15 मई तक आए एग्जिट पोल से परेशान बडी पार्टी के नेताओं ने छोटे दलों के नेताओं को पटाने के लिए दूर-दूर तक जाल बिखेरा। एनडीए ने माया से लेकर जयललिता तक से बात कर ली तो वहीं दूसरी ओर यूपीए ने लालू मुलायम और पासवान जैसे लोगों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की। इस जद्दोजहद में एक शाम गुजर गई और वह दूसरी सुबह आ गई जिसका सबको बेसब्री से इंतजार था। पर यह सुबह कुछ ऐसी घटी जिसमें यूपीए सबको भूल गया तो छोटी पार्टियों की जमानत जब्त हो गई। तीसरा मोर्चा चौथा मोर्चा और पांचवें मोर्चे जैसे कुकुरमुत्ते की तरह उगे इन मोर्चों की मिट्टी पलीत हो गई। एनडीए के पीएम इन वेटिंग आडवाणी का दिल इस कदर टूटा की उन्होंने राजनीति से संन्यास लेने का ही मन बना लिया। पर इस चुनाव में सबसे दिलचस्प कहानी बिहार में घटी। लालू यादव जो कि पूरी दुनिया में अपने हिलेरियस अदा के लिए जाने जाते हैं। को बिहार ने ऐसे नकारा कि महोदय अपनी भी एक सीट से हार गए। उनकी पार्टी के पास सिर्फ दो सीटें बचीं। अब कांग्रेस उनको पिफर से रेल मंत्री बनाएगी या नहीं यह कांग्रेस की दया पर निर्भर करता है। क्योंकि अब तो लालू के हाथ में कुछ नहीं रहा। लालू यादव ने रामविलास पासवान के साथ कुछ इस कहावत को चरितार्थ किया, हम तो डूबेंगे ही सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे। पिछले साल पासवान के पास चार सांसदों की फौज थी पर इस बार तो पासवान जी ही संसद से आउट हो गए हैं उनकी पार्टी के पास सिर्फ अब पार्टी का नाम बचा है कोई सीट नहीं। महोदय अपनी भी सीट नहीं बचा सके। ये भी दो गुजरीं शामें जिनका जिक्र हमेशा इतिहास में किया जाएगा कि किस कदर जनता ने बामपंथियों के मुंह पर तमाचा मारकर एक पार्टी को जनाधार दे दिया। इस चुनाव की सबसे बडी खासियल बाहुबलियों का हारना रहा। डीपी यादव और अंसारी जैसे लोगों के मुंह पर जनता ने ऐसा तमाचा जडा है जिसकी चोट इन्हें कई जन्म तक नहीं भूलेगी। ये था जनता का फैसला जिसने कई बडबोलों के मुंह पर ताला लगा दिया है। अब तो मुझे लगता है कि लालू यादव जी किसी हास्य धारावाहिक में बैठकर चुटकुलों को जज करेंगे और पैसे कमाएंगे जैसा कि शेखर सुमन और सिद्धू अब तक करते आए हैं। पर बुरा ही क्या है राजनीति में अगर जनता ने इनके साथ ही यही व्यवहार जारी रखा है तो कुछ न कुछ तो करना ही पडेगा ना।
शनिवार, 16 मई 2009
2009 की दो शामें भुलाए न भूलेंगी
शनिवार, 9 मई 2009
आखिर ओवर स्पीडिंग क्यों करते हैं लोग
आज सुबह मुझे अपने दोस्त सौरव के यहां जाना था। वह दिल्ली के ज्वालानगर में रहता है। सुबह जल्दी जाकर जिम करके आया और तैयार हो गया। बाइक उठाकर सुबह साढे आठ बजे हौजखास से निकला। रास्ते में बहुत ज्यादा भीड नहीं थी आधे घंटे में मैं आईटीओ पुल क्रास करके लक्ष्मी नगर के मोड पर पहुंचा जहां पर कुछ निर्माण कार्य की वजह से रास्ता परिवर्तित किया गया है। इसके चलते एक खतरनाक मोड लक्ष्मीनगर में प्रवेश से पहले बन गया है। मेरे सामने से एक पल्सर बाइक पर सवार दो युवक तेजी के साथ मोड पर आए जिनकी स्पीड 90 से भी उपर रही होगी सडक के साथ डिवाइडर पर टकरा गए। उसमें से एक व्यक्ति की मौके पर ही मौत हो गई जबकि दूसरे युवक को पुलिस हास्पिटल ले गई उसकी हालत बहुत ही नाजुक थी। यह दर्दनाक हादसा सुबह-सुबह देखकर दिल द्रवित हो उठा। उन दोनों युवकों ने हेलमेट नहीं पहना था मुझे ऐसा लगा अगर आज इन भाइयों ने हेलमेट पहना होता तो शायद इनकी जिंदगी बच जाती। इतना कुछ नियम बनने के बाद भी लोग पता नहीं क्यों ओवर स्पीडिंग करके अपनी मौत को दावत दे रहे हैं यह बात समझ से बाहर है। आखिरकार अपने लिए न सही अपने परिवार के लिए तो ऐसा नहीं करना चाहिए। भले ही इस घटना के कुछ घंटे बाद सबकुछ सामान्य हो गया उस रोड पर यातायात गुलजार हो गया पर जिस घर का चिराग भरी जवानी में बुझ गया उस पर क्या गुजरी होगी यह सोचने वाली बात है। आजकल हम लोगों को हर तरह से जागरूक बनाने की बात करते हैं ऐसे मैं लोगों से एक और बात के लिए गुजारिश करना चाहूंगा कि ओवरस्पीडिंग कभी भी किसी के लिए अच्छी नहीं होती अपने अमूल्य जीवन के लिए ऐसा मत कीजिए। मैं पूरे देश को इस माध्यम से यह जागरूकता फैलाना चाहता हूं अगर इस बात को सिर्फ एक ही युवा मान ले तो मेरा प्रयास सार्थक हो जाएगा। आखिरकार जिंदगी के इस सुहाने सफर को हादसे का सफर बनाने का हमारा क्या अधिकार है। आइए प्रण करें हम अपने जीवन को अमूल्य समझेंगे और ओवर स्पीडिंग से हमेशा बचेंगे। इसके साथ ही मैं इस घटना के शिकार हुए युवकों के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए यही गुजारिश करुंगा कि इस मुश्किल घडी में भगवान उनको धैर्य दे।
गुरुवार, 7 मई 2009
इसलिए लोग बन जाते हैं पप्पू
रात में सोते समय मैंने अपना मतदाता पहचान पत्र निकालकर बाहर रख दिया क्योंकि मुझे ब्रहस्पतिवार की सुबह वोट देने जाना था। सुबह होते ही बडे उत्साह के साथ पोलिंग बूथ पर पहुंचा पर उन लोगों ने मुझे निराश कर दिया। क्योंकि ऐन वक्त पर भाइयों ने बूथ ही बदल दिया एमसीडी स्कूल के बजाय पोंलिंग बूथ लक्ष्मण पब्लिक स्कूल में भेजा। बहुत से लोगों को जिसे पहले एमसीडी स्कूल वाला पता बताया गया था सब वहीं पहुंचे जिसके बाद सबको लक्ष्मण पब्लिक स्कूल भेजा गया। बहुत से लोग तो नाराज होकर पप्पू बन गए और फैसला कर लिया कि वोट नहीं करेंगे। यहां की दुर्व्यवस्था देखकर मुझे लगा कि बहुत सारे पोलिंग स्टेशनों पर सरकार के तरफ से बरती जाने वाली इन अनियमितताओं के चलते बहुत से लोग वोट नहीं करते। यहां पर मुझे लगा कि पप्पू वाले विज्ञापनों के साथ-साथ सरकार को इन चीजों पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। जिससे बहुत से लोगों को वोट करने में सहूलियत मिल सके। पर एक बात इस बार मुझे बहुत अच्छी लगी मैंने वोटिंग करते हुए बहुत से ऐसे लोगों को देखा जो कि वोटिंग प्रणाली में इसके पहले भरोसा नहीं करते। एक एलीट क्लास वोट करने के लिए निकली। मेरे एक दोस्त का फोन आया मैंने उससे पूछा भाई कहां उसका जवाब मिला वोट करने के लिए लाइन में लगा हूं एक घंटे में फ्री हो जाएगा। मेरे इस दोस्त को इस बात की खुशी थी कि वह पहली बार वोट कर रहा है। इससे पता चलता है कि लोग अब पप्पू बनने से कितना दूर रहना चाहते हैं। वैसे पप्पू कहलाने से तो अच्छा ही है कि हम अपने मताधिकार का प्रयोग कर दिया करें। आखिर ये देश तो हमारा ही है घटिया लोग यहां आएंगे तो इससे देश का बंटाधार हो जाएगा। हम अपने अधिकार का प्रयोग करते रहे तो एकदिन जिन नेताओं का हम सपना देखते हैं वैसे नेताओं का निर्माण शुरू हो जाएगा। अभी तो यह शुरुआत है जिसमें सभी को अपना योगदान देने की जरूरत है। अंत में यही कह सकता हूं कि पप्पू वोट कर सकता है।
शनिवार, 2 मई 2009
आओ मिलकर खरीदें कोलकाता नाइट राइडर्स

कोलकाता नाइट राइडर्स के मालिक शाहरुख खान अपनी टीम केलचर प्रदर्शन से इस कदर आहत हैं कि अब वे अपनी इस प्यारी टीम को बेंचने का सपना संजोने लगे हैं। हो सकता है कि कुछ दिनों में शाहरुख अपनी टीम को बेंचने के लिए बाजार में आ भी जाएं तो मैंने सोचा कि क्यों न शाहरुख की इस टीम को हम खरीद लें। मैंने यहां पर हम इसलिए कहा क्योंकि मेरे अकेले की बस की 300 करोड़ की टीम खरीदना तो है नहीं इसलिए सोचा चलो हम सभी ब्लागर बंधु मिलकर अपनी एक आईपीएल की टीम खरीद ही लेते हैं।
देखो भाई हमारे पास पैसे भले ही कम हैं लेकिन अगर एक साथ मिलकर हजारों लोग पैसा लगाएंगे तो एक आईपीएल की टीम को हम आसानी से खरीद सकते हैं। इसके बाद हम अपनी टीम मैदान में उतारेंगे मुझे पता है कि किंग खान की यही हारी हुई टीम हमारे लिए मैच जीतकर ढ़ेर सारा मुनाफा कमाएगी जिसे हम बराबर-बराबर बांटेंगे। मैं चाहता हूं कि आटिüकल को आप गंभीरता से लें मेरी इस बात में दम है यह मानकर आप सब मेरा साथ दें। साथियों अगर एक बार मेरा साथ आपने दिया तो एक पूरी दुनिया में हम कम पैसे वाले लोग एकता का परिचय देकर यह बता देंगे कि देखो एकता में कितनी शçक्त है। अगर आप हमारे साथ हैं तो बस हां कीजिए और एक पोस्ट के जरिए अपना पता और फोन नंबर हम तक पहुंचाइए एक लीगल प्रक्रिया के तहत मैं वादा करता हूं कि शाहरुख की कोलकाता नाइट राइडर्स को हम खरीदने के लिए कदम उठाएंगे। अभी मुझे आपसे पैसे से अधिक सहयोग की जरूरत है। हो सकता है कि आपको मेरी ये बात सिर्फ कोरी कल्पना ही नजर आ रही हो। पर जिस तरह से आप एक कंपनी में शेयर खरीदने के लिए हजारों लाखों रुपए लगाते हैं तो अपनी टीम के लिए कुछ सौ रुपये अपने जेब से नहीं निकालेंगे। अभी आप हां करें पैसा नहीं देना है। अगर एकता में शçक्त नजर आई तो आम आदमी की टीम आईपीएल में खेलेगी। जिसका फायदा हम सबको होगा और हम गर्व से कह सकेंगे कि हम मध्यमवगीüय लोग कितनी ताकत रखते हैं। तो आइए मेरे सुर में सुर मिलाइए और आईपीएल की एक टीम खरीदने के लिए हाथ बढ़ाइए। यह मेरा नहीं आम आदमी का सपना है जिसे साकार करने में सिर्फ आम आदमी ही मददगार साबित हो सकता है। देर मत कीजिए अपना नाम फोन नंबर और ईमेल केसाथ हमें मेल कीजिए या फिर कमेंट में पोस्ट कीजिए। मेरा पता है adwivedi09@gmail.com
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कोलकाता नाइट राइडर्स
शनिवार, 18 अप्रैल 2009
मंगलवार, 7 अप्रैल 2009
जनरैल ने जो किया वो एकदम सही किया
जनरैल सिंह ने जो किया वह एकदम सही है। सिखों की बात कोई सुनने का प्रयास तो कर नहीं रहा है। सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर जैसे खुले भेçड़ये समाज में घूम रहे हैं जिन पर सरकार का कानून भी नहीं चलता। ऐसे में सिर्फ एक रास्ता बचता था जो कि जनरैल ने अपनाया। हो सकता है कि यह उनकी सोची समझी चाल हो पर कुछ भी हो यह एक ऐसे जायज आक्रोश का नतीजा है जिसे पूरे देश ने देखा। यह बात दूसरी है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया केटुटपुजिए पत्रकारों ने उन्हें किसी अखबार का तथाकथित पत्रकार कहा जो कि एक वरिष्ठ पत्रकार केमर्यादा के खिलाफ है। इलेक्ट्रानिक मीडिया केछिछोरे पत्रकार जिनकी समाज में सिर्फ एक हास्यास्पद इमेज है उन्होंने इसे अनैतिकता भरा करार दिया जबकि वे अपनी गिरेबान झांकना भूल गए कि वे कितने नैतिक हैं। गृहमंत्री पर जनरैल ने जूता नहीं मारा बल्कि उनकेऊपर जूता उछाला था जिसमें उनका मकसद सिर्फ एक संदेश देना था न कि उनको मारना इसलिए किसी भी कीमत पर इसे अनैतिक नहीं कहा जाना चाहिए। हो सकता है कल जागरण उन्हें नौकरी से निकाल दे क्योंकि वह अखबार अपनी साख पर आंच नहीं आने देना चाहता पर जो किसी का जज्बा था वह खुलकर सामने आ चुका है। मुझे नहीं लगता कि जनरैल ने हीरो बनने के लिए यह सब किया है यह एक व्यçक्त की त्वरित प्रतिक्रिया थी जो कि गुस्से के रूप में निकली है इसका समान होना चाहिए तथा इस पर हर किसी को गंभीरता से विमर्श करना चाहिए बजाय कि जनरैल की निंदा करने के।
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जनरैल
शनिवार, 4 अप्रैल 2009
अगर आप वोट नहीं दे रहे हैं तो सो रहे हैं

मैंने दिल्ली में संपन्न हुए कुछ माह पूर्व विधान सभा चुनावों के लिए एक बुजुर्ग महिला से कहा,`चलो आज मैं आपको वोट दिलवाकर लाता हूं।` महिला ने जवाब दिया,`बेटा आई हैव नो इंट्रेस्ट इन वोटिंग, बीकाज आई नो आल लीडर्स आर कोरप्ट। सो व्हाई आई शुड गो देयर टू वेस्ट माई टाइम।` बुजुर्ग महिला की ये बातें सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। वे एक अच्छे परिवार से संबंध रखती हैं उनके पति आईएस आफीसर थे दुनिया के न जाने कितने देशों की वे सैर कर चुकी हैं। पर उनका वोटिंग के प्रति रवैया देखकर मुझे बहुत बुरा लगा। लोक सभा चुनावों को लेकर हर नेता न जाने कहां-कहां चुनाव प्रचार में जा रहे हैं। वोटरों को रिझाने के लिए न जाने कौन-कौन से हथकंडे अपना रहे हैं। आपको एक बात जानकर हैरानी होगी जो लोग इन नेताओं का भविष्य तय करते हैं उसमें से अधिकतर लोग अशिक्षित या गंवार हैं। किसी ने कहा हम मंदिर बनवा देंगे तो उनका भगवान प्रेम जग गया। किसी ने कहा हम तुहें आरक्षण दिलवाएंगे तो वोटर उधर चला गया। बहुत से वोटर जो खामोश रहते हैं उनको दारू की जरूरत होती है ऐसे अधिकतर वोटर महानगरों के झुग्गी झोपडियों का हिस्सा हैं। अब आप ही सोचिए सरकार किसने बनाया? जवाब मिलेगा सरकार उसने बनाया जिसे कोई फैसला लेने का सलीखा नहीं बस थोड़े से लाभ के लिए वे पार्टियों के साथ हो लिए। माना हर तरफ भ्रष्ट नेता हैं पर आप नजर दौड़ाएं तो उसमें से एक निर्दलीय प्रत्यासी भी आपको लिस्ट में जरूर मिलेगा जिसकी इमानदारी का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि वह करोड़ों रुपये चुनाव अभियान पर नहीं फूंक रहा है। आप अगर वोट देंगे तो बड़े नेताओं को उनकी औकात समझ में आ जाएगी। अगर आप सिर्फ ये सोचकर घर में बैठे हैं कि सब भ्रष्ट हैं मैं किसको वोट दूं तो इसका मतलब है कि आप सो रहे ऐसे निर्जीव प्राणी हैं जिन्हें अपने आसपास का माहौल अच्छा करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। आप निकम्मे और डरपोक इंसान हैं जिसमें कोई फैसला करने की हिम्मत नहीं है। भाई मत दो भ्रष्ट आदमी को वोट पर वोट जरूर दो कम से एक बार देकर तो देखो इस राजनीति की कितनी अहम कड़ी हैं इसका अंदाजा आपको लग जाएगा। मत बनाओ भ्रष्ट नेता अपने में से किसी को निकालो जो इमानदार हो उसे वोट दो पर यह पुण्य का काम जरूर करो। देश के हर युवक की यह जिम्मेदारी है कि वह मताधिकार को अपने आने वाली पीढ़ी में बोझ की तरह नहीं बल्कि एक संस्कार केरूप में ढ़ाले जिससे मताधिकार को लोग अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझें। यह मेरा एक अभियान है उम्मीद करता हूं इसके माध्यम से आप एक जागरूक समाज को बनाने में अहम रोल निभाएंगे। तो आइए मेरे साथ और प्रण कीजिए की वोट देना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम इसे देखकर रहेंगे।
मंगलवार, 31 मार्च 2009
ये वही शमशाद बेगम हैं

तेरी महफिल में किस्मत आजमाकर हम भी देखेंगे...., सइयां दिल में आना रे..., बूझ मेरा क्या नाम रे...., मेरे पिया गए रंगून किया है वहां टेलीफून...., एक दो तीन आज मौसम है रंगीन...., बूझ मेरा क्या नाम रे..., कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना....। इन गीतों केये अमर बोल पढ़कर आपने यह अंदाजा लगा लिया होगा कि मैं किसकी बात कर रहा हूं। हां आप एकदम सही सोच रहे हैं मैं बात कर रहा हूं महान गायिका शमशाद बेगम की। जैसे ही इन गीतों को मैं सुनता हूं मुझे उनके बारे में याल आने लगता है। अचानक आज(31 मार्च 2009) जब मैंने अपने आफिस में न्यूज प्रो आन करकेतस्वीरें चेक करनी शुरू की तो मुझे शमशाद बेगम की व्हील चेयर पर बैठे पुरस्कार लेते हुए एक तस्वीर दिखाई दी। इस तस्वीर को देखकर मैं खुश हो गया क्योंकि मैं इस गायिका के बारे मे न जाने कितने लोगों से सवाल कर चुका हूं पर किसी ने भी मुझे उनकेबारे में कोई जानकारी नहीं दी। मैं कई बार मुंबई गया और इस महान गायिका का साक्षात्कार करना चाहा पर मुझे कोई क्लू नहीं मिला। पर आज इस गायिका को रास्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल के हाथों समानित होते देखना काफी अच्छा लगा। शमशाद बेगम को 2009 का पद्म भूषण समान दिया गया है। मैं ऐसे बहुत से पुराने कलाकारों के बारे में जानने की वाहिश रखता हूं जो अभी इस दुनिया मे हैं पर मुझे लगता है कि बहुत से कलाकार धीरे-धीरे गुमनामी केअंधेरे में खो गए हैं। पर ये जानकर अच्छा लगा कि चलो सरकार अभी इस महान गायिका को भूली नहीं है। मुझे सबसे अधिक उस समय लगा जब 2007 में महान भजन गायक श्री हरिओम शरण जी का निधन हो गया उनकी इस खबर का पता भी नहींं चला। अखबारों ने उनकी सिंगल कालम खबर तक नहीं छापी न ही टेलीवीजन चैनलों ने उसे कवर किया। पर हां किसी भलेमानुष ने उनका 5 सेकंड का वीडियो अंतिम यात्रा का यू ट्यूब पर जरूर पोस्ट कर दिया जिससे बहुत से लोगों को धीरे-धीरे यह पता चल रहा है कि एक हरिओम जी अब हमारे बीच नहीं रहे। आखिर कलाकारों के प्रति ऐसी उदासीनता क्यों?
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ये वही शमशाद बेगम हैं
रविवार, 29 मार्च 2009
रविवार, 22 मार्च 2009
एक थी जेड गुडी.....

रियालिटी टीवी शो कलाकार के रूप में प्रसिद्ध पाने जेड गुडी को मौत की सच्चाई का आभास उस समय हुआ जब उन्हें पता चला कि वह कैंसर से जूझ रही हैं। पर गुडी ने अपनी बीमारी के दौरान वह सबकुछ जी लिया जिसे वह चाहती थीं। हर किसी की तरह वह मरना नहीं चाहती थीं पर मौत थी कि वह उनसे अपना रिश्ता बनाने को बेकरार थी। मरना हर किसी को है यह सच्चाई है पर मौत जब बताकर आती है तो वह कितनी कारुणिक होती है उसका अंदाजा गुडी की मौत को देखकर लगाया जा सकता है। गुडी की पंक्तियाँ जो उन्होंने अपने मौत के लिए कहीं थीं वह लोग एक सूक्ति बचन के रूप में हमेशा याद करेंगे। गुडी ने मरने से पहले कहा,`इतने कम उम्र में मर रही हूं इसका मुझे अफसोस है पर कम जिंदगी में मैंने इतना कुछ पा लिया इसका मुझे गर्व है।' मरने से पहले गुडी ने शादी रचाई, जिसके लिए बुरा सोचा तथा जिससे लड़ाई की थी उन सभी से माफी मांगकर सभी के दिलों पर छा गईं। शिल्पा के साथ उन्होंने जो किया था उसके लिए चलकर भारत आईं और यहां के हिंदी के एक शो में पूरे भारत को अपना सकारात्मक पहलू दिखाना चाहती थीं। पर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था और बिग बॉस उनकी जिंदगी का आखिरी रियालिटी शो बन गया। बिग बॉस का बुलावा आया तो गुडी कंफेशन रूप में गईं पर वह बुलावा बिग बॉस का नहीं बल्कि भगवान का था जिसने गुडी को चेतावनी दे दी कि अब तुम्हारे पास कुछ महीने बचे हैं जितना जीना है जी लो। शायद गुडी की अंतर्रात्मा ने उसे बता दिया था कि अब उसकी कहानी में सिर्फ एक दुखद अंत के सिवा कुछ और नहीं है। गुडी ने एक मां का रोल निभाते हुए बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने का प्रयास करती रहीं। जब डाक्टरों ने कहा कि उनकी जिंदगी में अब सिर्फ कुछ घंटे शेष हैं तो वह अस्पताल से अपने घर चली गईं और वहीं पर अंतिम सांस ली। खबरों के मुताबिक अपनी अंतिम सांस लेने से पहले तक गुडी अपने बच्चों से बात करती रहीं। इसी बीच उनकी सांसे रुक गईं और माहौल आंसुओं में डूब गया। गुडी के प्रवक्ता मैक्स ने इस खबर की पुष्टि की। दो बच्चों की मां 27 साल की गुडी ने दक्षिणी इंग्लैंड में स्थित अपशायर के अपने पैत्रिक गांव में अंतिम सांस ली। अंतिम समय में उनके पति जैक ट्वीड, मां जैकी बडेन और पारिवारिक दोस्त केविन उनके साथ थे। गुडी की मां ने कहा,`मेरी खूबसूरत बेटी हमेशा के लिए शो गई।' फोर्ड ने कहा कि यह कितना विचित्र संयोग है कि गुडी की मौत `मदर्स डें के दिन हुई। एक मां के तौर पर गुडी ने अपने दो बच्चों-पांच साल के बॉबी और चार साल के फ्रेडी के बेहतर भविष्य के लिए अपनी शादी के लाइव प्रसारण तथा अपने परिवार के चित्रों के प्रकाशन के लिए मीडिया के साथ लाखों डॉलर का करार किया था। फोर्ड ने कहा, ``मेरे हिसाब से गुडी को मजबूत दिल वाली युवा लड़की के तौर पर याद किया जाएगा। वह बहुत बहादुर थीं। उन्होंने मौत का ठीक उसी तरह सामना किया, जिस तरह उन्होंने अपना बहादुरी भरा जीवन जिया था।' इसी के साथ गुडी और टीवी के बीच जो अटूट रिश्ता बना था, वह उनकी मौत तक कायम रहा। रिएलिटी शो कार्यक्रमों के माध्यम से लोकप्रियता हासिल करने के बाद गुडी ने अपने साथी कलाकार जेफ बैरिजर से शादी की। दो बच्चों की मां गुडी ने कई फिटनेस डीवीडी जारी किए। उन्होंने न सिर्फ अपना सैलून खोला, बल्कि अपनी जीवनी-`जेड-माइ ऑटोग्राफीं भी लिखी। उनकी जीवनी भी प्रकाशित हुई थी। इसके बाद गुडी ने अपने नाम पर परफ्यूम जारी किया। उन्होंने इसे `शश..जेड गुडीं नाम दिया। वर्ष 2007 में गुडी अपने करियर के सबसे बड़े विवाद में उलझीं, जब उन्होंने `सेलीब्रेटी बिग ब्रदरं कार्यक्रम के दौरान शिल्पा के खिलाफ नस्लीय टिप्पणी की थी।इसके बाद हालांकि गुडी ने शिल्पा के साथ संबंध सुधारने के कई प्रयास किए। भारत जाकर गरीब बच्चों की मदद करना उनके इसी प्रयास के तहत उठाया गया एक कदम था। पिछले साल वह `बिग बॉसं कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए भारत गई थीं लेकिन कैंसर का पता चलने के बाद वह इलाज के लिए स्वदेश लौट आई थीं। यह उनके करियर का अंतिम रिएलिटी कार्यक्रम था। भारत में रहने के दौरान गुडी ने हिंदी सीखने के अलावा भारतीय नृत्य शैली सीखे की कोशिश की। `बिग बॉसं कार्यक्रम के दौरान उन्हें `गुडिया की संज्ञा दी गई थी। पिछले महीने ही गुडी ने अपने बचपन के प्रेमी जैक ट्वीड से शादी रचाई थी।
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एक थी जेड गुडी.....
शनिवार, 14 मार्च 2009
बुढ़ापे का प्यार ठरक्पन नहीं है क्या???
आज(शनिवार 14 मार्च) जब मैंने अपना जीमेल का अकाउंट लागिन किया तो उसमें एक बड़े भाई केचैट स्टेटस में कुछ इस तरह की लाइनें नजर आ रही थीं(मेरे टूटे हुए दिल से, कोई ये आज तो पूछे कि तेरा हाल क्या है, कि तेरा हाल क्या है...)। मैंने उनको बोला भाई इस उम्र में आपका ये हाल किसने किया? इस पर उन्होंने जवाब दिया कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती। भाई साहब शादी शुदा हैं उनको मैं करीब से जानता हूं लड़कियों में कोई खास दिलचस्पी नहीं रखते फिर भी मेरे से इस बात पर उलझ पड़े कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती। आपने अक्सर इस वाक्य को सैकड़ों अधेड़ या फिर बुजुर्ग लोगों के मुंह से सुन रखा होगा। मैंने जवाब दिया नहीं प्यार की उम्र होती है कि अगर सही समय में 25, 30 साल की अवस्था तक आपको प्यार नहीं हुआ और इसकेबाद आप प्यार सिर्फ ये बात सोचकर करना चाहते हो कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती तो मुझे ये गलत लगता है। मेरा मानना है कि एक उम्र के बाद होने वाला प्यार सिर्फ ठरक्पन है। अब उदाहरण के तौर पर कई नामों को गिनाया जा सकता है पर मैं मौजूदा परिप्रेक्ष्य में चांद मोहमद और फिजा मोहमद केठरकी प्यार की ही बात यहां पर करूंगा। प्यार की उम्र होती है यह बात इनकी ऊलजुलूल कहानी से पता चलता है। आफिस में एक लड़की अपने बूढ़े या अधेड़ बास से सिर्फ प्रमोशन केलिए दोस्ती करती है। हिंदी मीडिया में इसे हर जगह कोई भी देख सकता है लड़की देखी बास की सारी जवानी की तमन्नाएं जवां हो गईं। कोई उनका जानने वाला मिला तो चाय केसमय पर यह बात भी कहना नहीं भूले कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती। घर में उसी उम्र की लड़की है जिससे महोदय प्यार की पीगें लड़ाने की कोशिश कर रहे होते हैं। जो लड़कियां समझौतरा नहीं करतीं वे या तो संस्थान से विदा हो जाती हैं या फिर उन्हें बदनाम करके निकाल दिया जाता है। ये सिर्फ इसलिए कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती। मैं दुनिया का सबसे बड़ा ठरकी आदमी सलमान रुश्दी को मानता हूं उनकेसाहित्य में क्या दम है सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ना चाहता कि जिसका आचरण इतना घिनौना है तो उस व्यçक्त की लेखन शैली कितनी घटिया होगी। `प्यार की कोई उम्र नहीं होती´ इस वाक्य केनाम पर प्यार को बदनाम करने वालों की दुनिया में कमी नहीं है। पर आपको एक चीज बता दूं ये निशŽद वाला प्यार सिर्फ उसी समय साकार रूप लेता है जब बूढ़ा बंदा पैसे वाला होता है या फिर उसके हाथ में पावर होती है। इस उदाहरण में चाहे सलमान रुश्दी को देख लो या फिर मटुक नाथ या चांद मोहमद की उदाहरण ले लो। ऐसे में मैं आप से जानना चाहता हूं कि क्या सच में प्यार की कोई उम्र नहीं होती? क्या यह सही है जिसे एक बुजुर्ग व्यçक्त को अपनी बेटी वाला प्यार देना चाहिए वह उससे पत्नी की तरह व्यवहार करना चाहता है। मेरे बातचीत के बीच में भाई साहब ने खफा होकर कहा राधा-कृष्ण की शादी नहीं हुई थी। पर वे एक दूसरे से प्यार करते थे उनकी इस बात पर मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि कृष्ण भगवान ने इसके अलावा कई और बड़े काम किए थे जिसमें कंस के सहित ढेरों राक्षसों का बध शामिल है। अगर हम उनकेइस आचरण को नहीं अपना सकते तो बुरे आचरण पर ध्यान केंद्रित क्यों करते हैं। मैंने तो लिख दिया कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती यह सही है या गलत इस पर मेरी यह राय है। अब आप बताएं कि आपको क्या लगता है।
सोमवार, 9 मार्च 2009
अयोध्या के विकास की अनदेखी क्यों?
अयोध्या के विकास की अनदेखी क्यों?
अमित द्विवेदी
अगर वेदों पुराणों की बातों पर आस्था रखते हुए भरोसा किया जाए तो अयोध्या भगवान राम की जन्मस्थली है। यह उत्तर प्रदेश के अन्य धार्मिक शहरों मथुरा, वृंदावन वाराणसी और इलाहाबाद के तरह ही एक आस्था की नगरी है। पर अब इस शहर को लोग सिर्फ विवादित शहर के रूप में जानते हैं। भाजपा जब कभी मौका मिलता है राम मंदिर निर्माण की बात करकेअयोध्या का नाम कुछ दिनों केलिए सुर्खियों में ला देता है। अन्य पार्टियां इससे अपने जनाधार को मजबूत बनाए रखने के लिए इसे भाजपा का घर समझकर अपनी दूरी बनाकर रखती हैं। इसकेचलते इस शहर का विकास अवरुद्घ हो गया है। दो दशक पहले जहां यह शहर धर्मनिरपेक्षता की मिसाल बना हुआ था वह आज अपने उद्घार केलिए तरस रहा है। पांच हजार से भी अधिक मंदिरों वाले इस अद्ïभुत शहर में इन विवादों केचलते न पर्यटक आना पसंद करते हैं न ही प्रदेश सरकार इसकेविकास को जरूरी समझती है। मैंने इस शहर को बहुत करीब से देखा है। बीस साल पहले अयोध्या के राम की पैड़ी आसपास केशहरों में एक रमणीक स्थल के रूप में वि यात थी। यहां पर लोग दूर-दूर से तैरने व जल क्रीड़ा करने के लिए आते थे। सरयू तट से सटी इस पैड़ी केपार्कों की हरी-भरी घासें और रंग बिरंगी लाइटों से इंद्रधनुषी छटा बिखेरते फव्वारे लोगों का मन मोह लेते थे। उस समय शाम होते ही यहां का नजारा मेले में तब्दील हो जाता था।पर अब यहां का माहौल बदल चुका है। इस पैड़ी से अब सिर्फ बदबू आती है और लोग अपने घरों के कूड़ेदान केरूप में इसका इस्तेमाल करते हैं। हर किसी को लगता है कि यहां केलोग राम मंदिर बनवाने केपक्ष में हैं। पर ऐसा नहींं है यहां केलोग शांति और स्वच्छता चाहते हैं। पूरे देश की तरह यहां पर मुस्लिम आबादी केसाथ-साथ कई धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। इस शहर केभाईचारे को अगर उदाहरण के रूप में देखा जाए तो इससे बड़ा धर्मनिरपेक्ष शहर कोई पूरी दुनिया में नहीं देखने को मिलेगा। तुलसी की माला, भगवान राम की तस्वीरें, धार्मिक कैसेटें और सीडी तथा चंदन की लकड़ी बेंचकर ना जाने कितने मुस्लिम परिवार यहां पर अपनी रोजी रोटी कमा रहे हैं। अब इन लोगों से अगर शहर केसाधुओं और वहां की जनता को परेशानी नहीं है तो फिर ये पार्टियां इस शहर के पारिवारिक माहौल को खराब करने की कोशिश क्यों करती हैं? यह बात मुझे आज तक समझ में नहीं आई। मैं नहीं कहता कि यहां पर राम मंदिर बने या फिर मस्जिद बने। पर अगर इस शहर की मान्यता के अनुरूप इसे पर्यटकों केलिए संवारा जाए तो क्या बुरा है। इस शहर में पर्यटकों का टोटा सिर्फ इसलिए है क्योंकि यहां पर सुविधाएं न के बराबर हैं। अगर भूले भटके राम की नगरी में आ भी जाए तो वह दोबारा और किसी को इस शहर में नहीं आने देने के लिए प्रेरित करेगा। भाजपा यहां पर एक मंदिर की बात करती है जबकि इस शहर को मंदिरों का शहर कहा जाता है। यहां केहर घर मे मंदिर है। कई किलोमीटर दूर से ही इन मंदिरों पर लगे चमकते खूबसूरत कलश एक धार्मिक शहर होने का लोगों को अहसास कराते हैं। अयोध्या के कई प्राचीन मंदिर धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होते जा रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि इन मंदिरों को बचाने की बजाय सिर्फ एक मंदिर पर ध्यान क्यों केंद्रित किया जा रहा है। भाजपा के राम मंदिर केराग का प्रभाव इस शहर की व्यवस्था पर पड़ रहा है क्योंकि प्रदेश की सत्ता में काबिज होने वाली अन्य पार्टियों की सरकारें इस शहर को उपेक्षित कर देती हैं उन्हें लगता है कि इससे उनका जनाधार कम होगा। कल्याण सरकार के शासनकाल में कुछ करोड़ रुपये अयोध्या केलिए पास हुए थे जिससे सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए सरयू तट पर कई तरह के निर्माण कार्य कराए गए पर अब व निर्माण धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं। मेरा मानना है कि इस शहर को एक पर्यटन स्थल के रूप में देखते हुए सरकार को इसकेविकास पर ध्यान देना चाहिए जिसकेमाध्यम से पर्यटकों को इस खूबसूरत शहर की ओर आकर्षित किया जा सके।
अमित द्विवेदी
अगर वेदों पुराणों की बातों पर आस्था रखते हुए भरोसा किया जाए तो अयोध्या भगवान राम की जन्मस्थली है। यह उत्तर प्रदेश के अन्य धार्मिक शहरों मथुरा, वृंदावन वाराणसी और इलाहाबाद के तरह ही एक आस्था की नगरी है। पर अब इस शहर को लोग सिर्फ विवादित शहर के रूप में जानते हैं। भाजपा जब कभी मौका मिलता है राम मंदिर निर्माण की बात करकेअयोध्या का नाम कुछ दिनों केलिए सुर्खियों में ला देता है। अन्य पार्टियां इससे अपने जनाधार को मजबूत बनाए रखने के लिए इसे भाजपा का घर समझकर अपनी दूरी बनाकर रखती हैं। इसकेचलते इस शहर का विकास अवरुद्घ हो गया है। दो दशक पहले जहां यह शहर धर्मनिरपेक्षता की मिसाल बना हुआ था वह आज अपने उद्घार केलिए तरस रहा है। पांच हजार से भी अधिक मंदिरों वाले इस अद्ïभुत शहर में इन विवादों केचलते न पर्यटक आना पसंद करते हैं न ही प्रदेश सरकार इसकेविकास को जरूरी समझती है। मैंने इस शहर को बहुत करीब से देखा है। बीस साल पहले अयोध्या के राम की पैड़ी आसपास केशहरों में एक रमणीक स्थल के रूप में वि यात थी। यहां पर लोग दूर-दूर से तैरने व जल क्रीड़ा करने के लिए आते थे। सरयू तट से सटी इस पैड़ी केपार्कों की हरी-भरी घासें और रंग बिरंगी लाइटों से इंद्रधनुषी छटा बिखेरते फव्वारे लोगों का मन मोह लेते थे। उस समय शाम होते ही यहां का नजारा मेले में तब्दील हो जाता था।पर अब यहां का माहौल बदल चुका है। इस पैड़ी से अब सिर्फ बदबू आती है और लोग अपने घरों के कूड़ेदान केरूप में इसका इस्तेमाल करते हैं। हर किसी को लगता है कि यहां केलोग राम मंदिर बनवाने केपक्ष में हैं। पर ऐसा नहींं है यहां केलोग शांति और स्वच्छता चाहते हैं। पूरे देश की तरह यहां पर मुस्लिम आबादी केसाथ-साथ कई धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। इस शहर केभाईचारे को अगर उदाहरण के रूप में देखा जाए तो इससे बड़ा धर्मनिरपेक्ष शहर कोई पूरी दुनिया में नहीं देखने को मिलेगा। तुलसी की माला, भगवान राम की तस्वीरें, धार्मिक कैसेटें और सीडी तथा चंदन की लकड़ी बेंचकर ना जाने कितने मुस्लिम परिवार यहां पर अपनी रोजी रोटी कमा रहे हैं। अब इन लोगों से अगर शहर केसाधुओं और वहां की जनता को परेशानी नहीं है तो फिर ये पार्टियां इस शहर के पारिवारिक माहौल को खराब करने की कोशिश क्यों करती हैं? यह बात मुझे आज तक समझ में नहीं आई। मैं नहीं कहता कि यहां पर राम मंदिर बने या फिर मस्जिद बने। पर अगर इस शहर की मान्यता के अनुरूप इसे पर्यटकों केलिए संवारा जाए तो क्या बुरा है। इस शहर में पर्यटकों का टोटा सिर्फ इसलिए है क्योंकि यहां पर सुविधाएं न के बराबर हैं। अगर भूले भटके राम की नगरी में आ भी जाए तो वह दोबारा और किसी को इस शहर में नहीं आने देने के लिए प्रेरित करेगा। भाजपा यहां पर एक मंदिर की बात करती है जबकि इस शहर को मंदिरों का शहर कहा जाता है। यहां केहर घर मे मंदिर है। कई किलोमीटर दूर से ही इन मंदिरों पर लगे चमकते खूबसूरत कलश एक धार्मिक शहर होने का लोगों को अहसास कराते हैं। अयोध्या के कई प्राचीन मंदिर धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होते जा रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि इन मंदिरों को बचाने की बजाय सिर्फ एक मंदिर पर ध्यान क्यों केंद्रित किया जा रहा है। भाजपा के राम मंदिर केराग का प्रभाव इस शहर की व्यवस्था पर पड़ रहा है क्योंकि प्रदेश की सत्ता में काबिज होने वाली अन्य पार्टियों की सरकारें इस शहर को उपेक्षित कर देती हैं उन्हें लगता है कि इससे उनका जनाधार कम होगा। कल्याण सरकार के शासनकाल में कुछ करोड़ रुपये अयोध्या केलिए पास हुए थे जिससे सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए सरयू तट पर कई तरह के निर्माण कार्य कराए गए पर अब व निर्माण धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं। मेरा मानना है कि इस शहर को एक पर्यटन स्थल के रूप में देखते हुए सरकार को इसकेविकास पर ध्यान देना चाहिए जिसकेमाध्यम से पर्यटकों को इस खूबसूरत शहर की ओर आकर्षित किया जा सके।
शनिवार, 7 फ़रवरी 2009
ओए दूर रह नहीं तो लोग क्या कहेंगे
पता है अंकल आज मैंने आपकेबेटे को एक मॉल में एक लड़के के साथ देखा दोनों आपस में बातें कर रहे थे और गले भी मिल रहे थे। थोड़ी देर बाद दोनों मैक्डोनाल्ड में गए जहां उन्होंने एक साथ बैठकर बर्गर खाया। यह सुनते ही अपनी पत्नी को आवाज लगाते हुए कहा अजी सुनती हो देखो हम बबाüद हो गए। यह सब कुछ तुहारा किया कराया है कहा था बेटे को लड़कों केसाथ खेलने बाहर मत भेजा करो पर तुमने मेरी एक बात भी नहीं सुनी। लो अब दिल को तसल्ली मिल जाएगी जब घर में बहू की जगह कोई और लड़का ले लेगा। यह तस्वीर आज के बदलते समाज की है। जिसमें अब लोग लड़के-लड़कियों केसाथ लड़कों को भी संदेह भरी नजरों से देखने लगे हैं। इसके डर के कारण अगर आप अपने दोस्त केसाथ घूमने गए तो हो सकता है वह तुहे कह दे भाई थोड़ी दूरी बनाकर रखो जमाना खराब है। शनिवार को मैं 7 फरवरी यानी की रोज डे पर अपने एक मित्र केसाथ धार्मिक भावना केसाथ नोएडा केसेंट्रल स्टेज माल गया जहां दो लड़के आपस में कुछ ऐसी ही बातें कर रहे थे। जहां हर तरफ प्यार की खुशबू गुलाबों केसाथ-साथ महक रही थी तो वहीं दूसरी ओर इस तरह की बातें भी माहौल को गरम कर रही थीं। इस चर्चा में और आग लगा दी दोस्ताना ने। जिसने दोस्ताना देखी वह उसकेइफेक्ट से अपने आप को बचा ही नहीं पा रहा है। अब तो छोटे-छोटे बच्चे भी अपने पापा से दोस्ताना क्या होता है? जैसे सवाल पूछने लगे हैं। हालांकि यह अलग बात है कि उन बच्चोंं को इस सवाल का जवाब अच्छी तरह से पता है। पर मजे लेने के लिए वे ऐसा कर रहे हैं। श्रीराम सेना, शिवसेना और ना जाने कितनी सेना प्यार करने वालों पर लगाम कसने के लिए कमर कसकर खड़ी हैं। पर इन राजनीति केनाम पर रोटी सेंकने वालों को इस बात की शायद खबर नहीं है कि अब उन्हें दोस्ताना के खिलाफ कोई कदम उठाकर कुछ नया करना चाहिए। पर जो भी हो मेरा काम तो लिखना था सो लिख दिया अब आप इस पर क्या सोचते हैं वह आप जानें।
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क्या कहेंगे
शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009
अटल जी आप ठीक हो जाएं मुझे आपसे मिलना है

मेरे गांव में हर शिवरात्रि पर एक बड़ा मेला लगता है जिसमें हजारों लोग दूर-दूर के गांवों से शिरकत करने आते हैं। मैं जब छोटा था उस समय एक बार मलमास पड़ा। जिसकेउपलक्ष में मेरे गांव में पूरे एक महीने का मेला लगा। उसी दौरान भाजपा धीरे-धीरे उठने का प्रयास कर रही थी। बस्ती जिले से सांसद का चुनाव और हरैüया विधान सभा का चुनाव एक साथ हो रहा था। मेरे यहां से सांसद केलिए श्याम लाल खड़े हुए थे जबकि विधायकी के लिए जगदंबा सिंह मैदान में उतरे थे। मंदिर-मçस्जद का विवाद जोरों पर था पर उस समय तक मçस्जद नहीं टूटी थी। हर दीवार पर एक ही नारा मैंने लिखा देखा था जो कि कुछ इस प्रकार था,`राम लला हम आएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे´।
उस समय अटल विहारी वाजपेई और कल्याण सिंह की हर ओर धूम थी। मैं उस समय सात साल का था। मेरे गांव के मेले में दो स्टेज बने हुए थे एक कांग्रेस का और दूसरा भाजपा का। मैं उस समय भाजपा का बहुत बड़ा समर्थक हुआ करता था क्योंकि मेरा पूरा परिवार भाजपा से जुड़ा था। मुझे एक शरारत सूझी और मैं कांग्रेस के मंच पर चला गया और वहां से भाजपा और अटल बिहारी वाजपेई के बारे में खड़े होकर जो नेताओं से थोड़ा बहुत सुना था वह भाषण देने लगा। पहले तो मंच पर बैठे कांग्रेसियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि मैं क्या बोल रहा हूं पर जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं भाजपा की बड़ाई कर रहा हूं सभी ने मेरे हाथ से माइक छीन लिया और मेरे घर पर शिकायत भी लगा दी। उस समय मेरे मन में यह आया कि मैं अटल बिहारी वाजपेई से मिलकर इसकी शिकायत करूंगा। पर मैं धीरे-धीरे बड़ा हो गया और सब भूल गया। पर जब मैं मीडिया में आया तो मेरे मन अटल जी का साक्षात्कार करने का हुआ। उसके लिए मैंने खूब प्रयत्न किया पर अब तक सफल ना हो सका क्योंकि उनकी तवियत ठीक नहीं थी। पर पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि मैं अटल जी से मिलने में जरूर सफल हूंगा। मैं दुआ करता हूं कि वे जल्दी से ठीक हो जाएं।
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अटल जी
सोमवार, 2 फ़रवरी 2009
पब संस्कृति के खिलाफ विरोध कितना सही
मंगलौर में पब में लड़कियों के साथ जो घटना घटी उसने पूरे देश को हिला कर रख दिया। धर्म की ठेकेदारी करने वाले गली के आंवारा लोगों ने पब पर हमला करके सारे कानून को तोड़कर रख दिया। जो नेता आज इस संस्कृति का विरोध कर रहे हैं वे खुद इसमें बुरी तरह से लिप्त हैं उनके बेटे बेटियों केदिनचर्या में यह संस्कृति शामिल है। पर उसका इस तरह से विरोध करके इन समितियों ने अपनी असलियत दुनिया केसामने उजागर कर दी है। मेरा मानना है कि अगर पब में कुछ गलत हो रहा था तो उस पर कार्रवाई पुलिस के माध्यम से होनी चाहिए थी। इस घटना को देखकर मुझे पंजाब की एक घटना याद आ जाती है जिसमें पटियाला में एक क्लब पर छापा मार करके पुलिस ने वालों ने बहुत सारे लड़के-लड़कियों को पकड़ा था उसय दौरान मीडिया में आई तस्वीरों में लड़कियों की बुरी हालत देखते बनती थी। मुंबई में भी कुछ ऐसा ही पुलिस ने किया था।
पर इन घटनाओं पर किसी ने कोई सवाल इसलिए खड़ा नहीं किया क्योंकि इस कार्रवाई को एक चैनल केतहत अंजाम दिया गया था। पर मुझे समझ नहीं आता शिवसेना, रामसेना, नवनिर्माण सेना, बजरंग दल जैसे तमाम दल कौन होते हैं इस तरह से किसी जगह पर हमला करने वाले। इस घटना को हर किसी ने निंदनीय बताया पर अभी बीजेपी इसे गलत नहीं मान रही है उसके बड़े नेताओं द्वारा इस पर अभी भी बयान जारी किए जा रहे हैं जिसमें पब संस्कृति की निंदा करने के साथ इस सिर्फ इस घटना के तरीके को खराब बता रहे हैं। ााजपा के राष्ट्रीय महासचिव विनय कटियार ने कुछ ऐसी अपनी प्रतिक्रिया इस पर रखी,``श्रीराम सेना को लोकतांत्रिक तरीके से पब संस्कृति का विरोध करना चाहिए मारपीट से नहीं। मंगलौर में पब में लड़कियों के साथ मारपीट करना गलत था क्योंकि यह लोकतांत्रिक तरीका नहीं है। उन्होंने कहा कि पब संस्कृति का विरोध अवश्य किया जाना चाहिए क्योंकि यह संस्कृति हिन्दू विचारधारा को धूमिल करने का प्रयास कर रही है।´´ अब इस घटना पर एक दूसरी तरह की बहस होती है जिसमें मुझे भी कुछ चीजें स्पष्ट नहीं हो पा रही हैं। वह मैं आप सब भड़ासी सदस्यों से जानना चाहता हूं कि क्या पब संस्कृति को बढ़ावा मिलना चाहिए? क्या राम सेना की तरह की गतिविधियों को प्रोत्साहित करना चाहिए? इस पर सरकार का क्या रुख होना चाहिए? और आप इस मसले पर क्या कहते हैं? खास करके भड़ास जैसे मंच पर इस बात पर बहस होनी चाहिए। इसलिए अब यह विषय आपलोगों के हवाले कर रहा हूं।
पर इन घटनाओं पर किसी ने कोई सवाल इसलिए खड़ा नहीं किया क्योंकि इस कार्रवाई को एक चैनल केतहत अंजाम दिया गया था। पर मुझे समझ नहीं आता शिवसेना, रामसेना, नवनिर्माण सेना, बजरंग दल जैसे तमाम दल कौन होते हैं इस तरह से किसी जगह पर हमला करने वाले। इस घटना को हर किसी ने निंदनीय बताया पर अभी बीजेपी इसे गलत नहीं मान रही है उसके बड़े नेताओं द्वारा इस पर अभी भी बयान जारी किए जा रहे हैं जिसमें पब संस्कृति की निंदा करने के साथ इस सिर्फ इस घटना के तरीके को खराब बता रहे हैं। ााजपा के राष्ट्रीय महासचिव विनय कटियार ने कुछ ऐसी अपनी प्रतिक्रिया इस पर रखी,``श्रीराम सेना को लोकतांत्रिक तरीके से पब संस्कृति का विरोध करना चाहिए मारपीट से नहीं। मंगलौर में पब में लड़कियों के साथ मारपीट करना गलत था क्योंकि यह लोकतांत्रिक तरीका नहीं है। उन्होंने कहा कि पब संस्कृति का विरोध अवश्य किया जाना चाहिए क्योंकि यह संस्कृति हिन्दू विचारधारा को धूमिल करने का प्रयास कर रही है।´´ अब इस घटना पर एक दूसरी तरह की बहस होती है जिसमें मुझे भी कुछ चीजें स्पष्ट नहीं हो पा रही हैं। वह मैं आप सब भड़ासी सदस्यों से जानना चाहता हूं कि क्या पब संस्कृति को बढ़ावा मिलना चाहिए? क्या राम सेना की तरह की गतिविधियों को प्रोत्साहित करना चाहिए? इस पर सरकार का क्या रुख होना चाहिए? और आप इस मसले पर क्या कहते हैं? खास करके भड़ास जैसे मंच पर इस बात पर बहस होनी चाहिए। इसलिए अब यह विषय आपलोगों के हवाले कर रहा हूं।
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पब संस्कृति
शनिवार, 31 जनवरी 2009
क्या यही प्यार है????
मुझे एक लड़की की घटना याद आती है जिसे मैं बहुत अच्छी तरह जानता था। जब वह छोटी थी तो उसकी मां उसे पहाड़ से लेकर दिल्ली में झाड़å पोंछा जैसे काम की तलाश में अपनी जीविका चलाने केलिए आ गई थी। वह लड़की बहुत ही क्यूट थी दो साल की बच्ची ने जिसके यहां उसकी मां काम करती थी उनका मन मोह लिया। उसकी मां की मालकिन ने उसकी बेटी को अपनी बेटी की तरह पाला और अच्छे स्कूल में उसका दाखिला करवा दिया। पढ़ने में तेज और देखने मे सुंदर उस लड़की ने अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाई करके लेडीज श्रीराम कॉलेज में एडमीशन ले लिया ग्रेजुएशन करने के लिए। पहला साल उसने मेहनत करकेपढ़ाई की। पर उसका मन प्रेम में पड़ गया और वह सिर्फ एक लड़के केतरफ नहीं बल्कि दो-दो लड़कों को पसंद करने लगी। उसे अब अपनी मां की मालकिन का घर निराशा का केंद्र लगने लगा वह बोर होने लगी। अचानक एकदिन वह अपने एक पुरुष मित्र केसाथ मालकिन के घर से भाग गई। पर जिसकेसाथ वह भागी उसकेपास भी नहीं रही उससे अधिक अच्छा दिखने वाला और अच्छी पढ़ाई करने वाले दूसरे केपास चली गई। पहले वाला लड़का उसे टूट केप्यार करता था तरह-तरह के उसके लिए सपने संजोए थे। इस घटना से उसकी मां जैसी मालकिन का दिल टूट गया। पर उन्होंने उसकी असली मां को सारी बात बताकर अपना किनारा कर लिया। वह लड़का भी कई दिनों तक इस सवाल का जवाब ढ़åढता रहा कि आखिर में ऐसा क्या हुआ था जो उसने मेरा दिल तोड़ दिया। पर अंत में उसे वह भूल गया। इसके तीन चार महीने बाद दूसरे लड़केका मन भी उस लड़की से भर गया और उसने उसे बीमारी की हालत में छोड़कर अपनी राह पकड़ ली। पर इसके बाद जो कुछ हुआ वह बहुत दिलचस्प था। लड़की को अपनी गलती का अहसास हो गया और उसे सत्य का ज्ञान हो गया। उसने भगवान केचरणों में अपना ध्यान लगाना शुरू करके अपना अतीत भूल गई।
मुझे प्रेम का यह अनोखा रूप लगा जिसे आपसे शेयर किया क्योंकि आजकल फिजाओं में फिजा की प्रेम कहानी केचर्चे हैं। चांद छुप गया है क्योंकि उसे अपनी गलती का अहसास होने लगा है अब वह अपनी पहली पत्नी केपास पहुंच गया है। तो वहीं दूसरी ओर अपने प्यार को इतिहास बनाने की कस्में खाने वाली अनुराधा को भी इस सच पर अब यकीन होने लगा है। यह आधुनिक समाज केप्यार की दूषित परिभाषाएं हैं जिसमें प्यार एक महीने भी नहीं चल पाता। ऐसे प्यार पर मुझे जो कहना था वह कह दिया अब आप क्या कहेंगे? उसका मुझे इंतजार है।
मुझे प्रेम का यह अनोखा रूप लगा जिसे आपसे शेयर किया क्योंकि आजकल फिजाओं में फिजा की प्रेम कहानी केचर्चे हैं। चांद छुप गया है क्योंकि उसे अपनी गलती का अहसास होने लगा है अब वह अपनी पहली पत्नी केपास पहुंच गया है। तो वहीं दूसरी ओर अपने प्यार को इतिहास बनाने की कस्में खाने वाली अनुराधा को भी इस सच पर अब यकीन होने लगा है। यह आधुनिक समाज केप्यार की दूषित परिभाषाएं हैं जिसमें प्यार एक महीने भी नहीं चल पाता। ऐसे प्यार पर मुझे जो कहना था वह कह दिया अब आप क्या कहेंगे? उसका मुझे इंतजार है।
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क्या यही प्यार है????
शुक्रवार, 23 जनवरी 2009
मैं और कल्याण सिंह 1997 में

बात सन 1997 की है। मैं उस समय अयोध्या में था और महाराजा इंटर कालेज में दसवीं का छात्र था। क्योंकि 1996 में मैं 10 वीं में फेल हो गया था इसीलिए मुझे दोबारा उस कक्षा में पढ़ना पड़ रहा था। सुबह नौ बजे मैं अपने घर(किराए के मकान) से वासुदेव घाट से स्कूल के लिए निकला। अचानक रास्ते में मैंने बहुत बड़ी गाçड़यों का काफिला देखा तो ठहर गया और एक रिक्शे वाले से पूछा भैया यह क्या हो रहा है? उसने जवाब दिया अरे कल्याण सिंह आए हैं उत्तर प्रदेश के मुयमंत्री मैंने कहा अच्छा। पुलिस का हर ओर जमावड़ा था मेरे हाथ में सिर्फ दो किताबें थीं क्योंकि उस दिन कुछ खास था जो कि मुझे याद नहीं आ रहा है। इसलिए मैं ज्यादा किताब नहीं ले जा रहा था। मैं मणिराम छावनी यानी की छोटी छावनी में ही रुक गया। और जिस तरफ नेता और पुलिस वाले जा रहे थे उन्हीं के भीड़ में मैं भी चलता रहा। हालांकि उस टोली में किसी को जाने नहीं दिया जा रहा था पर मुझे किसी ने मना नहीं किया क्योंकि उनकी नजर मुझपर नहीं पड़ी। बाल्मीकि मंदिर परिसर के दाहिने हाथ पर हनुमान जी का मंदिर उस समय नया-नया बना था कल्याण सिंह को उसी में जाना था। वहां कुछ पूजा अर्चना करनी थी बाबा रामचंद्र दास परमहंस और नृत्य गोपाल दास केसाथ-साथ अयोध्या केसभी बड़े संत उपस्थित थे। हर कोई कल्याण सिंह के गुणगान में लगे थे। मैं जैसे मंदिर की सीढ़ियों पर पहुंचा विनय कटियार केसाथ-साथ वहां के बाबाओं ने मुझे धक्का देना शुरू कर दिया क्योंकि अंदर मिठाई बंट रही थी और हर नेता एक मिठाई डिŽबा प्रसाद स्वरूप झटकने में लगा था। मैं यह मौका कैसे गंवाता मैंने देखा कि विनय कटियार किसी से बात करने में लगे हैं तो मैंने बाबा को बोल दिया मैं विनय चाचा केसाथ आया हूं। बस क्या था बाबा जी ने मुझे ना सिर्फ खूब मिठाई बल्कि अंदर ले जाकर आराम से बिठा दिया जहां मैंने कल्याण सिंह केसाथ पेट भरकर मिठाई खाई और उनसे भाजपा की ना जाने कितनी अच्छाइयां सुनीं। पूरे भाषण केदौरान आडवाणी अटल हर कोई उनकेलिए आदर्श बना हुआ था। उस कल्याण को देखकर जब आज उनके पार्टी छोड़ने के फैसले को देखा तो पता चला कि इंसान कितना स्वार्थी होता है। यह तो पार्टी की बाद थी वह तो अपने फायदे के लिए परिवार तक को नहीं छोड़ता। अब मैं आप पर छोड़ता हूं कि ऐसे नेता जो अपने पुत्र-पौत्र के लिए मरे जा रहे हैं वह आपका या फिर देश का क्या कल्याण करेंगे? मैं किसी पार्टी का नहीं हूं पर एकता देखना मुझे पसंद है कम से कम अपनी पार्टी में तो जमे रहो नेताओं। नहीं तो तुम पर कौन भरोसा करेगा।
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कल्याण
गुरुवार, 22 जनवरी 2009
बिना बैंकों के मिलीभगत के संभव नहीं था सत्यम घोटाला
अगर अभी तक सत्यम के मसले पर काेई आलस्य भरा कदम उठा रहा है तो वह है रिजर्व बैंक आफ इंडिया। जबकि आरबीआई हर बैंक पर वाचडाग (रखवाली करने वाला कुत्ता) की तरह नजर रखता रहा है। इसने बैंकों से यह चेक करने के लिए कहा है कि कहीं उन्होंने अपना अधिक पैसा सत्मय या फिर राजू के परिवार की कंपनी मेटस में तो नहीं लगा रखा है। हां एसबीआई का पैसा मेटस में लगा हुआ है। पर अभी तक जो मुय काण्ड है वहां तक कोई नहीं पहुंच पाया है। जो सारा का सारा घपला हुआ है वह पैसे को लेकर हुआ है जो कि बैंकों में नहीं मिला। ऐसे में आरबीआई यह बहाना नहीं बना सकती है कि यह उसकी समस्या नहीं है।
इसमें किसी को कोई गलती नहीं करनी चाहिए क्योंकि कहीं भी जब कोई ऐसा घोटाला होता है तो उसमें बैंक की धांधली भी सामने आती है। जब पैसा इसमें शामिल है तो बैंक अपना पल्ला कैसे झाड़ सकते हैं। क्99ख् में जब हर्षद मेहता नाम के एक बड़े ठग ने जब भारत में एक बड़ा घोटाला किया था तब भी वह देश को हिला देने वाली धांधली में भी बैंक धोखाधड़ी शामिल थी। बैंक उस समय अपकर्ष की ओर चल पड़े थे जब उनके साथ एक बड़ा छल हुआ। जो कि उनके बांड पोर्टफोलियो पर दिखाई पड़ा क्योंकि उन पर Žयाज दरें बढ़ाने का दबाव था। क्योंकि उन्हें कहीं से लाभ दिखाना था। उस समय भी भारत सरकार ने बैंकों को लोन देने में पारदर्शिता बरतने के लिए कहा था। जिसके चलते बैंकों पर अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव आ गया था। मेहता ने बैंकों को लाभ दिखाने में मदद की और अपने आप को उसमें शामिल करके करोड़ों रुपये प्रोसेस में डाले। हर्षत मेहता कांड में बैंक बबाüदी के कागार पर पहुंच गए थे इसमें कोई दो राय नहीं थी। मेहता और उनके अन्य ठग दोस्त बैंकों को अपने हिसाब से चला रहे थे। जिसमें उनकी पहुंच बैंक के सिक्योरिटी डिपार्टमेंट तक थी। उन बैंकों में स्टेट बैंक आफ इंडिया, स्टैंडर्ड चार्टर्ड, केनारा बैंक आदि शामिल थे। उस समय इस तरह से बैंकों को एक कड़वा घूंट पीने का अनुभव हुआ था।
केतन पारेख घपला भी स्टाक माकेüट का ही घोटाला माना गया था। उस समय भी इस घटना के केंद्र में दो बैंकों का नाम सामने आया था जिसमें बैंक आफ इंडिया और मधेपुरा बैंक शामिल थे। उस कांड में ये बैंक दोषी माने गए थे। उस समय आईपीओ में उछाल लाने के लिए उसकी कीमत बढ़ाने के लिए एक ही व्यक्ति ने ढेर सारे डीमेट अकाउंट का प्रयोग किया था जिसमें उनकी मंशा अधिक से अधिक शेयर अपने नाम अलाट करवाने की थी। इसको भी हम एक बैंक स्कैम ही कहेंगे। बाद में सेबी ने इसकी जांच करके इन बातों का खुलासा किया था। उस दौरान कई बैंकों पर रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने नो योर कस्टमर(अपने ग्राहक को भली भांति से जानो)के मानक पर खरा ना उतरने के कारण जुर्माना भी लगाया था। उन बैंकों में एडीएफसी, आईसीआईसीआई, सिटी बैंक और स्टैंडर्ड चार्टर्ड शामिल थे। इसमें इन बैंकों ने डीमेट अकाउंट के दौरान कोताही बरती थी। हर्षद मेहता के घटना के बाद भी सिटी और स्टैंडर्ड चार्टर्ड ने उसकी पुनरावृçत्त दोबारा की। क्योंकि अक्सर अच्छे बैंक अपने आपको बहुत स्मार्ट समझते हैं पर यह भी सच है कि ऐसे बैंक भी देर सवेर जाल में फंस ही जाते हैं।
सत्यम कांड में भी अगर आप अच्छे तरीके से देखेंगें तो आपको बैंकों की मिलीभगत नजर आएगी। जब राजू रामलिंगा सबके सामने आकर यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने कंपनी की नकदी को बढ़चढ़कर दिखाया तो ऐसा कैसे हो सकता है कि उसमें बैंकों की मिलीभगत ना हो। यह सोचने वाली बात है। आप ही सोचिए क्या यह एक कंपनी के लिए संभव है कि वह जो पैसा बैंक में है नहीं उसके बारे में भी अपने आडिटर्स के माध्यम से कंपनी रिकार्ड में रख सकते हैं? जब तक कि उन्हें बैंक द्वारा फिग लीफ सार्टीफिकेट बैंक ना दे दे। मेरा दावा है कि अगर वह सार्टीफिकेट असली हैं तो उसमें बैंक की मिलीभगत है। अगर यह गलत है तो बैंकों को सामने आकर यह पता लगाना चाहिए कि उनका नाम मिसयूज क्यों किया जा रहा है। अगर यह कुछ भी नहीं था तो बैंकों को परेशान होने की क्या जरूरत है? इन सभी चीजों का सही से पता लगाने के लिए सेबी को तेजी से कदम उठाना चाहिए तथा आरबीआई को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। जिससे भविष्य में कोई भी बैंक ऐसे बड़े घोटालों का हिस्सा ना बने। यह बहुत ही गंभीर मामला है जिस पर हर किसी को गंभीर होने की जरूरत है।
इसमें किसी को कोई गलती नहीं करनी चाहिए क्योंकि कहीं भी जब कोई ऐसा घोटाला होता है तो उसमें बैंक की धांधली भी सामने आती है। जब पैसा इसमें शामिल है तो बैंक अपना पल्ला कैसे झाड़ सकते हैं। क्99ख् में जब हर्षद मेहता नाम के एक बड़े ठग ने जब भारत में एक बड़ा घोटाला किया था तब भी वह देश को हिला देने वाली धांधली में भी बैंक धोखाधड़ी शामिल थी। बैंक उस समय अपकर्ष की ओर चल पड़े थे जब उनके साथ एक बड़ा छल हुआ। जो कि उनके बांड पोर्टफोलियो पर दिखाई पड़ा क्योंकि उन पर Žयाज दरें बढ़ाने का दबाव था। क्योंकि उन्हें कहीं से लाभ दिखाना था। उस समय भी भारत सरकार ने बैंकों को लोन देने में पारदर्शिता बरतने के लिए कहा था। जिसके चलते बैंकों पर अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव आ गया था। मेहता ने बैंकों को लाभ दिखाने में मदद की और अपने आप को उसमें शामिल करके करोड़ों रुपये प्रोसेस में डाले। हर्षत मेहता कांड में बैंक बबाüदी के कागार पर पहुंच गए थे इसमें कोई दो राय नहीं थी। मेहता और उनके अन्य ठग दोस्त बैंकों को अपने हिसाब से चला रहे थे। जिसमें उनकी पहुंच बैंक के सिक्योरिटी डिपार्टमेंट तक थी। उन बैंकों में स्टेट बैंक आफ इंडिया, स्टैंडर्ड चार्टर्ड, केनारा बैंक आदि शामिल थे। उस समय इस तरह से बैंकों को एक कड़वा घूंट पीने का अनुभव हुआ था।
केतन पारेख घपला भी स्टाक माकेüट का ही घोटाला माना गया था। उस समय भी इस घटना के केंद्र में दो बैंकों का नाम सामने आया था जिसमें बैंक आफ इंडिया और मधेपुरा बैंक शामिल थे। उस कांड में ये बैंक दोषी माने गए थे। उस समय आईपीओ में उछाल लाने के लिए उसकी कीमत बढ़ाने के लिए एक ही व्यक्ति ने ढेर सारे डीमेट अकाउंट का प्रयोग किया था जिसमें उनकी मंशा अधिक से अधिक शेयर अपने नाम अलाट करवाने की थी। इसको भी हम एक बैंक स्कैम ही कहेंगे। बाद में सेबी ने इसकी जांच करके इन बातों का खुलासा किया था। उस दौरान कई बैंकों पर रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने नो योर कस्टमर(अपने ग्राहक को भली भांति से जानो)के मानक पर खरा ना उतरने के कारण जुर्माना भी लगाया था। उन बैंकों में एडीएफसी, आईसीआईसीआई, सिटी बैंक और स्टैंडर्ड चार्टर्ड शामिल थे। इसमें इन बैंकों ने डीमेट अकाउंट के दौरान कोताही बरती थी। हर्षद मेहता के घटना के बाद भी सिटी और स्टैंडर्ड चार्टर्ड ने उसकी पुनरावृçत्त दोबारा की। क्योंकि अक्सर अच्छे बैंक अपने आपको बहुत स्मार्ट समझते हैं पर यह भी सच है कि ऐसे बैंक भी देर सवेर जाल में फंस ही जाते हैं।
सत्यम कांड में भी अगर आप अच्छे तरीके से देखेंगें तो आपको बैंकों की मिलीभगत नजर आएगी। जब राजू रामलिंगा सबके सामने आकर यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने कंपनी की नकदी को बढ़चढ़कर दिखाया तो ऐसा कैसे हो सकता है कि उसमें बैंकों की मिलीभगत ना हो। यह सोचने वाली बात है। आप ही सोचिए क्या यह एक कंपनी के लिए संभव है कि वह जो पैसा बैंक में है नहीं उसके बारे में भी अपने आडिटर्स के माध्यम से कंपनी रिकार्ड में रख सकते हैं? जब तक कि उन्हें बैंक द्वारा फिग लीफ सार्टीफिकेट बैंक ना दे दे। मेरा दावा है कि अगर वह सार्टीफिकेट असली हैं तो उसमें बैंक की मिलीभगत है। अगर यह गलत है तो बैंकों को सामने आकर यह पता लगाना चाहिए कि उनका नाम मिसयूज क्यों किया जा रहा है। अगर यह कुछ भी नहीं था तो बैंकों को परेशान होने की क्या जरूरत है? इन सभी चीजों का सही से पता लगाने के लिए सेबी को तेजी से कदम उठाना चाहिए तथा आरबीआई को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। जिससे भविष्य में कोई भी बैंक ऐसे बड़े घोटालों का हिस्सा ना बने। यह बहुत ही गंभीर मामला है जिस पर हर किसी को गंभीर होने की जरूरत है।
लेबल:
सत्यम बैंक
रविवार, 18 जनवरी 2009
गुरुवार, 8 जनवरी 2009
क्यूँ नही चलता कालका स्टेशन पर फ़ोन चार्ज करने का प्लग?
मैं और मेरे दो दोस्त सौरभ और गौरव शिमला घूमकर वापस लौट रहे थे। हमारी ट्रेन कालका मेल रात में ११ बजे थी. हम वहां पर शाम को चार बजे ही पहुँच गए. क्यूंकि और कोई काम नही था इसीलिये हमने वहीं बैठकर गप्पे लड़ाने का कार्यक्रम बनाया. इसी दौरान हमें पता चला की हमारे फ़ोन की बैट्री पूरी तरह से जा चुकी है. कालका स्टेशन पर ढेर सारे बोर्ड बन्दे हुए थे. तो हमने उसमे अपना चार्जर लगा दिया. पर फ़ोन चार्ज होना नही शुरू हुआ. हमने उस स्टेशन के वेटिंग रूम से लेकर स्टेशन मास्टर तक के कमरे की ख़ाक चान ली लेकिन बिजली होने के बावजूद हमें कोई ऐसा बोर्ड नही मिला जहाँ से हम अपना फ़ोन चार्ज कर सकें. थक हर कर हमने अपनी बात स्टेशन मास्टर तक राखी तो महोदय ने जवाब दिया बेटा हमारा आदमी इसे ठीक कर रहा होगा आप थोड़ा वेट कर लो. हमने एक घंटा इंतज़ार किया लेकिन कुछ भी नही हुआ. तो फिर हम इसकी शिकायत करने कहीं नही गए. वहां टिकेट काट रही एक महिला से हमने कहाँ की हमारा फ़ोन काम नही कर रहा है. इसलिए अगर कोई बोर्ड काम कर रहा हो तो हमारा मोबाइल लगवा दीजिये. उन्होंने हमारी बात सुन ली और अपने ही केबिन में फ़ोन चार्ज होने के लिए लगवा दिया. जब हम अपना फ़ोन वहां लगवा रहे थे तो इस बारे में उनसे पुछा की मैं यहाँ के चार्जिंग बोर्ड काम क्यूँ नही कर रहे हैं. इस पर उन्होंने हमें कहा इसके बारे में आप हमारे स्टेशन मास्टर से बात कीजिए. हमे इस रहस्य के बारे में किसी ने कुछ नही बताया. इसके बाद हम जब खाना खाने गए तो इस बात का हमें पता लगा की वहां का बोर्ड काम क्यूँ नही करता. वहां पर रेस्तराँ के मालिक ने हमें बताया की यहाँ पर पिछले दिनों ऐसे घटनाएँ घटीं जिसके चलते यहाँ के कर्मचारियों का जीना दूभर हो गया था. इसी वजह से यहाँ के सभी बोर्ड के कनेक्शन काट दिए गए हैं. यहाँ पर अक्सर लोग मंहगे फ़ोन चार्ज होने के लिए लगते थे और भूल जाते थे. इस बीच उनका फ़ोन कोई उठाकर ले जाता था. जब उनका फ़ोन गायब होता तो वो लोग पुलिस बुला लेते थे. दो महीने में यहाँ पर इस तरह की इतनी घटनाएँ घटीं की इन बोर्ड का कनेक्शन काटना पड़ा. अब लोग न अपना फ़ोन लगते हैं ना ही यहाँ के स्टाफ को दुखी होना पड़ता है. अगर आप भी कालका स्टेशन जायें तो वहां पर फ़ोन चार्ज करने का अरमान मत रखियेगा. नही तो निराशा ही मिलेगी.
अमित द्विवेदी
अमित द्विवेदी
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कालका शिमला
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