा सके।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

ओए दूर रह नहीं तो लोग क्या कहेंगे

पता है अंकल आज मैंने आपकेबेटे को एक मॉल में एक लड़के के साथ देखा दोनों आपस में बातें कर रहे थे और गले भी मिल रहे थे। थोड़ी देर बाद दोनों मैक्डोनाल्ड में गए जहां उन्होंने एक साथ बैठकर बर्गर खाया। यह सुनते ही अपनी पत्नी को आवाज लगाते हुए कहा अजी सुनती हो देखो हम बबाüद हो गए। यह सब कुछ तुहारा किया कराया है कहा था बेटे को लड़कों केसाथ खेलने बाहर मत भेजा करो पर तुमने मेरी एक बात भी नहीं सुनी। लो अब दिल को तसल्ली मिल जाएगी जब घर में बहू की जगह कोई और लड़का ले लेगा। यह तस्वीर आज के बदलते समाज की है। जिसमें अब लोग लड़के-लड़कियों केसाथ लड़कों को भी संदेह भरी नजरों से देखने लगे हैं। इसके डर के कारण अगर आप अपने दोस्त केसाथ घूमने गए तो हो सकता है वह तुहे कह दे भाई थोड़ी दूरी बनाकर रखो जमाना खराब है। शनिवार को मैं 7 फरवरी यानी की रोज डे पर अपने एक मित्र केसाथ धार्मिक भावना केसाथ नोएडा केसेंट्रल स्टेज माल गया जहां दो लड़के आपस में कुछ ऐसी ही बातें कर रहे थे। जहां हर तरफ प्यार की खुशबू गुलाबों केसाथ-साथ महक रही थी तो वहीं दूसरी ओर इस तरह की बातें भी माहौल को गरम कर रही थीं। इस चर्चा में और आग लगा दी दोस्ताना ने। जिसने दोस्ताना देखी वह उसकेइफेक्ट से अपने आप को बचा ही नहीं पा रहा है। अब तो छोटे-छोटे बच्चे भी अपने पापा से दोस्ताना क्या होता है? जैसे सवाल पूछने लगे हैं। हालांकि यह अलग बात है कि उन बच्चोंं को इस सवाल का जवाब अच्छी तरह से पता है। पर मजे लेने के लिए वे ऐसा कर रहे हैं। श्रीराम सेना, शिवसेना और ना जाने कितनी सेना प्यार करने वालों पर लगाम कसने के लिए कमर कसकर खड़ी हैं। पर इन राजनीति केनाम पर रोटी सेंकने वालों को इस बात की शायद खबर नहीं है कि अब उन्हें दोस्ताना के खिलाफ कोई कदम उठाकर कुछ नया करना चाहिए। पर जो भी हो मेरा काम तो लिखना था सो लिख दिया अब आप इस पर क्या सोचते हैं वह आप जानें।

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

अटल जी आप ठीक हो जाएं मुझे आपसे मिलना है




मेरे गांव में हर शिवरात्रि पर एक बड़ा मेला लगता है जिसमें हजारों लोग दूर-दूर के गांवों से शिरकत करने आते हैं। मैं जब छोटा था उस समय एक बार मलमास पड़ा। जिसकेउपलक्ष में मेरे गांव में पूरे एक महीने का मेला लगा। उसी दौरान भाजपा धीरे-धीरे उठने का प्रयास कर रही थी। बस्ती जिले से सांसद का चुनाव और हरैüया विधान सभा का चुनाव एक साथ हो रहा था। मेरे यहां से सांसद केलिए श्याम लाल खड़े हुए थे जबकि विधायकी के लिए जगदंबा सिंह मैदान में उतरे थे। मंदिर-मçस्जद का विवाद जोरों पर था पर उस समय तक मçस्जद नहीं टूटी थी। हर दीवार पर एक ही नारा मैंने लिखा देखा था जो कि कुछ इस प्रकार था,`राम लला हम आएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे´।
उस समय अटल विहारी वाजपेई और कल्याण सिंह की हर ओर धूम थी। मैं उस समय सात साल का था। मेरे गांव के मेले में दो स्टेज बने हुए थे एक कांग्रेस का और दूसरा भाजपा का। मैं उस समय भाजपा का बहुत बड़ा समर्थक हुआ करता था क्योंकि मेरा पूरा परिवार भाजपा से जुड़ा था। मुझे एक शरारत सूझी और मैं कांग्रेस के मंच पर चला गया और वहां से भाजपा और अटल बिहारी वाजपेई के बारे में खड़े होकर जो नेताओं से थोड़ा बहुत सुना था वह भाषण देने लगा। पहले तो मंच पर बैठे कांग्रेसियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि मैं क्या बोल रहा हूं पर जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं भाजपा की बड़ाई कर रहा हूं सभी ने मेरे हाथ से माइक छीन लिया और मेरे घर पर शिकायत भी लगा दी। उस समय मेरे मन में यह आया कि मैं अटल बिहारी वाजपेई से मिलकर इसकी शिकायत करूंगा। पर मैं धीरे-धीरे बड़ा हो गया और सब भूल गया। पर जब मैं मीडिया में आया तो मेरे मन अटल जी का साक्षात्कार करने का हुआ। उसके लिए मैंने खूब प्रयत्न किया पर अब तक सफल ना हो सका क्योंकि उनकी तवियत ठीक नहीं थी। पर पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि मैं अटल जी से मिलने में जरूर सफल हूंगा। मैं दुआ करता हूं कि वे जल्दी से ठीक हो जाएं।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

पब संस्कृति के खिलाफ विरोध कितना सही

मंगलौर में पब में लड़कियों के साथ जो घटना घटी उसने पूरे देश को हिला कर रख दिया। धर्म की ठेकेदारी करने वाले गली के आंवारा लोगों ने पब पर हमला करके सारे कानून को तोड़कर रख दिया। जो नेता आज इस संस्कृति का विरोध कर रहे हैं वे खुद इसमें बुरी तरह से लिप्त हैं उनके बेटे बेटियों केदिनचर्या में यह संस्कृति शामिल है। पर उसका इस तरह से विरोध करके इन समितियों ने अपनी असलियत दुनिया केसामने उजागर कर दी है। मेरा मानना है कि अगर पब में कुछ गलत हो रहा था तो उस पर कार्रवाई पुलिस के माध्यम से होनी चाहिए थी। इस घटना को देखकर मुझे पंजाब की एक घटना याद आ जाती है जिसमें पटियाला में एक क्लब पर छापा मार करके पुलिस ने वालों ने बहुत सारे लड़के-लड़कियों को पकड़ा था उसय दौरान मीडिया में आई तस्वीरों में लड़कियों की बुरी हालत देखते बनती थी। मुंबई में भी कुछ ऐसा ही पुलिस ने किया था।
पर इन घटनाओं पर किसी ने कोई सवाल इसलिए खड़ा नहीं किया क्योंकि इस कार्रवाई को एक चैनल केतहत अंजाम दिया गया था। पर मुझे समझ नहीं आता शिवसेना, रामसेना, नवनिर्माण सेना, बजरंग दल जैसे तमाम दल कौन होते हैं इस तरह से किसी जगह पर हमला करने वाले। इस घटना को हर किसी ने निंदनीय बताया पर अभी बीजेपी इसे गलत नहीं मान रही है उसके बड़े नेताओं द्वारा इस पर अभी भी बयान जारी किए जा रहे हैं जिसमें पब संस्कृति की निंदा करने के साथ इस सिर्फ इस घटना के तरीके को खराब बता रहे हैं। ााजपा के राष्ट्रीय महासचिव विनय कटियार ने कुछ ऐसी अपनी प्रतिक्रिया इस पर रखी,``श्रीराम सेना को लोकतांत्रिक तरीके से पब संस्कृति का विरोध करना चाहिए मारपीट से नहीं। मंगलौर में पब में लड़कियों के साथ मारपीट करना गलत था क्योंकि यह लोकतांत्रिक तरीका नहीं है। उन्होंने कहा कि पब संस्कृति का विरोध अवश्य किया जाना चाहिए क्योंकि यह संस्कृति हिन्दू विचारधारा को धूमिल करने का प्रयास कर रही है।´´ अब इस घटना पर एक दूसरी तरह की बहस होती है जिसमें मुझे भी कुछ चीजें स्पष्ट नहीं हो पा रही हैं। वह मैं आप सब भड़ासी सदस्यों से जानना चाहता हूं कि क्या पब संस्कृति को बढ़ावा मिलना चाहिए? क्या राम सेना की तरह की गतिविधियों को प्रोत्साहित करना चाहिए? इस पर सरकार का क्या रुख होना चाहिए? और आप इस मसले पर क्या कहते हैं? खास करके भड़ास जैसे मंच पर इस बात पर बहस होनी चाहिए। इसलिए अब यह विषय आपलोगों के हवाले कर रहा हूं।

शनिवार, 31 जनवरी 2009

क्या यही प्यार है????

मुझे एक लड़की की घटना याद आती है जिसे मैं बहुत अच्छी तरह जानता था। जब वह छोटी थी तो उसकी मां उसे पहाड़ से लेकर दिल्ली में झाड़å पोंछा जैसे काम की तलाश में अपनी जीविका चलाने केलिए आ गई थी। वह लड़की बहुत ही क्यूट थी दो साल की बच्ची ने जिसके यहां उसकी मां काम करती थी उनका मन मोह लिया। उसकी मां की मालकिन ने उसकी बेटी को अपनी बेटी की तरह पाला और अच्छे स्कूल में उसका दाखिला करवा दिया। पढ़ने में तेज और देखने मे सुंदर उस लड़की ने अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाई करके लेडीज श्रीराम कॉलेज में एडमीशन ले लिया ग्रेजुएशन करने के लिए। पहला साल उसने मेहनत करकेपढ़ाई की। पर उसका मन प्रेम में पड़ गया और वह सिर्फ एक लड़के केतरफ नहीं बल्कि दो-दो लड़कों को पसंद करने लगी। उसे अब अपनी मां की मालकिन का घर निराशा का केंद्र लगने लगा वह बोर होने लगी। अचानक एकदिन वह अपने एक पुरुष मित्र केसाथ मालकिन के घर से भाग गई। पर जिसकेसाथ वह भागी उसकेपास भी नहीं रही उससे अधिक अच्छा दिखने वाला और अच्छी पढ़ाई करने वाले दूसरे केपास चली गई। पहले वाला लड़का उसे टूट केप्यार करता था तरह-तरह के उसके लिए सपने संजोए थे। इस घटना से उसकी मां जैसी मालकिन का दिल टूट गया। पर उन्होंने उसकी असली मां को सारी बात बताकर अपना किनारा कर लिया। वह लड़का भी कई दिनों तक इस सवाल का जवाब ढ़åढता रहा कि आखिर में ऐसा क्या हुआ था जो उसने मेरा दिल तोड़ दिया। पर अंत में उसे वह भूल गया। इसके तीन चार महीने बाद दूसरे लड़केका मन भी उस लड़की से भर गया और उसने उसे बीमारी की हालत में छोड़कर अपनी राह पकड़ ली। पर इसके बाद जो कुछ हुआ वह बहुत दिलचस्प था। लड़की को अपनी गलती का अहसास हो गया और उसे सत्य का ज्ञान हो गया। उसने भगवान केचरणों में अपना ध्यान लगाना शुरू करके अपना अतीत भूल गई।
मुझे प्रेम का यह अनोखा रूप लगा जिसे आपसे शेयर किया क्योंकि आजकल फिजाओं में फिजा की प्रेम कहानी केचर्चे हैं। चांद छुप गया है क्योंकि उसे अपनी गलती का अहसास होने लगा है अब वह अपनी पहली पत्नी केपास पहुंच गया है। तो वहीं दूसरी ओर अपने प्यार को इतिहास बनाने की कस्में खाने वाली अनुराधा को भी इस सच पर अब यकीन होने लगा है। यह आधुनिक समाज केप्यार की दूषित परिभाषाएं हैं जिसमें प्यार एक महीने भी नहीं चल पाता। ऐसे प्यार पर मुझे जो कहना था वह कह दिया अब आप क्या कहेंगे? उसका मुझे इंतजार है।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2009

मैं और कल्याण सिंह 1997 में


बात सन 1997 की है। मैं उस समय अयोध्या में था और महाराजा इंटर कालेज में दसवीं का छात्र था। क्योंकि 1996 में मैं 10 वीं में फेल हो गया था इसीलिए मुझे दोबारा उस कक्षा में पढ़ना पड़ रहा था। सुबह नौ बजे मैं अपने घर(किराए के मकान) से वासुदेव घाट से स्कूल के लिए निकला। अचानक रास्ते में मैंने बहुत बड़ी गाçड़यों का काफिला देखा तो ठहर गया और एक रिक्शे वाले से पूछा भैया यह क्या हो रहा है? उसने जवाब दिया अरे कल्याण सिंह आए हैं उत्तर प्रदेश के मुयमंत्री मैंने कहा अच्छा। पुलिस का हर ओर जमावड़ा था मेरे हाथ में सिर्फ दो किताबें थीं क्योंकि उस दिन कुछ खास था जो कि मुझे याद नहीं आ रहा है। इसलिए मैं ज्यादा किताब नहीं ले जा रहा था। मैं मणिराम छावनी यानी की छोटी छावनी में ही रुक गया। और जिस तरफ नेता और पुलिस वाले जा रहे थे उन्हीं के भीड़ में मैं भी चलता रहा। हालांकि उस टोली में किसी को जाने नहीं दिया जा रहा था पर मुझे किसी ने मना नहीं किया क्योंकि उनकी नजर मुझपर नहीं पड़ी। बाल्मीकि मंदिर परिसर के दाहिने हाथ पर हनुमान जी का मंदिर उस समय नया-नया बना था कल्याण सिंह को उसी में जाना था। वहां कुछ पूजा अर्चना करनी थी बाबा रामचंद्र दास परमहंस और नृत्य गोपाल दास केसाथ-साथ अयोध्या केसभी बड़े संत उपस्थित थे। हर कोई कल्याण सिंह के गुणगान में लगे थे। मैं जैसे मंदिर की सीढ़ियों पर पहुंचा विनय कटियार केसाथ-साथ वहां के बाबाओं ने मुझे धक्का देना शुरू कर दिया क्योंकि अंदर मिठाई बंट रही थी और हर नेता एक मिठाई डिŽबा प्रसाद स्वरूप झटकने में लगा था। मैं यह मौका कैसे गंवाता मैंने देखा कि विनय कटियार किसी से बात करने में लगे हैं तो मैंने बाबा को बोल दिया मैं विनय चाचा केसाथ आया हूं। बस क्या था बाबा जी ने मुझे ना सिर्फ खूब मिठाई बल्कि अंदर ले जाकर आराम से बिठा दिया जहां मैंने कल्याण सिंह केसाथ पेट भरकर मिठाई खाई और उनसे भाजपा की ना जाने कितनी अच्छाइयां सुनीं। पूरे भाषण केदौरान आडवाणी अटल हर कोई उनकेलिए आदर्श बना हुआ था। उस कल्याण को देखकर जब आज उनके पार्टी छोड़ने के फैसले को देखा तो पता चला कि इंसान कितना स्वार्थी होता है। यह तो पार्टी की बाद थी वह तो अपने फायदे के लिए परिवार तक को नहीं छोड़ता। अब मैं आप पर छोड़ता हूं कि ऐसे नेता जो अपने पुत्र-पौत्र के लिए मरे जा रहे हैं वह आपका या फिर देश का क्या कल्याण करेंगे? मैं किसी पार्टी का नहीं हूं पर एकता देखना मुझे पसंद है कम से कम अपनी पार्टी में तो जमे रहो नेताओं। नहीं तो तुम पर कौन भरोसा करेगा।

गुरुवार, 22 जनवरी 2009

बिना बैंकों के मिलीभगत के संभव नहीं था सत्यम घोटाला

अगर अभी तक सत्यम के मसले पर काेई आलस्य भरा कदम उठा रहा है तो वह है रिजर्व बैंक आफ इंडिया। जबकि आरबीआई हर बैंक पर वाचडाग (रखवाली करने वाला कुत्ता) की तरह नजर रखता रहा है। इसने बैंकों से यह चेक करने के लिए कहा है कि कहीं उन्होंने अपना अधिक पैसा सत्मय या फिर राजू के परिवार की कंपनी मेटस में तो नहीं लगा रखा है। हां एसबीआई का पैसा मेटस में लगा हुआ है। पर अभी तक जो मुय काण्ड है वहां तक कोई नहीं पहुंच पाया है। जो सारा का सारा घपला हुआ है वह पैसे को लेकर हुआ है जो कि बैंकों में नहीं मिला। ऐसे में आरबीआई यह बहाना नहीं बना सकती है कि यह उसकी समस्या नहीं है।
इसमें किसी को कोई गलती नहीं करनी चाहिए क्योंकि कहीं भी जब कोई ऐसा घोटाला होता है तो उसमें बैंक की धांधली भी सामने आती है। जब पैसा इसमें शामिल है तो बैंक अपना पल्ला कैसे झाड़ सकते हैं। क्99ख् में जब हर्षद मेहता नाम के एक बड़े ठग ने जब भारत में एक बड़ा घोटाला किया था तब भी वह देश को हिला देने वाली धांधली में भी बैंक धोखाधड़ी शामिल थी। बैंक उस समय अपकर्ष की ओर चल पड़े थे जब उनके साथ एक बड़ा छल हुआ। जो कि उनके बांड पोर्टफोलियो पर दिखाई पड़ा क्योंकि उन पर Žयाज दरें बढ़ाने का दबाव था। क्योंकि उन्हें कहीं से लाभ दिखाना था। उस समय भी भारत सरकार ने बैंकों को लोन देने में पारदर्शिता बरतने के लिए कहा था। जिसके चलते बैंकों पर अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव आ गया था। मेहता ने बैंकों को लाभ दिखाने में मदद की और अपने आप को उसमें शामिल करके करोड़ों रुपये प्रोसेस में डाले। हर्षत मेहता कांड में बैंक बबाüदी के कागार पर पहुंच गए थे इसमें कोई दो राय नहीं थी। मेहता और उनके अन्य ठग दोस्त बैंकों को अपने हिसाब से चला रहे थे। जिसमें उनकी पहुंच बैंक के सिक्योरिटी डिपार्टमेंट तक थी। उन बैंकों में स्टेट बैंक आफ इंडिया, स्टैंडर्ड चार्टर्ड, केनारा बैंक आदि शामिल थे। उस समय इस तरह से बैंकों को एक कड़वा घूंट पीने का अनुभव हुआ था।
केतन पारेख घपला भी स्टाक माकेüट का ही घोटाला माना गया था। उस समय भी इस घटना के केंद्र में दो बैंकों का नाम सामने आया था जिसमें बैंक आफ इंडिया और मधेपुरा बैंक शामिल थे। उस कांड में ये बैंक दोषी माने गए थे। उस समय आईपीओ में उछाल लाने के लिए उसकी कीमत बढ़ाने के लिए एक ही व्यक्ति ने ढेर सारे डीमेट अकाउंट का प्रयोग किया था जिसमें उनकी मंशा अधिक से अधिक शेयर अपने नाम अलाट करवाने की थी। इसको भी हम एक बैंक स्कैम ही कहेंगे। बाद में सेबी ने इसकी जांच करके इन बातों का खुलासा किया था। उस दौरान कई बैंकों पर रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने नो योर कस्टमर(अपने ग्राहक को भली भांति से जानो)के मानक पर खरा ना उतरने के कारण जुर्माना भी लगाया था। उन बैंकों में एडीएफसी, आईसीआईसीआई, सिटी बैंक और स्टैंडर्ड चार्टर्ड शामिल थे। इसमें इन बैंकों ने डीमेट अकाउंट के दौरान कोताही बरती थी। हर्षद मेहता के घटना के बाद भी सिटी और स्टैंडर्ड चार्टर्ड ने उसकी पुनरावृçत्त दोबारा की। क्योंकि अक्सर अच्छे बैंक अपने आपको बहुत स्मार्ट समझते हैं पर यह भी सच है कि ऐसे बैंक भी देर सवेर जाल में फंस ही जाते हैं।
सत्यम कांड में भी अगर आप अच्छे तरीके से देखेंगें तो आपको बैंकों की मिलीभगत नजर आएगी। जब राजू रामलिंगा सबके सामने आकर यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने कंपनी की नकदी को बढ़चढ़कर दिखाया तो ऐसा कैसे हो सकता है कि उसमें बैंकों की मिलीभगत ना हो। यह सोचने वाली बात है। आप ही सोचिए क्या यह एक कंपनी के लिए संभव है कि वह जो पैसा बैंक में है नहीं उसके बारे में भी अपने आडिटर्स के माध्यम से कंपनी रिकार्ड में रख सकते हैं? जब तक कि उन्हें बैंक द्वारा फिग लीफ सार्टीफिकेट बैंक ना दे दे। मेरा दावा है कि अगर वह सार्टीफिकेट असली हैं तो उसमें बैंक की मिलीभगत है। अगर यह गलत है तो बैंकों को सामने आकर यह पता लगाना चाहिए कि उनका नाम मिसयूज क्यों किया जा रहा है। अगर यह कुछ भी नहीं था तो बैंकों को परेशान होने की क्या जरूरत है? इन सभी चीजों का सही से पता लगाने के लिए सेबी को तेजी से कदम उठाना चाहिए तथा आरबीआई को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। जिससे भविष्य में कोई भी बैंक ऐसे बड़े घोटालों का हिस्सा ना बने। यह बहुत ही गंभीर मामला है जिस पर हर किसी को गंभीर होने की जरूरत है।

रविवार, 18 जनवरी 2009

गुरुवार, 8 जनवरी 2009

क्यूँ नही चलता कालका स्टेशन पर फ़ोन चार्ज करने का प्लग?

मैं और मेरे दो दोस्त सौरभ और गौरव शिमला घूमकर वापस लौट रहे थे। हमारी ट्रेन कालका मेल रात में ११ बजे थी. हम वहां पर शाम को चार बजे ही पहुँच गए. क्यूंकि और कोई काम नही था इसीलिये हमने वहीं बैठकर गप्पे लड़ाने का कार्यक्रम बनाया. इसी दौरान हमें पता चला की हमारे फ़ोन की बैट्री पूरी तरह से जा चुकी है. कालका स्टेशन पर ढेर सारे बोर्ड बन्दे हुए थे. तो हमने उसमे अपना चार्जर लगा दिया. पर फ़ोन चार्ज होना नही शुरू हुआ. हमने उस स्टेशन के वेटिंग रूम से लेकर स्टेशन मास्टर तक के कमरे की ख़ाक चान ली लेकिन बिजली होने के बावजूद हमें कोई ऐसा बोर्ड नही मिला जहाँ से हम अपना फ़ोन चार्ज कर सकें. थक हर कर हमने अपनी बात स्टेशन मास्टर तक राखी तो महोदय ने जवाब दिया बेटा हमारा आदमी इसे ठीक कर रहा होगा आप थोड़ा वेट कर लो. हमने एक घंटा इंतज़ार किया लेकिन कुछ भी नही हुआ. तो फिर हम इसकी शिकायत करने कहीं नही गए. वहां टिकेट काट रही एक महिला से हमने कहाँ की हमारा फ़ोन काम नही कर रहा है. इसलिए अगर कोई बोर्ड काम कर रहा हो तो हमारा मोबाइल लगवा दीजिये. उन्होंने हमारी बात सुन ली और अपने ही केबिन में फ़ोन चार्ज होने के लिए लगवा दिया. जब हम अपना फ़ोन वहां लगवा रहे थे तो इस बारे में उनसे पुछा की मैं यहाँ के चार्जिंग बोर्ड काम क्यूँ नही कर रहे हैं. इस पर उन्होंने हमें कहा इसके बारे में आप हमारे स्टेशन मास्टर से बात कीजिए. हमे इस रहस्य के बारे में किसी ने कुछ नही बताया. इसके बाद हम जब खाना खाने गए तो इस बात का हमें पता लगा की वहां का बोर्ड काम क्यूँ नही करता. वहां पर रेस्तराँ के मालिक ने हमें बताया की यहाँ पर पिछले दिनों ऐसे घटनाएँ घटीं जिसके चलते यहाँ के कर्मचारियों का जीना दूभर हो गया था. इसी वजह से यहाँ के सभी बोर्ड के कनेक्शन काट दिए गए हैं. यहाँ पर अक्सर लोग मंहगे फ़ोन चार्ज होने के लिए लगते थे और भूल जाते थे. इस बीच उनका फ़ोन कोई उठाकर ले जाता था. जब उनका फ़ोन गायब होता तो वो लोग पुलिस बुला लेते थे. दो महीने में यहाँ पर इस तरह की इतनी घटनाएँ घटीं की इन बोर्ड का कनेक्शन काटना पड़ा. अब लोग न अपना फ़ोन लगते हैं ना ही यहाँ के स्टाफ को दुखी होना पड़ता है. अगर आप भी कालका स्टेशन जायें तो वहां पर फ़ोन चार्ज करने का अरमान मत रखियेगा. नही तो निराशा ही मिलेगी.
अमित द्विवेदी

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

भुलाए नहीं भूलेगा बीता वर्ष

जब मैं छोटा था और स्कूल में पढ़ा करता था उस समय बड़े-बूढ़े हमेशा यह सीख दिया करते थे कि बेटे कोई भी मुकाम मेहनत करके धीरे-धीरे हासिल करने से उसका असर दीघüकालिक होता है। अगर कोई सफलता बिना किसी मेहनत के चमत्कार केरूप में आती है उसका असर भी थोड़े दिन बाद समाप्त हो जाता है। इस बात को यहां पर मैं इसलिए बता रहा हूूं क्योंकि यह अपनी अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है। बात बहुत पुरानी नहीं है 2007 में हमने सेंसेक्स की ऊंचे छलांग लगाते ढ़ेरों रिकार्ड देखे। उसकी सफलता को देख हर कोई इस बात पर चर्चा करना भूल गया कि आखिर सेंसेक्स इतना तेजी से क्यों बढ़ रहा है। जब सेंसेक्स 21 हजार के स्तर पर पहुंचा तो हमारे बाजार के जानकारों ने बिना सोचे समझे भविष्यवाणी कर दी कि अब सेंसेक्स की पकड़ से 25 हजार भी दूर नहीं है। पर एक ऐसी आंधी आई कि सेंसेक्स का कोई स्तर ही नहीं रहा जनवरी 2008 से गिरावट का शुरू हुआ ये क्रम कब खत्म होगा इसकी कोई गारंटी नहीं ले रहा है। पिछले एक साल में जितने पूर्वानुमान लगाए गए वह बुरी तरह से लाप शो ही साबित हुए हैं। 8 जनवरी 2008 को सेंसेक्स की सबसे लंबी छलांग उस समय देखने को मिली जब वह 21 हजार के रिकार्ड स्तर पर पहुंचा। 6 जुलाई 2007 में जब सेंसेक्स ने 15 हजार की ऊंचाई छुई थी उस समय किसी ने यह अंदाजा नहीं लगाया था कि इस साल के बाकी बचे महीने भी सेंसेक्स की ऊंचाई के रिकार्ड बनाने जा रहे हैं। 11 फरवरी 2000 को सेंसेक्स ने 6000 की ऊंचाई पर कदम रखा था। इसके बाद उसे 7000 तक पहुंचने में लगभग पांच वर्ष लग गए और 11 जून 2005 को वह दिन आया जब सेंसेक्स सात हजार के पार हुआ। पर 2007 के कुछ महीनों में ही सेंसेक्स ने 6 हजार प्वाइंट कमाकर 21 हजार का उच्च स्तर छू लिया। पर हुआ वही जो नैतिक शिक्षा में पढ़ाया गया है कि धीरे-धीरे मिली सफलता ही अधिक दिनों तक कायम रहती है। 21 जनवरी 2008 को सेंसेक्स में ऐसी आंधी है जिसके चलते सभी भविष्यवक्ताओं और बाजार के जानकारों का पूर्वानुमान चकनाचूर हो गया और बाजार 1400 प्वाइंट गिरकर 17,605 पर आ गया। इसकेपहले गिरावट शुरू हुई थी पर वह बहुत छोटी थी। पर इसके बाद इस गिरावट ने थमने का नाम नहीं लिया और निचले स्तर की ओर लगातार बढ़ता गया। इसी बीच ग्लोबल क्राइसिस का प्रभाव शुरू हुआ और सारा असर सेंसेक्स पर दिखा। पर इसके बाद भी बाजार के विशेषज्ञों ने अपने पूर्वानुमान को लगाने का काम नहीं छोड़ा और यहां तक भविष्यवाणी कर दी कि माकेüट छह हजार का निचला स्तर छुएगा। 26 नवंबर को मुंबई आतंकी हमलों के बाद एक और पूर्वानुमान समाचारों के माध्यम से लोगों तक आया कि इस हमले से सेंसेक्स में रिकार्ड गिरावट आएगी। पर इन सभी पूर्वानुमानों के विपरीत बाजार उन हमलों के बाद से अधिक मजबूत स्थिति में कारोबार कर रहा है। भारत की तेरह साल की सबसे महंगाई की दर अगस्त के 13 प्रतिशत से गिरकर मध्य दिसंबर तक 8 के भी नीचे आ गई है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के रंग को देखकर अब तक हर कोई हैरान है। किसी साल में पहली बार अब तक ऐसा हुआ है कि कच्चे तेल की कीमत जुलाई में 147 डालर प्रति बैरल तक पहुंच गई और दिसंबर 2008 के मध्य तक हमने 37 डालर प्रति बैरल का इसका निचला स्तर देखा। इस तरह का उतार-चढ़ाव पहली बार देखने को मिल रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कमी को देखते हुए सरकार इसका फायदा आम लोगों को देने का कार्यक्रम बना रही हैं। इसे देखकर अब 2008 को गाली दें इसका शुक्रिया अदा करें यह समझ में नहीं आ रहा है। क्योंकि तेल की कीमतों के कम होने से लोगों को बड़ी राहत मिली है और आगे और भी मिलने जा रही है। मैं कोई पूर्वानुमान करने में भरोसा नहीं करता पर हां जिस तरह से कुछ और भविष्यवाणियां की जा रही हैं उसके मुताबिक अभी हम मंदी के दौर से नहीं गुजरने में पूरा का पूरा 2009 लेंगे। क्योंकि अभी पूरी दुनिया मंदी के चपेट में है। पर मंदी से सबसे अधिक मुझे जो भारत में प्रभावित लगता है वह है यहां का निर्यातक कारोबार, आज की तिथि में हमारे देश के कपड़े और गहने विश्व के उत्पादों का मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि हमारे अधिकतर उत्पादों की खपत दुनिया के विकासशील देशों में होती है और वहां केलोगों ने अपने खर्चे सीमित कर लिए हैं। अधिकतर लोग अब कपड़े और गहने पर खर्च करने के बजाय अपने खाने और बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर रहे हैं। 2008 वर्ष केइसी रंग को हम नहीं भुला पाएंगे क्योंकि इसे हम ना बुरा कह सकते हैं ना भला कह सकते हैं न ही इसमें किसी अध्ययन के बाद किया गया पूर्वानुमान ही सही निकला।

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

सीढ़ियों का शहर शिमला


दिल्ली से लगभग साढ़े चार सौ किलोमीटर दूर शिमला को मुझे देखने का मौका पहली बार 17 दिसंबर को मिला। मुझे यह शहर सच पूंछें तो बहुत अच्छा लगा। यहां के रहने वाले लोग कितने सय हैं उसका अंदाजा वहां की सफाई व्यवस्था को देखकर लग गया। पहाड़ पर बसे इस शहर को मैंने एक नाम दिया जिसे मेरे दोस्तों ने मान्यता भी दे दी। वह नाम है `सीढ़ियों का शहर´। हालांकि इस शहर को अगर भाभियों का शहर कहा जाए तो उसमें कुछ बुरा नहीं होगा क्योंकि अगर आप यहां शादी से पहले जाते हैं तो हर तरफ नए शादी शुदा जोड़े आपको देखने को मिलेंगे। तो मेरे दोस्त सौरव ने इस शहर को भाभियों केशहर का नाम भी दे दिया। इस शहर का और बॉलीवुड की पुरानी फिल्मों का गहरा नाता भी रहा है जिसकी कहानियों में अक्सर आपने देखा होगा कि एक कनüल की लड़की होती है और हीरो यह शहर घूमने आता है और उसे उस लड़की से प्यार हो जाता है। इस तरह से पूरी कहानी आगे बढ़ती है। इस कहानी का असर हम जैसे सैकड़ों युवाओं पर अब भी है जो इस शहर में सिर्फ इसलिए आते हैं कि कोई उन्हें कनüल की लड़की मिलेगी और प्यार हो जाएगा। पर ऐसा नहीं है क्योंकि अब ना वो कनüल रहे ना ही कनüल की लड़कियां। घूमना है अगर आपको इस शहर को तो बिना किसी उमीद के आइए मस्ती कीजिए और वापस चले जाइए। अगर शरीर का वजन अधिक है तो इस शहर में आकर कुछ महीने गुजारिए शर्तिया आपका वजन कम हो जाएगा।

मैं और मेरे दोस्त कालका के रेलवे स्टेशन पर। शिमला के ट्रेन के पास
मोटे अजगर के साथ वैसे मैं सांप से बहुत डरता हूँ लेकिन ये सौंप नही है लोगों से डरा हुआ अजगर है जो कुफरी में पैसा कमा के अपने मालिक को दे रहा है।
मैं ग्रीन वैली के सामने।
शिमला के हेलीपैड पर मैं फोटो के लिए बैठा हुआ। यह बहुत ही पुराना हेलीपैड है जहाँ पर आकर दिल खुश हो जाता है।
मैं अपने दोस्तों सौरव और गौरव के साथ शिमला नगरपालिका के सामने।
शिमला से १७ किलोमीटर दूर कुफरी में देवदार के पेड़ पर फोटो खिंचवाते हुए। इस पेड़ पर चढ़कर सच में बहुत मज़ा आया।
मैं ग्रीन वैली के सामने। ये वो जगह है जहाँ पर प्रतिदिन हजारों लोग घूमने आते हैं । तो अगर आपको भी मौका मिले तो यहाँ ज़रूर तसरीफ लायें।

मंगलवार, 9 दिसंबर 2008

युवाओं की अनोखी पहल



kuch aisa karne ki zaroorat hai hamen ab waqt aa gaya hai ki hum kuch kar guzaren. to aap bheee hamare saath aa jayen................

शनिवार, 29 नवंबर 2008

ये सफलता हमारे जवानों की है ना कि कब्र में पैर लटकाए नेताओं की


26 नवंबर 2008 बुधवार को शुरू हुए मुंबई के आतंकी हमलों से निपटने केलिए बिना देरी किए दिल्ली के 200 एनएसजी कमांडो को रवाना किया गया। देश केलिए मर मिटने को तैयार रहने वाले इन स्पेशल कमांडो मुंबई पहुंचते ही मोर्चा संभाल लिया। पर किसी ने नहीं सोचा था कि हमारे बीच से दो जाबांज मेजर संदीप और कमांडो गजेंद्र चले जाएंगे। 60 घंटे तक चला आपरेशन जब पूरा हुआ तो हमारे बीच ये दुखद खबर भी आई कि अब ये जाबांज सिपाही हमारे बीच नहीं रहे। उनकी इस कुरबानी को देखकर लता जी का गाया गाना ऐ मेरे वतन केलोगों जरा आंख में भर लो पानी..., जेहन में गूंजने लगा। इसकेसाथ ही मुंबई के एटीएस प्रमुख हेमंत किरकरे और अशोक काटे जैसे सच्चे सिपाहियों की शहादत दिल को कचोटने लगी।
देश केलिए अपनी कुरबानी देने वाले ये जवान तो चले गए पर इसकेपीछे राजनीति की रोटी सेंकने वालों को पीछे छोड़ गए। जब मुंबई जल रही थी, हर तरफ आतंक फैला हुआ था तब राज ठाकरे का ना तो कोई बयान आया ना ही उनका मराठा मानुष इस सीमापार आतंकियों से लोहा लेने केलिए सामने आया। इस मुश्किल की घड़ी सबसे पहले अगर कोई दिखा तो वह था पूरे देश का जज्बा जो अपनी मुंबई को खतरे में देख सजग हो गया था और हर जगह उसकी सलामती केलिए दुआएं मांग रहा था। पूरे साठ घंटे चले आपरेशन को लोग टीवी पर देखते रहे। हमारे सैनिकों ने तो अपना काम कर दिया अपनी बहादुरी से दुश्मन केदांत खट्टे कर दिए। कायरों की तरह वार करके आतंकियों ने जहां लगभग 200 मासूमों की बलि चढ़ाई तथा 300 से भी अधिक लोगों को घायल कर दिया। तो हमारे शेरों ने इस्लाम के नाम को कलंकित कर रहे इन आतंकियों को सामने से वार करकेउनके अंजाम तक पहुंचा दिया।
आतंक फैलाकर अपनी जान देने वाले इन युवा आतंकियों जैसे और हजारों आतंकियों को इससे तो एक सबक लेना ही चाहिए कि जब वे मरते हैं तो लोग उनकी लाशों पर थू-थू करते हैं तथा जब हमारे देश केसैनिक उनको मारते हुए शहीद होते हैं तो उनकी याद में हमारे देश की करोड़ों जनता की आंखें नम हो जाती हैं। लोगों को बचाने के लिए जिन लोगों ने अपनी कुरबानी दी है उनका नाम हमेशा इस जहां में अमर रहेगा। सीमा पार आतंकियों को इससे एक चीज तो सीख ही लेनी चाहिए कि वे जितनी भी हमारी देश की अखंडता को तोड़ने की कोशिश करेंगे उससे लोग और एक दूसरे से जुड़ जाएंगे। आतंकी सिर्फ अपने कमीनेपन को उजागर मासूम लोगों को मारकर कर सकते हैं पर जब बहादुरों से उनका सामना होगा तो उनकी रूह कांप उठेगी।
अगर मुंबई केइस आपरेशन पर कोई भी पार्टी में बाद मेंं बयानबाजी करके एक दूसरे पर आरोप मढ़ने की कोशिश करेगी तो उससे हमारे शहीदों को बहुत दुख पहुंचेगा। पर इन नेताओं को कौन समझाए घटिया संस्कारों में पले बढ़े ये देश केभाग्यविधाता अपनी हरकतों से बाज नहीं आएंगे। अब आपरेशन खत्म हुआ है और अतीत की बातों पर भरोसा करें तो इस पर सियासत कल से ही शुरू हो जाएगी। केंद्र सरकार आने वाले चुनाओं में इन जाबांजों की मेहनत को अपनी कुशलता बताकर लोगों से अपने पक्ष में वोट करने को कहेगी तो विपक्षी पार्टी उन पर दूसरे तरह से वार करके इसमें मरने वाले लोगों का जिमेदार केंद्र को ठहराएगी। पर जो सच्चाई है वह पूरी दुनिया ने देखी है और सब जानते हैं कि मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, अमर सिंह, लाल कृष्ण आडवाणी, राज ठाकरे एक मच्छर भी मारने की ताकत नहीं रखते तो ऐसे में आतंकियों से अगर उनका सामना हो जाए तो वे क्या करेंगे इसकी आप कल्पना कर सकते हैं। यह जीत हमारे जाबांजो की है और उनकी सफलता का श्रेय कोई भी तुच्छ पार्टी नहीं ले सकती।
जय भारत और जय जवान
अमित द्विवेदी

सोमवार, 24 नवंबर 2008

क्या यही प्यार है...

तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगे? किसी और से बात मत करना प्लीज और मेरा इंतजार करना समय से खाना खा लेना और सुबह उठते ही पहले मेरा संदेश पढ़ना। अब मैं आपको रोज सुबह जगाया करूंगी तभी उठना। चलो अब सो जाओ। यह डॉयलाग सभी केसाथ उस समय घटता है जब वह प्यार के अपने पहले या दूसरे दिन में होते हैं और बात आई लव यू तक पहुंच जाती है। दुनिया हसीन लगने लगती है हर तरफ सिर्फ एक प्यारा सा संसार दिखाई देता है जिसमें सब अच्छे लगते हैं। कुल मिलाकर जिंदगी मोबाइल फोन और इंटरनेट केइर्द-गिर्द घिरकर रह जाती है। उसका इंतजार रहता है जिसके साथ चार दिन में चार सौ साल तक जीने तक केसपने देख लिए जाते हैं।
पर जैसे-जैसे दिन बीतते हैं बस प्यार में शिकायतें दस्तक देती हैं। डायलॉग बदल जाता है। प्यारा सा अहसास दिलाने वाली सारी बातें समय केसाथ धूमिल हो जाती हैं। फिर कुछ इस तरह से डायलॉग बनने लगते हैं।
मैंने तुहें फोन किया था। तुहारा फोन व्यस्त जा रहा था तुम किससे बात कर रहे थे। वह जरूर कोई लड़की या लड़का रहा होगा। तुम मुझे भूल रहे हो? आज तुमने पूरे दिन में मुझे एक बार भी याद नहीं किया। आखिर इतने जल्दी ऐसा क्या हो गया कि तुहें मेरी परवाह नहीं रही। इस तरह से चलते-चलते एक दिन ऐसा आता है कि शिकायतों और गुस्से के बवंडर में फंसकर पहले दिन के किए गए वादे और सारे प्यारे अहसास दुश्मनी में बदल जाते हैं। इसके बाद में जब प्यार का अंत होता है तो उसकी शुरुआत और भी भयानक होती है। जो कुछ सप्ताह पहले एकदूसरे के बगैर जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता था वह अब अपने दोस्तों में बैठकर अपने प्यार को जलील कर रहा है। उसकी गलतियां गिना रहा है। ये अंश जो मैंने लिखे हैं आज के प्यार की वास्तविकता है अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप इसे क्या नाम देंगे। क्या यह सच में वही वाला प्यार है जिसे लैला-मजनू और हीर रांझा ने किया था। या फिर अब जरूरतों वाला प्यार है जिसमें एक इनफैचुएशन केसिवा कुछ और नहीं है। हर कोई किसी को चाहता है पर उसकेप्रति कितना गंभीर रहना चाहता है इसका वादा वह ना खुद से करता है ना ही उसका आभास अपने साथी को होने देता है। इस तरह से कुल मिलाकर कहा जा सकता है यह एक तरह की बीमारी है जिसमें बहुत से लोग एक दूसरे को मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं। जिसका उदाहरण मुझे देने की जरूरत नहीं है अखबार समाज का आइना हैं उसमें हर दिन ऐसी खबरें प्रकाशित होती हैंं जिसमें प्यार के अंत का बेहतर उदाहरण दिया जाता है। पर मैंने अब तक जो देखा है वह मैंने बताया। अब आगे आप क्या सोचते हैं वह मुझे बताएं। और आधुनिक समाज के प्यार की एक परिभाषा देने में मुझे मदद करें जिसे मैं अपने अगले किसी पोस्ट में प्रयोग कर सकूं।

रविवार, 16 नवंबर 2008

आओ करें 12 ज्योर्तिलिंगों के दर्शन







अभी तक मैं जहां-जहां गया उन जगहों के बारे में आपको विस्तार से बताया और कुछ अपनी वहां की तस्वीरें भी दिखाईं। पर इन यात्राओं के दौरान मैंने कई पवित्र तीर्थस्थलों को भी देखा। अचानक मेरे मन में विचार आया कि क्यों ना मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से आपको भगवान शंकर के 12 पवित्र ज्योर्तिलिंगों के दर्शन अपने शब्दों और वहां ली गई तस्वीरों के माध्यम से करवा दूं। मैं धीरे-धीरे इन सभी ज्योर्तिलिंगों के दर्शन कर रहा हूं। 16 नवंबर तक मैंने तीन ज्योर्तिलिंगों देखे जिनमें से सभी महाराष्ट्र में स्थित हैं। उनमें से मैं आपको त्र्यम्बकेश्वर , भीमा शंकर और घुश्नेश्वर के बारे में विस्तार से बताऊंगा। पर सबसे पहले मैं त्र्यम्बकेश्वर ज्योर्तिलिंगों से अपनी शुरुआत करूंगा। अपनी इस धार्मिक यात्रा में मैं आपको वहां के इतिहास के साथ-साथ मौजूदा स्थिति को भी बताऊंगा। तो आइए चलते हैं

त्र्यम्बकेश्वर ज्योर्तिलिंग:-
मैंने इस ज्योर्तिलिंग का दर्शन 6 जनवरी 2007 को किया। मैं जब यहां पहुंचा तो उस समय बहुत अधिक भीड़ नहीं थी क्योंकि उस समय कोई खास धार्मिक पर्व नहीं चल रहा था। मैं नासिक के ज्युपिटर होटल में रुका हुआ था जहां से पवित्र स्थल 30 किलोमीटर दूर है। सुबह नौ बजे मैं अपनी मां के साथ यहां पहुंचा। उस समय मन में श्रद्धा के भाव भरे हुए थे। पर जैसे ही हमने इस तीर्थ में प्रवेश किया तो ढेर सारे पंडित और पुजारी हमारे पीछे लग गए कि आप इतना रुपया हमें दे दीजिए हम आपको जल्दी से और आराम से दर्शन करवा देंगे। उसके लिए आपको सिर्फ 800 रुपये खर्चने होंगे। थोड़ा सा आराम से दर्शन करने के लिए हमने बागेüनिंग शुरू की पर पंडित जी 500 रुपये से नीचे नहीं आए और हमने अपने आप ही भगवान का दर्शन करने का फैसला किया। जब हमने इस जयोतिलिZग के परिसर में प्रवेश किया तो वहां की गंदगी देखकर दंग रह गए। जिस ज्योर्तिलिंग के दर्शन करने लोग देश-विदेश के कोने-कोने से आते हैं वहां पर इतनी गंदगी हो सकती थी ये मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। लाइन में लगकर जब हम मुयद्वार पर पहुंचे तो वहां पर किसी व्यक्ति ने मल त्याग कर रखा था जहां मखियाँ भिनभिना रही थीं और लोग पवित्र भाव से उस पर पैर रखते हुए गंदगी मंदिर में लेकर जा रहे थे। उस गंदगी को देखकर मैंने सोचा कि इसकी शिकायत किसी मंदिर के प्रमुख पुजारी से की जाए पर वहां पर मुझे कोई नहीं मिला और जो मिला भी वह भक्तों की तलाश में पड़ा था जिससे उसे कुछ पैसे मिलते। उस गंदगी के बीच से निकलते हुए अंतत: हमने दर्शन कर लिया और होटल वापस आ गए।
धार्मिक पृष्ठभूमि:- गोदावरी के तट पर स्थित इस ज्योर्तिलिंग की गणना भगवान शिव के बारह ज्योतिलिZगों में से होती है। यहां के निकटवतीü ब्रहमगिरी नामक पर्वत से पूत सलिला गोदावरी नदी निकलती हैं। गोदावरी का महत्व दक्षिण भारत में ठीक उत्तर भारत की गंगा की तरह है। गोदावरी नदी ऋषि गौतम की घोर तपस्या का फल है। भगवान आशुतोष ने खुश गौतम को यह नदी वरदान के रूप में प्रदान की थी। जिस समय गौतम मुनि यहां के ब्रह्मगिरि पर तपस्या कर रहे थे उन्हें इस दौरान अनेक सिद्धियां प्राप्त हुईं। पर उनके प्रताप से जलेभुने कुछ संतों ने उन पर गोहत्या का आरोप लगा दिया और उसके प्रायश्चित के लिए उन्हें यहां पर गंगा जी को लाने को कहा। गौतम मुनि ने इस झूठे पाप से मुक्ति पाने के लिए एक करोड़ शिवलिंगों की पूजा की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव शिवा के साथ प्रकट हुए। पर जब जब ऋषि ने वरदान मांगा तो गंगा यहां आने को तैयार नहीं हुईं। उनका कहना था कि जब तक शिव यहां प्रतिष्ठित नहीं होते वे वहां नहीं आएंगी। गंगा के इस आग्रह पर भगवान शिव ज्योतिलिZग के रूप में वहां प्रतिष्ठित हुए और गंगा गौतमी के रूप में वहां उतरीं। इसके बाद सभी देवताओं ने प्रकट होकर यहां पर गंगा का अभिषेक किया। तभी से जब गुरू सिंह राशि पर रहते हैं तब सभी तीर्थ गौतमी या गोदावरी के किनारे उपस्थित हो जाते हैं।
कैसे पहुंचे:- नासिक रेलवे स्टेशन से बहुत सी छोटी-छोटी गाçड़यां यहां के लिए चलती हैं। यहां पर पहुंचकर आप धर्मशालाओं में भी शरण ले सकते हैं। जब कभी भी आप यहां आएं तो कम से कम तीन दिन का समय लेकर आएं क्योंकि यहां के आसपास कई ऐसी धार्मिक जगहें हैं जिनकी रमणीकता देखकर आपका मन प्रसन्न हो उठेगा। ब्रहमगिरि, नीलगिरि और ब्रृह्मद्वार देखने जरूर जाएं।

शनिवार, 15 नवंबर 2008

दिल्ली के रेडलाइट पर भिखारियों की जगह हिजड़े

आजकल दिल्ली केरेड लाइट वाले चौराहों पर एक नया बदलाव देखा जा सकता है। यहां से पारंपरिक भिखारियों की संया अचानक कम हो गई है। उनकी जगह हिजड़ों ने ले ली है। हिजड़ों को आजकल हर रेड लाइट से अच्छी भली रकम मिल जाती है जिसे देखकर ऐसा लग रहा है कि भिख मांगने का काम करवाने वाले आकाओं का यह आइडिया पूरी तरह से सफल हो रहा है।दो महीने पूर्व शनिवार को मैं अंसल प्लाजा केपास से निकलकर नोएडा केलिए रिंग रोड पर आने के लिए रेड लाइट पर खड़ा हुआ तभी मैंने वहां देखा कि कई औरतें साड़ी में खड़ी हैं। पर जब वे मेरे पास आईं तो पता चला कि वो हिजड़ा लोग हैं जो यहां पर लोगोंं से पैसे मांग रहे हैं। मुझे लगा कि सिर्फ ये हिजड़े यहीं केचौराहे पर होंगे। पर बाद में मैंने दो महीने के अपने दिल्ली के विभिन्न इलाकों का भ्रमण करने केबाद ये निष्कर्ष निकाला कि ये हिजड़े तो अब दिल्ली केहर चौराहे पर पहुंच चुके हैं। मैंने इस बारे में दिल्ली केकुछ लोगों से बात करकेये जानने की कोशिश की तो ये पता चला कि ये हिजड़े वास्तव में रेवेन्यू कम हो जाने के कारण यहां पर लाए गए हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि मैं किस रेवेन्यू की बात कर रहा हूं। भाई ये वही रेवेन्यू है जो दिल्ली केसभी चौराहों से भिखारियों द्वारा वसूला जाता है। ये सारा पैसा उनकेआकाओं तक पहुंचकर कई तरफ से बंटता हुआ इन भिखारियोंं को उसका कुछ अंश तनवाह के रूप मे मिलता है। पर पिछले कुछ सालों में लोगों ने भीख देना लगभग बंद सा कर दिया। इससे इस धंधे को काफी नुकसान होने लगा। इस नुकसान की भरपाई केलिए पूरे दिल्ली में लाखोंं हिजड़ों को चौराहोंं पर तैनात किया गया है। ये लोगों केसाथ बत्तमीजी करके कुछ ना कुछ सभी लोगोें से निकलवा ही लेते हैं। लोग इनसे बचने केलिए दस पांच रुपये देकर अपना पिंड छुड़ा लेते हैं। चौराहों पर जो हिजड़े आजकल भीख मांगते नजर आ रहे हैं वास्तव में उनमें से कई लोग सामान्य पुरुष हैं पर पैसा कमाने के लिए उन्होंने यह रूप धरा हुआ है। अब जब आप किसी चौराहे से दिल्ली के निकलें तो इस बदलाव को ध्यान से जरूर देखिएगा। वैसे भी दिल्ली केसभी चौराहों से अब गंदे-गंदे भिखारी कम हो गए हैं तथा शनिदेव केनाम पर उगाही करने वाले भी अब इस धंधे से धीरे-धीरे दूर हो रहे हैं। यह भी हमारेआजाद देश का ही एक रूप है जो आए दिन अपना रंग बदल रहा है। मैनेजमेंट केइस युग में भला भिखारियों का धंधा कब तक नुकसान में चल सकता था। इसलिए भिखारियों केसरादार ने इस धंधे में नई जान फूंक दी और इसे दोबारा मुनाफे में ला दिया।

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

मैं और मेरा ऑफिस

मैं हर एक पल का शायर हूँ हर एक पल मेरी जवानी है हर एक पल मेरी मस्ती है हर एक पल मेरी कहानी है।
मैं और मेरा ऑफिस आपास में अक्सर ये बातें किया करते हैं की मैं वहां होता तो कैसा होता मैं वहां होता तो कैसा होता। लेकिन ये यात्रा किसी को नही पता की कहाँ जाने वाली है मुझे भी। देखते हैं मैं और मेरी ये उड़ने की जिज्ञासा मुझे कहाँ ले जातीं हैं।

शादी होते ही चमक गयी किस्मत


कहते हैं की हर सफल व्यक्ति की पीछे एक महिला का हाथ होता है। मैं इस कहावत पर ज्यादा भरोसा नही करता था लेकिन मेरे ऑफिस में एक ऐसी घटना घटी जिसने मुझे ये भरोसा दिला दिया की हाँ ये सच है. तो हुआ यूँ की मेरे ऑफिस में स्पोर्ट्स डेस्क पर एक अजय नथानी जी थे. प्रतिभा तो उनसे लिपटी पडी थी. पर उनकी ही एक परेशानी थी जो की हर पत्रकार के साथ होती है वो थी की उनकी प्रतिभा को कोई समझ नही रहा था. नथानी जी शादी के योग्य बहुत पहले हो गए थे पर जीवन के झंझावातों में फंसकर वो उसे साकार रूप नही दे पाए थे. लेकिन जब उन्हें ऑफिस में परेशानी ज्यादा होने लगी तो उन्होंने शादी कर ली बस क्या था नथानी जी की किस्मत चमक गयी. शादी होने के एक महीने में ही उन्हें सहारा से ऑफर आया और वो चले चीफ सुब बनकर सहारा. उन्हें हमारे ऑफिस में हर कोई मिस करता है. लेकिन नथानी जी अभी तक किसी से नही मिलने आए उनके इस व्यवहार से ये लग रहा है की ये यहाँ पर कितने परेशान थे. पर जो भी हो देर में ही शादी की नथानी भाई ने लेकिन उनकी पत्नी तो किसी लक्ष्मी से कम नही निकली. अगर आप भी परेशान हैं और उम्र बढ़ रही है तो निडर होकर शादी कर लें तरक्की आपके कदम चूमेगी. और इसे पढ़कर नथनी जी को शुक्रिया कहना ना भूलें मैं इसीलिए उनकी फोटो भी प्रकाशित कर रहा हूँ.

जय हो नथानी भाई हमेशा खुश रहो और तरक्की करो ढेर सारी आपको बधाई

बुधवार, 29 अक्टूबर 2008

वो जो उल्ले बैठे हैं ना....

आ जा बेटा खूब चिला और ये ले खाना पीना खा. ये सब खाना पीना सचिन तेंदुलकर के शतक के उपलक्ष में है आज वो ज़रूर शतक जमाएगा. और सुन गुडिया इधर आ वो देख जो कपडे वपड़े उतर के उल्ले साइड में बैठे हैं ना वो हैं ऑस्ट्रेलिया के प्लेयर और जो ओढे बेधे हैं और पल्ले साइड में हैं ये हैं अपने हिन्दुस्तान के खिलाडी. लेकिन पापा धोनी कौन है इसमे से? अरे बेटा वो यहाँ करेगा बाथरूम में बैठा कपडे धो रहा है. अब तू एक काम कर खूब ज़ोर ज़ोर से चिल्ला और मज़े कर मैं थोडी ड्यूटी करके आता हूँ नही तो फालतू लोग स्टेडियम में घुस आयेंगे. और देख इधर उधर मत जाना. ये सीन है बुधवार दोपहर १ बजे फिरोजशाह कोटला स्टेडियम डेल्ही का वेस्ट एंड स्टैंड गेट नो दो का. जहाँ पर ड्यूटी कर रहे एक डेल्ही पुलिस के सिपाही ने अपने परिवार के कुछ सदस्यों को मच के लिए बुलाया था और अपनी गुडिया से बात कर रहा था और उसे समझा रहा था. उस टाइम सचिन ६८ और गंभीर ६४ पर बैटिंग कर रहे थे. इसी बीच सचिन ने एक चौका लगाया. वो गेंद पवेलियन की और गयी. जहाँ पर लोगों को सहवाग के चेहरा नज़र आया. क्यूंकि सहवाग २९ अक्टूबर को खेले गए इस मच की पहली परी में सिर्फा १ रन ही बनाया इसलिए लोगों को थोडी निराशा हुयी थी. बस क्या सहवाग को देखते ही हर कोई चिल्ला उठा वीरू वीरू जब सब चुप हो गए तब एक पाँच साल का बछा बहुत ही बुलंद आवाज़ में बोलता है की ओये वीरू तेरी वसंती कहाँ है? उसकी ये बात सुनकर वहां मौजूद हर कोई हंस पड़ा. ये था मेरा मच का पहला दिन जिसमे ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले दिन २९६ रन बनाये तीन विकेट के नुकसान पर. गंभीर ने पहले दिन शतक जमाते हुए १४९ रन बनाये और ५४ रन बनाकर लाक्स्मन उनका साथ दे रहे थे. सचिन ने भी इस मच में ६८ रन की लाजवाब परी खेली. अमित द्विवेदी

शनिवार, 25 अक्टूबर 2008

बन सकते हो तो राज ठाकरे बनो

जब कोई बच्चा होता है तो उसे उसके परिवार वाले बड़े आदर्शों वाली कहानियाँ सुनते हैं और उसे वैसा आचरण करने के लिए और उसके जैसे बनने के लिए कहते हैं. पर मैंने जब से राज की दादागिरी मुंबई में देखी है तबसे मन कर रहा था कुछ लिखूं और आज मौका मिला तो लिख रहा हूँ. मैं आप सबसे कहना चाहता हूँ की अगर आप कुछ बनना चाहते हैं तो राज ठाकरें बनो. राज एक ऐसा नाम है जो कुछ भी कर सकता है. वो जेल के बाहर घूमने वाला गुंडा है. पर पुलिस उसके सामने कुछ भी नही किसी को वो मर सकता है किसी कोई पीट सकता है कुछ भी किसी कोई कह सकता है कानून और अदालत उसके सामने कोई मायने नही रखते. अब आप ही सोचिये अगर हम सब राज ठाकरे जैसा बन जायें तो देश से पुलिस और कानून की ज़रूरत ख़त्म हो जायेगी. क्यूंकि सरकार तो राज कोई चैलेन्ज कर नही सकती तो उसे कम से कम हम एक गुंडा संप्रदाय का प्रतिन्धित्व करने के कारन चैलेन्ज तो कर पाएंगे. भाई जिस बन्दे में इतनी ताकत है ऐसा बन कर हम भी देश का नाम रोशन करें. इसके बाद फिर हम राज ठाकरे से पंगा भी ले पाएंगे. तो भाइयों मैं आप सबसे अनुरोध करता हूँ की सामने आयें और नही ज्यादा तो एक राज ठाकरे बनकर दिखाएँ क्यूंकि ऐसा करने से ही आप इस देश के शसक्त नागरिक कहलावोगे. तो आवो आज हम सकल्प लें की इंडिया के हर प्रदेश और शहर पर अपनी क्षेत्रीय भाषावों का राग गाकर अपना बर्चस्व कायम करें.
जय राज ठाकरे का नारा लगावोए और देश में सैकडों राज बनावो

सोमवार, 13 अक्टूबर 2008

और वो यमुना me कूद गयी

बात रविवार के रात ११ बजकर १० मिनट की है। मैं अपने नॉएडा स्थित अपने ऑफिस से घर लौट रहा था। जैसे ही मैं नॉएडा टोल ब्रिज के यमुना पुल पर पहुँचा मैंने देखा एक लडकी यमुना के पुल के रेलिंग पर चढ़कर बिना कुछ कहे नीचे छलांग लगा गयी। उसके साथ दो व्यक्ति थे एक की उम्र लगभग २८ साल रही होगी और दूसरे की उम्र ३२ साल से ३६ साल के बीच में थी। ये लोग एक बड़ी गाडी में सवार थे। मैंने सोचा पहले कुछ करूँ पर मैंने उन दोनों बन्दों का रवैया देखकर उनके पास नही गया क्यूंकि उन लोगों ने वहां रुकने वाले लोगों के साथ बत्तमीजी की। मैं थोड़ा जाकर आगे रुक गया और वहां पर ५ मिनट में पोली की जिप्सियां आ गयीं और एक फायर बिग्रेड की गाडी भी आयी। मैंने जब उन लोगों से पुछा की माज़रा क्या है तो उन्होंने कहा की यमुना में कोई गाडी गिर गयी है। मैं उन पुलिस वालों के साथ घटनास्थल की और बढ़ा। मैंने देखा वो दोनों बन्दे एक दूसरे से गले लगकर कर रो रहे थे। मुझे देखते ही उसमे से एक बंद आगे बढ़ा और पूछता है आप कौन हो? मैंने कहा देखो मैं प्रेस से हूँ और मैंने यहाँ देखा कुछ हुआ सो रुक गया। तो उस बन्दे ने मुझसे कहा आप यहाँ से चले जाओ। जब मैं थोड़ा गुस्से में उनसे बात की तो वो बंद मेरे पैर पड़ने लगा और बिनती करने लगा की देखिये भाई साहब मैं पहले ही अपनी भाभी को खो चुका हूँ अब कोई और पंगा नही करना चाहता। यही कहकर वो रोने लगा मुझे उसपर दया आ गयी और मैं वहां से चला आया। एक बार सोचा लावोए अपने अख़बार के दफ्तर में फ़ोन कर दूँ। पर मैंने सोचा रहने दो बेचारे परेशान हैं और मैंने किसी को नही बताया हलाँकि दूसरे दिन अख़बारों में मैंने सिंगल कालम खबर देखि पर उसमे किसी का नाम नही दिया था सिर्फा इतनी इन्फोर्मेशन थी की कोई यमुना में कूद गया है। लगता है इस मामले में पुलिस भी गोलमाल रवैया अपना रही है। अब मुझे ये नही पता लगा की आख़िर वो लडकी यमुना के क्यूँ कूद गयीए। अब आप बताएं मैंने कुछ ग़लत तो नही किया। क्यूंकि मैंने किसी को इसकी ख़बर किसी भी नही दी।
अमित द्विवेदी

रविवार, 12 अक्टूबर 2008

और मैं पहुँचा 'लहरों का सरताज़' बनने

और मैं पहुँचा 'लहरों का सरताज़' बनने ११ अक्टूबर को मैं जब घर पहुँचा तो मैंने अपने मोबाइल में सुबह चार बजे का अलार्म फिट कर दिया क्यूंकि मुझे लहरों का सरताज बनने के लिए ऑडिशन देने जाना था. १२ अक्टूबर को सुबह सुबह मैं चाणक्य पुरी के नवल बाग़ में पहुँच गया. वहां पहले से ही करीबन ४०० लोग लाइन लगाये बैठे थे. मैंने एक भाई से पुछा की क्या यही लाइन है नेशनल जेओगार्फिक चैनल के शो 'लहरों के सरताज़' के ऑडिशन के लिए. उस व्यक्ति ने जवाब दिया जी बिल्कुल. मैंने अपनी गाडी साइड में पार्क की और और मैं भी उन्ही के साथ बैठ गया. जिन बन्दों के साथ मैं बैठा था वो सोनीपत से आए थे ऑडिशन देने. थोड़ी देर बाद हमारी बातचीत शुरू हो गई और हमने गप्पे लगना शुरू कर दिया. बातों बातों में कब सुबह हो गयी पता हेई नही चला. मैंने सुबह ६ बजे देखा तो मेरे पीछे लाइन इतनी लम्बी हो गयी थी की उसमे लोगों के सर के सिवा कुछ और नज़र ही नही आ रहा था. करीबन सात बजे प्रवेश शुरू हो गया और मैं भी सभी के साथ अन्दर पहुँच गया. वहां पर मुझे एक चेस्ट जैकेट दी गयी जिस पर नम्बर लिखा हुआ था. मेरा नम्बर था २४९. मैं वहां पर सबके साथ बैठ गया और आगे के प्रोग्राम् का वेट करने लगा. लगभग आधे घंटे बाद मेरे साथ के करीबन ५०० बन्दों को एक साथ खड़ा करके १६०० मीटर की दौड़ के लिए कहा गया. ये आर्डर हमें नेवी के कुछ अधिकरियों ने दिया. दौड़ शुरू हो गयी. शुरू में बहुत से बच्चे तेज़ी से भागे और सबसे आगे निकल गए पर थोड़ी देर में ही वो थककर या तो बैठ गए या फिर गिर गए. मैं अपने एक ले में दौड़ता रहा कोई जल्दबाजी नही की. जिसका परिणाम ये हुआ की मैं १३ वें नम्बर पर अपने लक्ष्य पर पहुँच गया. इस दौड़ में नियम के मुताबिक ६० लोगों को लेना था. मैंने ये दौड़ जीतकर मानो सारा जहाँ जीत लिया हो. जो जीता था ये रेस सब चिल्ला रहे थे. मैं भी सभी के साथ खुशियाँ मन रहा था. मैं इसलिए खुश था की जो लड़के मेरे साथ सोनीपत वाले लाइन में बहार थे वो भी रेस जीत चुके थे. और हम सब एक साथ मिलकर लंच खा रहे थे. लगभग एक घंटे बाद दूसरे राउंड की प्रक्रिया शुरू हुयी. जिसमे मैं बहार हो गया क्यूंकि उसमे बन्दर बनकर चलना था. वैसे मुझे अभी लगता है की मैं सही था और उन लोगों ने चीटिंग की नही तो मेरा दूसरा राउंड बन्दर वाला भी क्लेअर था. लेकिन ये भी हो सकता है की मैं बाहर हो गया और मन को दिलासा दिलाने के लिए ऐसा कह रहा हूँ. लेकिन जो भी रहा ये मेरी ज़िंदगी का सबसे अनोखा और रोमांचक पल था जिसमे मुझे ये पता चला की हजारों की भीड़ में कैसे कोई एक जीतता है. इस पर मैं इतना ही कहूंगा जय नेवी और जय जवान अमित द्विवेदी

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

आवो चलें शिरडी वाले बाबा के पास

मस्त बहारों का मैं आशिक जो मैं चाहूं यार करूँ ।
मेरी गाडी जो मुझे शिरडी तक ले गयी।

नासिक से २६ किलोमीटर दूर इस घाट पर जाने का आनंद ही अलग है।


मैं जब यहाँ से गुजरा तो ये सुहाना दृश्य देखकर गाडी पर ब्रेक लगा दिया। इस गांव का नाम खोपडी गांव है।








आजकल बरसात का मौसम है। नासिक के आसपास खूब बरसात हो रही है जब से मैं यहाँ आया हूँ भगवान सूर्या के दर्शन नही हुए हैं। शिरडी से ४० किलोमीटर पहले खोपडी गांव के पास एक ऐसी ही अनुपम छठा देखने को मिलती है। अगर आप भक्त होने के साथ प्रकृति प्रेमी हैं तो देर किस बात की ज़ल्दी कीजिये पता नही कब ये बरसात का मौसम चला जाए।

सोमवार, 15 सितंबर 2008

ये कैसा प्यार है?

एक व्यक्ति था वो काफी बुद्धिमान था उसे अपने ऊपर पूरा कांफिडेंस था। जो चाहता था भगवन की दया से उसे सबकुछ मिल जाता था। उसके पिता जी मध्य प्रदेस में एक सरकारी फर्म में चीफ engeener थे। पर उनकी डेथ सिर्फ़ ३९ साल की उम्र में ही हो गयी थी। उस समय वो व्यक्ति १४ साल का था। पर हर चीज़ में अवल रहने वाले उस व्यक्ति ने माँ के पालन पोषण में अपना एक पक्ष कमजोर कर लिया। वो पक्ष था उसकी लड़कियों के प्रति कमजोरी। ठीक समय पर उसकी शादी हो गयी। कुछ सालों बाद उसे एक बेटा भी हुआ। पर पाँच साल बाद उसने अपनी बेवी को तलाक दे दिया उसका क्या कारन था उसका ठीक से मुझे पता नही है। वो औरत अपने बच्चे को छोड़कर चली गयी। उसे तलाक देने के बाद वो व्यक्ति कुछ दिनों तक अकेला रहा। पर अचानक एक दिन उसकी मुलाकात एअरपोर्ट जेट ऐर्वाय्स के लिए काम करने वाली औरत से हो जाती है। ठीक उसी समय उसे उससे प्यार हो गया। बस क्या था कुछ महीने बाद उस लडकी से एक मन्दिर में जाकर महोदय ने गंधर्ब विवाह कर लिया। इस बीवी से महोदय को एक बच्चे हुयी। अपनी इस बीवी के साथ महोदय तीन साल तक रहे। इसके बाद उन्होंने अपनी इस बीवी को इसलिए छोड़ दिया क्यूंकि उन्हें इस बार एक २५ साल की मॉडल से प्यार हो गया कुछ महीने पहले अपनी माँ को साक्षी मानकर उससे विवाह कर लिया। थोड़े दिन उस लडकी ने जिस लिए शादी की थी वो पैसा वैसा बटोर के चलती बनी। जिस व्यक्ति की मैं बात कर रहा हूँ उसके तीन फाइव स्टार होलेल हैं इंडिया में। कई देशों में उसके ब्रान्चेस हैं। दो दिन पहले की बात है लगभग ४५ साल का ये व्यक्ति अपनी नयी बीवी के घर पहुँच गया। जहाँ पर उस नयी बीवी ने उसके साथ रहने से मना कर दिया। बस क्या था महोदय ने अपनी पिस्टल निकाल कर कहा तुम्हारे वगैर मैं नही रह सकता। यही कहकर उन्होंने गोली रविवार को अपने सीने में दाग लिया। गोली उनके दिल की थोड़ी से दूर रहती हुयी पार हो गयी। मुंबई के एक बड़े हॉस्पिटल में वो ज़िंदगी मौत से लड़ रहे हैं। अब आप ही बताएं एक बन्दा जिसके पास इतना सारा पैसा है उसने आपके साथ ऐसा क्यूँ किया। दुनिया की सबसे महँगी गाडियां उस बन्दे के पास हैं। वो मेरा बहुत खास है इसलिए अजीब लग रहा है। पर ये कौन सा प्यार है गलती किसकी है इसमे ये समझ नही आ रहा। इसलिए मैंने सोचा क्यूँ ना आज भड़ास निकला जाए। ये मसालेदार ख़बर नही है एक हकीकत है।
अमित द्विवेदी नासिक से