शुक्रवार, 23 जनवरी 2009

मैं और कल्याण सिंह 1997 में


बात सन 1997 की है। मैं उस समय अयोध्या में था और महाराजा इंटर कालेज में दसवीं का छात्र था। क्योंकि 1996 में मैं 10 वीं में फेल हो गया था इसीलिए मुझे दोबारा उस कक्षा में पढ़ना पड़ रहा था। सुबह नौ बजे मैं अपने घर(किराए के मकान) से वासुदेव घाट से स्कूल के लिए निकला। अचानक रास्ते में मैंने बहुत बड़ी गाçड़यों का काफिला देखा तो ठहर गया और एक रिक्शे वाले से पूछा भैया यह क्या हो रहा है? उसने जवाब दिया अरे कल्याण सिंह आए हैं उत्तर प्रदेश के मुयमंत्री मैंने कहा अच्छा। पुलिस का हर ओर जमावड़ा था मेरे हाथ में सिर्फ दो किताबें थीं क्योंकि उस दिन कुछ खास था जो कि मुझे याद नहीं आ रहा है। इसलिए मैं ज्यादा किताब नहीं ले जा रहा था। मैं मणिराम छावनी यानी की छोटी छावनी में ही रुक गया। और जिस तरफ नेता और पुलिस वाले जा रहे थे उन्हीं के भीड़ में मैं भी चलता रहा। हालांकि उस टोली में किसी को जाने नहीं दिया जा रहा था पर मुझे किसी ने मना नहीं किया क्योंकि उनकी नजर मुझपर नहीं पड़ी। बाल्मीकि मंदिर परिसर के दाहिने हाथ पर हनुमान जी का मंदिर उस समय नया-नया बना था कल्याण सिंह को उसी में जाना था। वहां कुछ पूजा अर्चना करनी थी बाबा रामचंद्र दास परमहंस और नृत्य गोपाल दास केसाथ-साथ अयोध्या केसभी बड़े संत उपस्थित थे। हर कोई कल्याण सिंह के गुणगान में लगे थे। मैं जैसे मंदिर की सीढ़ियों पर पहुंचा विनय कटियार केसाथ-साथ वहां के बाबाओं ने मुझे धक्का देना शुरू कर दिया क्योंकि अंदर मिठाई बंट रही थी और हर नेता एक मिठाई डिŽबा प्रसाद स्वरूप झटकने में लगा था। मैं यह मौका कैसे गंवाता मैंने देखा कि विनय कटियार किसी से बात करने में लगे हैं तो मैंने बाबा को बोल दिया मैं विनय चाचा केसाथ आया हूं। बस क्या था बाबा जी ने मुझे ना सिर्फ खूब मिठाई बल्कि अंदर ले जाकर आराम से बिठा दिया जहां मैंने कल्याण सिंह केसाथ पेट भरकर मिठाई खाई और उनसे भाजपा की ना जाने कितनी अच्छाइयां सुनीं। पूरे भाषण केदौरान आडवाणी अटल हर कोई उनकेलिए आदर्श बना हुआ था। उस कल्याण को देखकर जब आज उनके पार्टी छोड़ने के फैसले को देखा तो पता चला कि इंसान कितना स्वार्थी होता है। यह तो पार्टी की बाद थी वह तो अपने फायदे के लिए परिवार तक को नहीं छोड़ता। अब मैं आप पर छोड़ता हूं कि ऐसे नेता जो अपने पुत्र-पौत्र के लिए मरे जा रहे हैं वह आपका या फिर देश का क्या कल्याण करेंगे? मैं किसी पार्टी का नहीं हूं पर एकता देखना मुझे पसंद है कम से कम अपनी पार्टी में तो जमे रहो नेताओं। नहीं तो तुम पर कौन भरोसा करेगा।

गुरुवार, 22 जनवरी 2009

बिना बैंकों के मिलीभगत के संभव नहीं था सत्यम घोटाला

अगर अभी तक सत्यम के मसले पर काेई आलस्य भरा कदम उठा रहा है तो वह है रिजर्व बैंक आफ इंडिया। जबकि आरबीआई हर बैंक पर वाचडाग (रखवाली करने वाला कुत्ता) की तरह नजर रखता रहा है। इसने बैंकों से यह चेक करने के लिए कहा है कि कहीं उन्होंने अपना अधिक पैसा सत्मय या फिर राजू के परिवार की कंपनी मेटस में तो नहीं लगा रखा है। हां एसबीआई का पैसा मेटस में लगा हुआ है। पर अभी तक जो मुय काण्ड है वहां तक कोई नहीं पहुंच पाया है। जो सारा का सारा घपला हुआ है वह पैसे को लेकर हुआ है जो कि बैंकों में नहीं मिला। ऐसे में आरबीआई यह बहाना नहीं बना सकती है कि यह उसकी समस्या नहीं है।
इसमें किसी को कोई गलती नहीं करनी चाहिए क्योंकि कहीं भी जब कोई ऐसा घोटाला होता है तो उसमें बैंक की धांधली भी सामने आती है। जब पैसा इसमें शामिल है तो बैंक अपना पल्ला कैसे झाड़ सकते हैं। क्99ख् में जब हर्षद मेहता नाम के एक बड़े ठग ने जब भारत में एक बड़ा घोटाला किया था तब भी वह देश को हिला देने वाली धांधली में भी बैंक धोखाधड़ी शामिल थी। बैंक उस समय अपकर्ष की ओर चल पड़े थे जब उनके साथ एक बड़ा छल हुआ। जो कि उनके बांड पोर्टफोलियो पर दिखाई पड़ा क्योंकि उन पर Žयाज दरें बढ़ाने का दबाव था। क्योंकि उन्हें कहीं से लाभ दिखाना था। उस समय भी भारत सरकार ने बैंकों को लोन देने में पारदर्शिता बरतने के लिए कहा था। जिसके चलते बैंकों पर अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव आ गया था। मेहता ने बैंकों को लाभ दिखाने में मदद की और अपने आप को उसमें शामिल करके करोड़ों रुपये प्रोसेस में डाले। हर्षत मेहता कांड में बैंक बबाüदी के कागार पर पहुंच गए थे इसमें कोई दो राय नहीं थी। मेहता और उनके अन्य ठग दोस्त बैंकों को अपने हिसाब से चला रहे थे। जिसमें उनकी पहुंच बैंक के सिक्योरिटी डिपार्टमेंट तक थी। उन बैंकों में स्टेट बैंक आफ इंडिया, स्टैंडर्ड चार्टर्ड, केनारा बैंक आदि शामिल थे। उस समय इस तरह से बैंकों को एक कड़वा घूंट पीने का अनुभव हुआ था।
केतन पारेख घपला भी स्टाक माकेüट का ही घोटाला माना गया था। उस समय भी इस घटना के केंद्र में दो बैंकों का नाम सामने आया था जिसमें बैंक आफ इंडिया और मधेपुरा बैंक शामिल थे। उस कांड में ये बैंक दोषी माने गए थे। उस समय आईपीओ में उछाल लाने के लिए उसकी कीमत बढ़ाने के लिए एक ही व्यक्ति ने ढेर सारे डीमेट अकाउंट का प्रयोग किया था जिसमें उनकी मंशा अधिक से अधिक शेयर अपने नाम अलाट करवाने की थी। इसको भी हम एक बैंक स्कैम ही कहेंगे। बाद में सेबी ने इसकी जांच करके इन बातों का खुलासा किया था। उस दौरान कई बैंकों पर रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने नो योर कस्टमर(अपने ग्राहक को भली भांति से जानो)के मानक पर खरा ना उतरने के कारण जुर्माना भी लगाया था। उन बैंकों में एडीएफसी, आईसीआईसीआई, सिटी बैंक और स्टैंडर्ड चार्टर्ड शामिल थे। इसमें इन बैंकों ने डीमेट अकाउंट के दौरान कोताही बरती थी। हर्षद मेहता के घटना के बाद भी सिटी और स्टैंडर्ड चार्टर्ड ने उसकी पुनरावृçत्त दोबारा की। क्योंकि अक्सर अच्छे बैंक अपने आपको बहुत स्मार्ट समझते हैं पर यह भी सच है कि ऐसे बैंक भी देर सवेर जाल में फंस ही जाते हैं।
सत्यम कांड में भी अगर आप अच्छे तरीके से देखेंगें तो आपको बैंकों की मिलीभगत नजर आएगी। जब राजू रामलिंगा सबके सामने आकर यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने कंपनी की नकदी को बढ़चढ़कर दिखाया तो ऐसा कैसे हो सकता है कि उसमें बैंकों की मिलीभगत ना हो। यह सोचने वाली बात है। आप ही सोचिए क्या यह एक कंपनी के लिए संभव है कि वह जो पैसा बैंक में है नहीं उसके बारे में भी अपने आडिटर्स के माध्यम से कंपनी रिकार्ड में रख सकते हैं? जब तक कि उन्हें बैंक द्वारा फिग लीफ सार्टीफिकेट बैंक ना दे दे। मेरा दावा है कि अगर वह सार्टीफिकेट असली हैं तो उसमें बैंक की मिलीभगत है। अगर यह गलत है तो बैंकों को सामने आकर यह पता लगाना चाहिए कि उनका नाम मिसयूज क्यों किया जा रहा है। अगर यह कुछ भी नहीं था तो बैंकों को परेशान होने की क्या जरूरत है? इन सभी चीजों का सही से पता लगाने के लिए सेबी को तेजी से कदम उठाना चाहिए तथा आरबीआई को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। जिससे भविष्य में कोई भी बैंक ऐसे बड़े घोटालों का हिस्सा ना बने। यह बहुत ही गंभीर मामला है जिस पर हर किसी को गंभीर होने की जरूरत है।

रविवार, 18 जनवरी 2009

गुरुवार, 8 जनवरी 2009

क्यूँ नही चलता कालका स्टेशन पर फ़ोन चार्ज करने का प्लग?

मैं और मेरे दो दोस्त सौरभ और गौरव शिमला घूमकर वापस लौट रहे थे। हमारी ट्रेन कालका मेल रात में ११ बजे थी. हम वहां पर शाम को चार बजे ही पहुँच गए. क्यूंकि और कोई काम नही था इसीलिये हमने वहीं बैठकर गप्पे लड़ाने का कार्यक्रम बनाया. इसी दौरान हमें पता चला की हमारे फ़ोन की बैट्री पूरी तरह से जा चुकी है. कालका स्टेशन पर ढेर सारे बोर्ड बन्दे हुए थे. तो हमने उसमे अपना चार्जर लगा दिया. पर फ़ोन चार्ज होना नही शुरू हुआ. हमने उस स्टेशन के वेटिंग रूम से लेकर स्टेशन मास्टर तक के कमरे की ख़ाक चान ली लेकिन बिजली होने के बावजूद हमें कोई ऐसा बोर्ड नही मिला जहाँ से हम अपना फ़ोन चार्ज कर सकें. थक हर कर हमने अपनी बात स्टेशन मास्टर तक राखी तो महोदय ने जवाब दिया बेटा हमारा आदमी इसे ठीक कर रहा होगा आप थोड़ा वेट कर लो. हमने एक घंटा इंतज़ार किया लेकिन कुछ भी नही हुआ. तो फिर हम इसकी शिकायत करने कहीं नही गए. वहां टिकेट काट रही एक महिला से हमने कहाँ की हमारा फ़ोन काम नही कर रहा है. इसलिए अगर कोई बोर्ड काम कर रहा हो तो हमारा मोबाइल लगवा दीजिये. उन्होंने हमारी बात सुन ली और अपने ही केबिन में फ़ोन चार्ज होने के लिए लगवा दिया. जब हम अपना फ़ोन वहां लगवा रहे थे तो इस बारे में उनसे पुछा की मैं यहाँ के चार्जिंग बोर्ड काम क्यूँ नही कर रहे हैं. इस पर उन्होंने हमें कहा इसके बारे में आप हमारे स्टेशन मास्टर से बात कीजिए. हमे इस रहस्य के बारे में किसी ने कुछ नही बताया. इसके बाद हम जब खाना खाने गए तो इस बात का हमें पता लगा की वहां का बोर्ड काम क्यूँ नही करता. वहां पर रेस्तराँ के मालिक ने हमें बताया की यहाँ पर पिछले दिनों ऐसे घटनाएँ घटीं जिसके चलते यहाँ के कर्मचारियों का जीना दूभर हो गया था. इसी वजह से यहाँ के सभी बोर्ड के कनेक्शन काट दिए गए हैं. यहाँ पर अक्सर लोग मंहगे फ़ोन चार्ज होने के लिए लगते थे और भूल जाते थे. इस बीच उनका फ़ोन कोई उठाकर ले जाता था. जब उनका फ़ोन गायब होता तो वो लोग पुलिस बुला लेते थे. दो महीने में यहाँ पर इस तरह की इतनी घटनाएँ घटीं की इन बोर्ड का कनेक्शन काटना पड़ा. अब लोग न अपना फ़ोन लगते हैं ना ही यहाँ के स्टाफ को दुखी होना पड़ता है. अगर आप भी कालका स्टेशन जायें तो वहां पर फ़ोन चार्ज करने का अरमान मत रखियेगा. नही तो निराशा ही मिलेगी.
अमित द्विवेदी

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

भुलाए नहीं भूलेगा बीता वर्ष

जब मैं छोटा था और स्कूल में पढ़ा करता था उस समय बड़े-बूढ़े हमेशा यह सीख दिया करते थे कि बेटे कोई भी मुकाम मेहनत करके धीरे-धीरे हासिल करने से उसका असर दीघüकालिक होता है। अगर कोई सफलता बिना किसी मेहनत के चमत्कार केरूप में आती है उसका असर भी थोड़े दिन बाद समाप्त हो जाता है। इस बात को यहां पर मैं इसलिए बता रहा हूूं क्योंकि यह अपनी अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है। बात बहुत पुरानी नहीं है 2007 में हमने सेंसेक्स की ऊंचे छलांग लगाते ढ़ेरों रिकार्ड देखे। उसकी सफलता को देख हर कोई इस बात पर चर्चा करना भूल गया कि आखिर सेंसेक्स इतना तेजी से क्यों बढ़ रहा है। जब सेंसेक्स 21 हजार के स्तर पर पहुंचा तो हमारे बाजार के जानकारों ने बिना सोचे समझे भविष्यवाणी कर दी कि अब सेंसेक्स की पकड़ से 25 हजार भी दूर नहीं है। पर एक ऐसी आंधी आई कि सेंसेक्स का कोई स्तर ही नहीं रहा जनवरी 2008 से गिरावट का शुरू हुआ ये क्रम कब खत्म होगा इसकी कोई गारंटी नहीं ले रहा है। पिछले एक साल में जितने पूर्वानुमान लगाए गए वह बुरी तरह से लाप शो ही साबित हुए हैं। 8 जनवरी 2008 को सेंसेक्स की सबसे लंबी छलांग उस समय देखने को मिली जब वह 21 हजार के रिकार्ड स्तर पर पहुंचा। 6 जुलाई 2007 में जब सेंसेक्स ने 15 हजार की ऊंचाई छुई थी उस समय किसी ने यह अंदाजा नहीं लगाया था कि इस साल के बाकी बचे महीने भी सेंसेक्स की ऊंचाई के रिकार्ड बनाने जा रहे हैं। 11 फरवरी 2000 को सेंसेक्स ने 6000 की ऊंचाई पर कदम रखा था। इसके बाद उसे 7000 तक पहुंचने में लगभग पांच वर्ष लग गए और 11 जून 2005 को वह दिन आया जब सेंसेक्स सात हजार के पार हुआ। पर 2007 के कुछ महीनों में ही सेंसेक्स ने 6 हजार प्वाइंट कमाकर 21 हजार का उच्च स्तर छू लिया। पर हुआ वही जो नैतिक शिक्षा में पढ़ाया गया है कि धीरे-धीरे मिली सफलता ही अधिक दिनों तक कायम रहती है। 21 जनवरी 2008 को सेंसेक्स में ऐसी आंधी है जिसके चलते सभी भविष्यवक्ताओं और बाजार के जानकारों का पूर्वानुमान चकनाचूर हो गया और बाजार 1400 प्वाइंट गिरकर 17,605 पर आ गया। इसकेपहले गिरावट शुरू हुई थी पर वह बहुत छोटी थी। पर इसके बाद इस गिरावट ने थमने का नाम नहीं लिया और निचले स्तर की ओर लगातार बढ़ता गया। इसी बीच ग्लोबल क्राइसिस का प्रभाव शुरू हुआ और सारा असर सेंसेक्स पर दिखा। पर इसके बाद भी बाजार के विशेषज्ञों ने अपने पूर्वानुमान को लगाने का काम नहीं छोड़ा और यहां तक भविष्यवाणी कर दी कि माकेüट छह हजार का निचला स्तर छुएगा। 26 नवंबर को मुंबई आतंकी हमलों के बाद एक और पूर्वानुमान समाचारों के माध्यम से लोगों तक आया कि इस हमले से सेंसेक्स में रिकार्ड गिरावट आएगी। पर इन सभी पूर्वानुमानों के विपरीत बाजार उन हमलों के बाद से अधिक मजबूत स्थिति में कारोबार कर रहा है। भारत की तेरह साल की सबसे महंगाई की दर अगस्त के 13 प्रतिशत से गिरकर मध्य दिसंबर तक 8 के भी नीचे आ गई है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के रंग को देखकर अब तक हर कोई हैरान है। किसी साल में पहली बार अब तक ऐसा हुआ है कि कच्चे तेल की कीमत जुलाई में 147 डालर प्रति बैरल तक पहुंच गई और दिसंबर 2008 के मध्य तक हमने 37 डालर प्रति बैरल का इसका निचला स्तर देखा। इस तरह का उतार-चढ़ाव पहली बार देखने को मिल रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कमी को देखते हुए सरकार इसका फायदा आम लोगों को देने का कार्यक्रम बना रही हैं। इसे देखकर अब 2008 को गाली दें इसका शुक्रिया अदा करें यह समझ में नहीं आ रहा है। क्योंकि तेल की कीमतों के कम होने से लोगों को बड़ी राहत मिली है और आगे और भी मिलने जा रही है। मैं कोई पूर्वानुमान करने में भरोसा नहीं करता पर हां जिस तरह से कुछ और भविष्यवाणियां की जा रही हैं उसके मुताबिक अभी हम मंदी के दौर से नहीं गुजरने में पूरा का पूरा 2009 लेंगे। क्योंकि अभी पूरी दुनिया मंदी के चपेट में है। पर मंदी से सबसे अधिक मुझे जो भारत में प्रभावित लगता है वह है यहां का निर्यातक कारोबार, आज की तिथि में हमारे देश के कपड़े और गहने विश्व के उत्पादों का मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि हमारे अधिकतर उत्पादों की खपत दुनिया के विकासशील देशों में होती है और वहां केलोगों ने अपने खर्चे सीमित कर लिए हैं। अधिकतर लोग अब कपड़े और गहने पर खर्च करने के बजाय अपने खाने और बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर रहे हैं। 2008 वर्ष केइसी रंग को हम नहीं भुला पाएंगे क्योंकि इसे हम ना बुरा कह सकते हैं ना भला कह सकते हैं न ही इसमें किसी अध्ययन के बाद किया गया पूर्वानुमान ही सही निकला।

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

सीढ़ियों का शहर शिमला


दिल्ली से लगभग साढ़े चार सौ किलोमीटर दूर शिमला को मुझे देखने का मौका पहली बार 17 दिसंबर को मिला। मुझे यह शहर सच पूंछें तो बहुत अच्छा लगा। यहां के रहने वाले लोग कितने सय हैं उसका अंदाजा वहां की सफाई व्यवस्था को देखकर लग गया। पहाड़ पर बसे इस शहर को मैंने एक नाम दिया जिसे मेरे दोस्तों ने मान्यता भी दे दी। वह नाम है `सीढ़ियों का शहर´। हालांकि इस शहर को अगर भाभियों का शहर कहा जाए तो उसमें कुछ बुरा नहीं होगा क्योंकि अगर आप यहां शादी से पहले जाते हैं तो हर तरफ नए शादी शुदा जोड़े आपको देखने को मिलेंगे। तो मेरे दोस्त सौरव ने इस शहर को भाभियों केशहर का नाम भी दे दिया। इस शहर का और बॉलीवुड की पुरानी फिल्मों का गहरा नाता भी रहा है जिसकी कहानियों में अक्सर आपने देखा होगा कि एक कनüल की लड़की होती है और हीरो यह शहर घूमने आता है और उसे उस लड़की से प्यार हो जाता है। इस तरह से पूरी कहानी आगे बढ़ती है। इस कहानी का असर हम जैसे सैकड़ों युवाओं पर अब भी है जो इस शहर में सिर्फ इसलिए आते हैं कि कोई उन्हें कनüल की लड़की मिलेगी और प्यार हो जाएगा। पर ऐसा नहीं है क्योंकि अब ना वो कनüल रहे ना ही कनüल की लड़कियां। घूमना है अगर आपको इस शहर को तो बिना किसी उमीद के आइए मस्ती कीजिए और वापस चले जाइए। अगर शरीर का वजन अधिक है तो इस शहर में आकर कुछ महीने गुजारिए शर्तिया आपका वजन कम हो जाएगा।

मैं और मेरे दोस्त कालका के रेलवे स्टेशन पर। शिमला के ट्रेन के पास
मोटे अजगर के साथ वैसे मैं सांप से बहुत डरता हूँ लेकिन ये सौंप नही है लोगों से डरा हुआ अजगर है जो कुफरी में पैसा कमा के अपने मालिक को दे रहा है।
मैं ग्रीन वैली के सामने।
शिमला के हेलीपैड पर मैं फोटो के लिए बैठा हुआ। यह बहुत ही पुराना हेलीपैड है जहाँ पर आकर दिल खुश हो जाता है।
मैं अपने दोस्तों सौरव और गौरव के साथ शिमला नगरपालिका के सामने।
शिमला से १७ किलोमीटर दूर कुफरी में देवदार के पेड़ पर फोटो खिंचवाते हुए। इस पेड़ पर चढ़कर सच में बहुत मज़ा आया।
मैं ग्रीन वैली के सामने। ये वो जगह है जहाँ पर प्रतिदिन हजारों लोग घूमने आते हैं । तो अगर आपको भी मौका मिले तो यहाँ ज़रूर तसरीफ लायें।

मंगलवार, 9 दिसंबर 2008

युवाओं की अनोखी पहल



kuch aisa karne ki zaroorat hai hamen ab waqt aa gaya hai ki hum kuch kar guzaren. to aap bheee hamare saath aa jayen................

शनिवार, 29 नवंबर 2008

ये सफलता हमारे जवानों की है ना कि कब्र में पैर लटकाए नेताओं की


26 नवंबर 2008 बुधवार को शुरू हुए मुंबई के आतंकी हमलों से निपटने केलिए बिना देरी किए दिल्ली के 200 एनएसजी कमांडो को रवाना किया गया। देश केलिए मर मिटने को तैयार रहने वाले इन स्पेशल कमांडो मुंबई पहुंचते ही मोर्चा संभाल लिया। पर किसी ने नहीं सोचा था कि हमारे बीच से दो जाबांज मेजर संदीप और कमांडो गजेंद्र चले जाएंगे। 60 घंटे तक चला आपरेशन जब पूरा हुआ तो हमारे बीच ये दुखद खबर भी आई कि अब ये जाबांज सिपाही हमारे बीच नहीं रहे। उनकी इस कुरबानी को देखकर लता जी का गाया गाना ऐ मेरे वतन केलोगों जरा आंख में भर लो पानी..., जेहन में गूंजने लगा। इसकेसाथ ही मुंबई के एटीएस प्रमुख हेमंत किरकरे और अशोक काटे जैसे सच्चे सिपाहियों की शहादत दिल को कचोटने लगी।
देश केलिए अपनी कुरबानी देने वाले ये जवान तो चले गए पर इसकेपीछे राजनीति की रोटी सेंकने वालों को पीछे छोड़ गए। जब मुंबई जल रही थी, हर तरफ आतंक फैला हुआ था तब राज ठाकरे का ना तो कोई बयान आया ना ही उनका मराठा मानुष इस सीमापार आतंकियों से लोहा लेने केलिए सामने आया। इस मुश्किल की घड़ी सबसे पहले अगर कोई दिखा तो वह था पूरे देश का जज्बा जो अपनी मुंबई को खतरे में देख सजग हो गया था और हर जगह उसकी सलामती केलिए दुआएं मांग रहा था। पूरे साठ घंटे चले आपरेशन को लोग टीवी पर देखते रहे। हमारे सैनिकों ने तो अपना काम कर दिया अपनी बहादुरी से दुश्मन केदांत खट्टे कर दिए। कायरों की तरह वार करके आतंकियों ने जहां लगभग 200 मासूमों की बलि चढ़ाई तथा 300 से भी अधिक लोगों को घायल कर दिया। तो हमारे शेरों ने इस्लाम के नाम को कलंकित कर रहे इन आतंकियों को सामने से वार करकेउनके अंजाम तक पहुंचा दिया।
आतंक फैलाकर अपनी जान देने वाले इन युवा आतंकियों जैसे और हजारों आतंकियों को इससे तो एक सबक लेना ही चाहिए कि जब वे मरते हैं तो लोग उनकी लाशों पर थू-थू करते हैं तथा जब हमारे देश केसैनिक उनको मारते हुए शहीद होते हैं तो उनकी याद में हमारे देश की करोड़ों जनता की आंखें नम हो जाती हैं। लोगों को बचाने के लिए जिन लोगों ने अपनी कुरबानी दी है उनका नाम हमेशा इस जहां में अमर रहेगा। सीमा पार आतंकियों को इससे एक चीज तो सीख ही लेनी चाहिए कि वे जितनी भी हमारी देश की अखंडता को तोड़ने की कोशिश करेंगे उससे लोग और एक दूसरे से जुड़ जाएंगे। आतंकी सिर्फ अपने कमीनेपन को उजागर मासूम लोगों को मारकर कर सकते हैं पर जब बहादुरों से उनका सामना होगा तो उनकी रूह कांप उठेगी।
अगर मुंबई केइस आपरेशन पर कोई भी पार्टी में बाद मेंं बयानबाजी करके एक दूसरे पर आरोप मढ़ने की कोशिश करेगी तो उससे हमारे शहीदों को बहुत दुख पहुंचेगा। पर इन नेताओं को कौन समझाए घटिया संस्कारों में पले बढ़े ये देश केभाग्यविधाता अपनी हरकतों से बाज नहीं आएंगे। अब आपरेशन खत्म हुआ है और अतीत की बातों पर भरोसा करें तो इस पर सियासत कल से ही शुरू हो जाएगी। केंद्र सरकार आने वाले चुनाओं में इन जाबांजों की मेहनत को अपनी कुशलता बताकर लोगों से अपने पक्ष में वोट करने को कहेगी तो विपक्षी पार्टी उन पर दूसरे तरह से वार करके इसमें मरने वाले लोगों का जिमेदार केंद्र को ठहराएगी। पर जो सच्चाई है वह पूरी दुनिया ने देखी है और सब जानते हैं कि मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, अमर सिंह, लाल कृष्ण आडवाणी, राज ठाकरे एक मच्छर भी मारने की ताकत नहीं रखते तो ऐसे में आतंकियों से अगर उनका सामना हो जाए तो वे क्या करेंगे इसकी आप कल्पना कर सकते हैं। यह जीत हमारे जाबांजो की है और उनकी सफलता का श्रेय कोई भी तुच्छ पार्टी नहीं ले सकती।
जय भारत और जय जवान
अमित द्विवेदी

सोमवार, 24 नवंबर 2008

क्या यही प्यार है...

तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगे? किसी और से बात मत करना प्लीज और मेरा इंतजार करना समय से खाना खा लेना और सुबह उठते ही पहले मेरा संदेश पढ़ना। अब मैं आपको रोज सुबह जगाया करूंगी तभी उठना। चलो अब सो जाओ। यह डॉयलाग सभी केसाथ उस समय घटता है जब वह प्यार के अपने पहले या दूसरे दिन में होते हैं और बात आई लव यू तक पहुंच जाती है। दुनिया हसीन लगने लगती है हर तरफ सिर्फ एक प्यारा सा संसार दिखाई देता है जिसमें सब अच्छे लगते हैं। कुल मिलाकर जिंदगी मोबाइल फोन और इंटरनेट केइर्द-गिर्द घिरकर रह जाती है। उसका इंतजार रहता है जिसके साथ चार दिन में चार सौ साल तक जीने तक केसपने देख लिए जाते हैं।
पर जैसे-जैसे दिन बीतते हैं बस प्यार में शिकायतें दस्तक देती हैं। डायलॉग बदल जाता है। प्यारा सा अहसास दिलाने वाली सारी बातें समय केसाथ धूमिल हो जाती हैं। फिर कुछ इस तरह से डायलॉग बनने लगते हैं।
मैंने तुहें फोन किया था। तुहारा फोन व्यस्त जा रहा था तुम किससे बात कर रहे थे। वह जरूर कोई लड़की या लड़का रहा होगा। तुम मुझे भूल रहे हो? आज तुमने पूरे दिन में मुझे एक बार भी याद नहीं किया। आखिर इतने जल्दी ऐसा क्या हो गया कि तुहें मेरी परवाह नहीं रही। इस तरह से चलते-चलते एक दिन ऐसा आता है कि शिकायतों और गुस्से के बवंडर में फंसकर पहले दिन के किए गए वादे और सारे प्यारे अहसास दुश्मनी में बदल जाते हैं। इसके बाद में जब प्यार का अंत होता है तो उसकी शुरुआत और भी भयानक होती है। जो कुछ सप्ताह पहले एकदूसरे के बगैर जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता था वह अब अपने दोस्तों में बैठकर अपने प्यार को जलील कर रहा है। उसकी गलतियां गिना रहा है। ये अंश जो मैंने लिखे हैं आज के प्यार की वास्तविकता है अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप इसे क्या नाम देंगे। क्या यह सच में वही वाला प्यार है जिसे लैला-मजनू और हीर रांझा ने किया था। या फिर अब जरूरतों वाला प्यार है जिसमें एक इनफैचुएशन केसिवा कुछ और नहीं है। हर कोई किसी को चाहता है पर उसकेप्रति कितना गंभीर रहना चाहता है इसका वादा वह ना खुद से करता है ना ही उसका आभास अपने साथी को होने देता है। इस तरह से कुल मिलाकर कहा जा सकता है यह एक तरह की बीमारी है जिसमें बहुत से लोग एक दूसरे को मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं। जिसका उदाहरण मुझे देने की जरूरत नहीं है अखबार समाज का आइना हैं उसमें हर दिन ऐसी खबरें प्रकाशित होती हैंं जिसमें प्यार के अंत का बेहतर उदाहरण दिया जाता है। पर मैंने अब तक जो देखा है वह मैंने बताया। अब आगे आप क्या सोचते हैं वह मुझे बताएं। और आधुनिक समाज के प्यार की एक परिभाषा देने में मुझे मदद करें जिसे मैं अपने अगले किसी पोस्ट में प्रयोग कर सकूं।

रविवार, 16 नवंबर 2008

आओ करें 12 ज्योर्तिलिंगों के दर्शन







अभी तक मैं जहां-जहां गया उन जगहों के बारे में आपको विस्तार से बताया और कुछ अपनी वहां की तस्वीरें भी दिखाईं। पर इन यात्राओं के दौरान मैंने कई पवित्र तीर्थस्थलों को भी देखा। अचानक मेरे मन में विचार आया कि क्यों ना मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से आपको भगवान शंकर के 12 पवित्र ज्योर्तिलिंगों के दर्शन अपने शब्दों और वहां ली गई तस्वीरों के माध्यम से करवा दूं। मैं धीरे-धीरे इन सभी ज्योर्तिलिंगों के दर्शन कर रहा हूं। 16 नवंबर तक मैंने तीन ज्योर्तिलिंगों देखे जिनमें से सभी महाराष्ट्र में स्थित हैं। उनमें से मैं आपको त्र्यम्बकेश्वर , भीमा शंकर और घुश्नेश्वर के बारे में विस्तार से बताऊंगा। पर सबसे पहले मैं त्र्यम्बकेश्वर ज्योर्तिलिंगों से अपनी शुरुआत करूंगा। अपनी इस धार्मिक यात्रा में मैं आपको वहां के इतिहास के साथ-साथ मौजूदा स्थिति को भी बताऊंगा। तो आइए चलते हैं

त्र्यम्बकेश्वर ज्योर्तिलिंग:-
मैंने इस ज्योर्तिलिंग का दर्शन 6 जनवरी 2007 को किया। मैं जब यहां पहुंचा तो उस समय बहुत अधिक भीड़ नहीं थी क्योंकि उस समय कोई खास धार्मिक पर्व नहीं चल रहा था। मैं नासिक के ज्युपिटर होटल में रुका हुआ था जहां से पवित्र स्थल 30 किलोमीटर दूर है। सुबह नौ बजे मैं अपनी मां के साथ यहां पहुंचा। उस समय मन में श्रद्धा के भाव भरे हुए थे। पर जैसे ही हमने इस तीर्थ में प्रवेश किया तो ढेर सारे पंडित और पुजारी हमारे पीछे लग गए कि आप इतना रुपया हमें दे दीजिए हम आपको जल्दी से और आराम से दर्शन करवा देंगे। उसके लिए आपको सिर्फ 800 रुपये खर्चने होंगे। थोड़ा सा आराम से दर्शन करने के लिए हमने बागेüनिंग शुरू की पर पंडित जी 500 रुपये से नीचे नहीं आए और हमने अपने आप ही भगवान का दर्शन करने का फैसला किया। जब हमने इस जयोतिलिZग के परिसर में प्रवेश किया तो वहां की गंदगी देखकर दंग रह गए। जिस ज्योर्तिलिंग के दर्शन करने लोग देश-विदेश के कोने-कोने से आते हैं वहां पर इतनी गंदगी हो सकती थी ये मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। लाइन में लगकर जब हम मुयद्वार पर पहुंचे तो वहां पर किसी व्यक्ति ने मल त्याग कर रखा था जहां मखियाँ भिनभिना रही थीं और लोग पवित्र भाव से उस पर पैर रखते हुए गंदगी मंदिर में लेकर जा रहे थे। उस गंदगी को देखकर मैंने सोचा कि इसकी शिकायत किसी मंदिर के प्रमुख पुजारी से की जाए पर वहां पर मुझे कोई नहीं मिला और जो मिला भी वह भक्तों की तलाश में पड़ा था जिससे उसे कुछ पैसे मिलते। उस गंदगी के बीच से निकलते हुए अंतत: हमने दर्शन कर लिया और होटल वापस आ गए।
धार्मिक पृष्ठभूमि:- गोदावरी के तट पर स्थित इस ज्योर्तिलिंग की गणना भगवान शिव के बारह ज्योतिलिZगों में से होती है। यहां के निकटवतीü ब्रहमगिरी नामक पर्वत से पूत सलिला गोदावरी नदी निकलती हैं। गोदावरी का महत्व दक्षिण भारत में ठीक उत्तर भारत की गंगा की तरह है। गोदावरी नदी ऋषि गौतम की घोर तपस्या का फल है। भगवान आशुतोष ने खुश गौतम को यह नदी वरदान के रूप में प्रदान की थी। जिस समय गौतम मुनि यहां के ब्रह्मगिरि पर तपस्या कर रहे थे उन्हें इस दौरान अनेक सिद्धियां प्राप्त हुईं। पर उनके प्रताप से जलेभुने कुछ संतों ने उन पर गोहत्या का आरोप लगा दिया और उसके प्रायश्चित के लिए उन्हें यहां पर गंगा जी को लाने को कहा। गौतम मुनि ने इस झूठे पाप से मुक्ति पाने के लिए एक करोड़ शिवलिंगों की पूजा की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव शिवा के साथ प्रकट हुए। पर जब जब ऋषि ने वरदान मांगा तो गंगा यहां आने को तैयार नहीं हुईं। उनका कहना था कि जब तक शिव यहां प्रतिष्ठित नहीं होते वे वहां नहीं आएंगी। गंगा के इस आग्रह पर भगवान शिव ज्योतिलिZग के रूप में वहां प्रतिष्ठित हुए और गंगा गौतमी के रूप में वहां उतरीं। इसके बाद सभी देवताओं ने प्रकट होकर यहां पर गंगा का अभिषेक किया। तभी से जब गुरू सिंह राशि पर रहते हैं तब सभी तीर्थ गौतमी या गोदावरी के किनारे उपस्थित हो जाते हैं।
कैसे पहुंचे:- नासिक रेलवे स्टेशन से बहुत सी छोटी-छोटी गाçड़यां यहां के लिए चलती हैं। यहां पर पहुंचकर आप धर्मशालाओं में भी शरण ले सकते हैं। जब कभी भी आप यहां आएं तो कम से कम तीन दिन का समय लेकर आएं क्योंकि यहां के आसपास कई ऐसी धार्मिक जगहें हैं जिनकी रमणीकता देखकर आपका मन प्रसन्न हो उठेगा। ब्रहमगिरि, नीलगिरि और ब्रृह्मद्वार देखने जरूर जाएं।

शनिवार, 15 नवंबर 2008

दिल्ली के रेडलाइट पर भिखारियों की जगह हिजड़े

आजकल दिल्ली केरेड लाइट वाले चौराहों पर एक नया बदलाव देखा जा सकता है। यहां से पारंपरिक भिखारियों की संया अचानक कम हो गई है। उनकी जगह हिजड़ों ने ले ली है। हिजड़ों को आजकल हर रेड लाइट से अच्छी भली रकम मिल जाती है जिसे देखकर ऐसा लग रहा है कि भिख मांगने का काम करवाने वाले आकाओं का यह आइडिया पूरी तरह से सफल हो रहा है।दो महीने पूर्व शनिवार को मैं अंसल प्लाजा केपास से निकलकर नोएडा केलिए रिंग रोड पर आने के लिए रेड लाइट पर खड़ा हुआ तभी मैंने वहां देखा कि कई औरतें साड़ी में खड़ी हैं। पर जब वे मेरे पास आईं तो पता चला कि वो हिजड़ा लोग हैं जो यहां पर लोगोंं से पैसे मांग रहे हैं। मुझे लगा कि सिर्फ ये हिजड़े यहीं केचौराहे पर होंगे। पर बाद में मैंने दो महीने के अपने दिल्ली के विभिन्न इलाकों का भ्रमण करने केबाद ये निष्कर्ष निकाला कि ये हिजड़े तो अब दिल्ली केहर चौराहे पर पहुंच चुके हैं। मैंने इस बारे में दिल्ली केकुछ लोगों से बात करकेये जानने की कोशिश की तो ये पता चला कि ये हिजड़े वास्तव में रेवेन्यू कम हो जाने के कारण यहां पर लाए गए हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि मैं किस रेवेन्यू की बात कर रहा हूं। भाई ये वही रेवेन्यू है जो दिल्ली केसभी चौराहों से भिखारियों द्वारा वसूला जाता है। ये सारा पैसा उनकेआकाओं तक पहुंचकर कई तरफ से बंटता हुआ इन भिखारियोंं को उसका कुछ अंश तनवाह के रूप मे मिलता है। पर पिछले कुछ सालों में लोगों ने भीख देना लगभग बंद सा कर दिया। इससे इस धंधे को काफी नुकसान होने लगा। इस नुकसान की भरपाई केलिए पूरे दिल्ली में लाखोंं हिजड़ों को चौराहोंं पर तैनात किया गया है। ये लोगों केसाथ बत्तमीजी करके कुछ ना कुछ सभी लोगोें से निकलवा ही लेते हैं। लोग इनसे बचने केलिए दस पांच रुपये देकर अपना पिंड छुड़ा लेते हैं। चौराहों पर जो हिजड़े आजकल भीख मांगते नजर आ रहे हैं वास्तव में उनमें से कई लोग सामान्य पुरुष हैं पर पैसा कमाने के लिए उन्होंने यह रूप धरा हुआ है। अब जब आप किसी चौराहे से दिल्ली के निकलें तो इस बदलाव को ध्यान से जरूर देखिएगा। वैसे भी दिल्ली केसभी चौराहों से अब गंदे-गंदे भिखारी कम हो गए हैं तथा शनिदेव केनाम पर उगाही करने वाले भी अब इस धंधे से धीरे-धीरे दूर हो रहे हैं। यह भी हमारेआजाद देश का ही एक रूप है जो आए दिन अपना रंग बदल रहा है। मैनेजमेंट केइस युग में भला भिखारियों का धंधा कब तक नुकसान में चल सकता था। इसलिए भिखारियों केसरादार ने इस धंधे में नई जान फूंक दी और इसे दोबारा मुनाफे में ला दिया।

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

मैं और मेरा ऑफिस

मैं हर एक पल का शायर हूँ हर एक पल मेरी जवानी है हर एक पल मेरी मस्ती है हर एक पल मेरी कहानी है।
मैं और मेरा ऑफिस आपास में अक्सर ये बातें किया करते हैं की मैं वहां होता तो कैसा होता मैं वहां होता तो कैसा होता। लेकिन ये यात्रा किसी को नही पता की कहाँ जाने वाली है मुझे भी। देखते हैं मैं और मेरी ये उड़ने की जिज्ञासा मुझे कहाँ ले जातीं हैं।

शादी होते ही चमक गयी किस्मत


कहते हैं की हर सफल व्यक्ति की पीछे एक महिला का हाथ होता है। मैं इस कहावत पर ज्यादा भरोसा नही करता था लेकिन मेरे ऑफिस में एक ऐसी घटना घटी जिसने मुझे ये भरोसा दिला दिया की हाँ ये सच है. तो हुआ यूँ की मेरे ऑफिस में स्पोर्ट्स डेस्क पर एक अजय नथानी जी थे. प्रतिभा तो उनसे लिपटी पडी थी. पर उनकी ही एक परेशानी थी जो की हर पत्रकार के साथ होती है वो थी की उनकी प्रतिभा को कोई समझ नही रहा था. नथानी जी शादी के योग्य बहुत पहले हो गए थे पर जीवन के झंझावातों में फंसकर वो उसे साकार रूप नही दे पाए थे. लेकिन जब उन्हें ऑफिस में परेशानी ज्यादा होने लगी तो उन्होंने शादी कर ली बस क्या था नथानी जी की किस्मत चमक गयी. शादी होने के एक महीने में ही उन्हें सहारा से ऑफर आया और वो चले चीफ सुब बनकर सहारा. उन्हें हमारे ऑफिस में हर कोई मिस करता है. लेकिन नथानी जी अभी तक किसी से नही मिलने आए उनके इस व्यवहार से ये लग रहा है की ये यहाँ पर कितने परेशान थे. पर जो भी हो देर में ही शादी की नथानी भाई ने लेकिन उनकी पत्नी तो किसी लक्ष्मी से कम नही निकली. अगर आप भी परेशान हैं और उम्र बढ़ रही है तो निडर होकर शादी कर लें तरक्की आपके कदम चूमेगी. और इसे पढ़कर नथनी जी को शुक्रिया कहना ना भूलें मैं इसीलिए उनकी फोटो भी प्रकाशित कर रहा हूँ.

जय हो नथानी भाई हमेशा खुश रहो और तरक्की करो ढेर सारी आपको बधाई

बुधवार, 29 अक्टूबर 2008

वो जो उल्ले बैठे हैं ना....

आ जा बेटा खूब चिला और ये ले खाना पीना खा. ये सब खाना पीना सचिन तेंदुलकर के शतक के उपलक्ष में है आज वो ज़रूर शतक जमाएगा. और सुन गुडिया इधर आ वो देख जो कपडे वपड़े उतर के उल्ले साइड में बैठे हैं ना वो हैं ऑस्ट्रेलिया के प्लेयर और जो ओढे बेधे हैं और पल्ले साइड में हैं ये हैं अपने हिन्दुस्तान के खिलाडी. लेकिन पापा धोनी कौन है इसमे से? अरे बेटा वो यहाँ करेगा बाथरूम में बैठा कपडे धो रहा है. अब तू एक काम कर खूब ज़ोर ज़ोर से चिल्ला और मज़े कर मैं थोडी ड्यूटी करके आता हूँ नही तो फालतू लोग स्टेडियम में घुस आयेंगे. और देख इधर उधर मत जाना. ये सीन है बुधवार दोपहर १ बजे फिरोजशाह कोटला स्टेडियम डेल्ही का वेस्ट एंड स्टैंड गेट नो दो का. जहाँ पर ड्यूटी कर रहे एक डेल्ही पुलिस के सिपाही ने अपने परिवार के कुछ सदस्यों को मच के लिए बुलाया था और अपनी गुडिया से बात कर रहा था और उसे समझा रहा था. उस टाइम सचिन ६८ और गंभीर ६४ पर बैटिंग कर रहे थे. इसी बीच सचिन ने एक चौका लगाया. वो गेंद पवेलियन की और गयी. जहाँ पर लोगों को सहवाग के चेहरा नज़र आया. क्यूंकि सहवाग २९ अक्टूबर को खेले गए इस मच की पहली परी में सिर्फा १ रन ही बनाया इसलिए लोगों को थोडी निराशा हुयी थी. बस क्या सहवाग को देखते ही हर कोई चिल्ला उठा वीरू वीरू जब सब चुप हो गए तब एक पाँच साल का बछा बहुत ही बुलंद आवाज़ में बोलता है की ओये वीरू तेरी वसंती कहाँ है? उसकी ये बात सुनकर वहां मौजूद हर कोई हंस पड़ा. ये था मेरा मच का पहला दिन जिसमे ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले दिन २९६ रन बनाये तीन विकेट के नुकसान पर. गंभीर ने पहले दिन शतक जमाते हुए १४९ रन बनाये और ५४ रन बनाकर लाक्स्मन उनका साथ दे रहे थे. सचिन ने भी इस मच में ६८ रन की लाजवाब परी खेली. अमित द्विवेदी

शनिवार, 25 अक्टूबर 2008

बन सकते हो तो राज ठाकरे बनो

जब कोई बच्चा होता है तो उसे उसके परिवार वाले बड़े आदर्शों वाली कहानियाँ सुनते हैं और उसे वैसा आचरण करने के लिए और उसके जैसे बनने के लिए कहते हैं. पर मैंने जब से राज की दादागिरी मुंबई में देखी है तबसे मन कर रहा था कुछ लिखूं और आज मौका मिला तो लिख रहा हूँ. मैं आप सबसे कहना चाहता हूँ की अगर आप कुछ बनना चाहते हैं तो राज ठाकरें बनो. राज एक ऐसा नाम है जो कुछ भी कर सकता है. वो जेल के बाहर घूमने वाला गुंडा है. पर पुलिस उसके सामने कुछ भी नही किसी को वो मर सकता है किसी कोई पीट सकता है कुछ भी किसी कोई कह सकता है कानून और अदालत उसके सामने कोई मायने नही रखते. अब आप ही सोचिये अगर हम सब राज ठाकरे जैसा बन जायें तो देश से पुलिस और कानून की ज़रूरत ख़त्म हो जायेगी. क्यूंकि सरकार तो राज कोई चैलेन्ज कर नही सकती तो उसे कम से कम हम एक गुंडा संप्रदाय का प्रतिन्धित्व करने के कारन चैलेन्ज तो कर पाएंगे. भाई जिस बन्दे में इतनी ताकत है ऐसा बन कर हम भी देश का नाम रोशन करें. इसके बाद फिर हम राज ठाकरे से पंगा भी ले पाएंगे. तो भाइयों मैं आप सबसे अनुरोध करता हूँ की सामने आयें और नही ज्यादा तो एक राज ठाकरे बनकर दिखाएँ क्यूंकि ऐसा करने से ही आप इस देश के शसक्त नागरिक कहलावोगे. तो आवो आज हम सकल्प लें की इंडिया के हर प्रदेश और शहर पर अपनी क्षेत्रीय भाषावों का राग गाकर अपना बर्चस्व कायम करें.
जय राज ठाकरे का नारा लगावोए और देश में सैकडों राज बनावो

सोमवार, 13 अक्टूबर 2008

और वो यमुना me कूद गयी

बात रविवार के रात ११ बजकर १० मिनट की है। मैं अपने नॉएडा स्थित अपने ऑफिस से घर लौट रहा था। जैसे ही मैं नॉएडा टोल ब्रिज के यमुना पुल पर पहुँचा मैंने देखा एक लडकी यमुना के पुल के रेलिंग पर चढ़कर बिना कुछ कहे नीचे छलांग लगा गयी। उसके साथ दो व्यक्ति थे एक की उम्र लगभग २८ साल रही होगी और दूसरे की उम्र ३२ साल से ३६ साल के बीच में थी। ये लोग एक बड़ी गाडी में सवार थे। मैंने सोचा पहले कुछ करूँ पर मैंने उन दोनों बन्दों का रवैया देखकर उनके पास नही गया क्यूंकि उन लोगों ने वहां रुकने वाले लोगों के साथ बत्तमीजी की। मैं थोड़ा जाकर आगे रुक गया और वहां पर ५ मिनट में पोली की जिप्सियां आ गयीं और एक फायर बिग्रेड की गाडी भी आयी। मैंने जब उन लोगों से पुछा की माज़रा क्या है तो उन्होंने कहा की यमुना में कोई गाडी गिर गयी है। मैं उन पुलिस वालों के साथ घटनास्थल की और बढ़ा। मैंने देखा वो दोनों बन्दे एक दूसरे से गले लगकर कर रो रहे थे। मुझे देखते ही उसमे से एक बंद आगे बढ़ा और पूछता है आप कौन हो? मैंने कहा देखो मैं प्रेस से हूँ और मैंने यहाँ देखा कुछ हुआ सो रुक गया। तो उस बन्दे ने मुझसे कहा आप यहाँ से चले जाओ। जब मैं थोड़ा गुस्से में उनसे बात की तो वो बंद मेरे पैर पड़ने लगा और बिनती करने लगा की देखिये भाई साहब मैं पहले ही अपनी भाभी को खो चुका हूँ अब कोई और पंगा नही करना चाहता। यही कहकर वो रोने लगा मुझे उसपर दया आ गयी और मैं वहां से चला आया। एक बार सोचा लावोए अपने अख़बार के दफ्तर में फ़ोन कर दूँ। पर मैंने सोचा रहने दो बेचारे परेशान हैं और मैंने किसी को नही बताया हलाँकि दूसरे दिन अख़बारों में मैंने सिंगल कालम खबर देखि पर उसमे किसी का नाम नही दिया था सिर्फा इतनी इन्फोर्मेशन थी की कोई यमुना में कूद गया है। लगता है इस मामले में पुलिस भी गोलमाल रवैया अपना रही है। अब मुझे ये नही पता लगा की आख़िर वो लडकी यमुना के क्यूँ कूद गयीए। अब आप बताएं मैंने कुछ ग़लत तो नही किया। क्यूंकि मैंने किसी को इसकी ख़बर किसी भी नही दी।
अमित द्विवेदी

रविवार, 12 अक्टूबर 2008

और मैं पहुँचा 'लहरों का सरताज़' बनने

और मैं पहुँचा 'लहरों का सरताज़' बनने ११ अक्टूबर को मैं जब घर पहुँचा तो मैंने अपने मोबाइल में सुबह चार बजे का अलार्म फिट कर दिया क्यूंकि मुझे लहरों का सरताज बनने के लिए ऑडिशन देने जाना था. १२ अक्टूबर को सुबह सुबह मैं चाणक्य पुरी के नवल बाग़ में पहुँच गया. वहां पहले से ही करीबन ४०० लोग लाइन लगाये बैठे थे. मैंने एक भाई से पुछा की क्या यही लाइन है नेशनल जेओगार्फिक चैनल के शो 'लहरों के सरताज़' के ऑडिशन के लिए. उस व्यक्ति ने जवाब दिया जी बिल्कुल. मैंने अपनी गाडी साइड में पार्क की और और मैं भी उन्ही के साथ बैठ गया. जिन बन्दों के साथ मैं बैठा था वो सोनीपत से आए थे ऑडिशन देने. थोड़ी देर बाद हमारी बातचीत शुरू हो गई और हमने गप्पे लगना शुरू कर दिया. बातों बातों में कब सुबह हो गयी पता हेई नही चला. मैंने सुबह ६ बजे देखा तो मेरे पीछे लाइन इतनी लम्बी हो गयी थी की उसमे लोगों के सर के सिवा कुछ और नज़र ही नही आ रहा था. करीबन सात बजे प्रवेश शुरू हो गया और मैं भी सभी के साथ अन्दर पहुँच गया. वहां पर मुझे एक चेस्ट जैकेट दी गयी जिस पर नम्बर लिखा हुआ था. मेरा नम्बर था २४९. मैं वहां पर सबके साथ बैठ गया और आगे के प्रोग्राम् का वेट करने लगा. लगभग आधे घंटे बाद मेरे साथ के करीबन ५०० बन्दों को एक साथ खड़ा करके १६०० मीटर की दौड़ के लिए कहा गया. ये आर्डर हमें नेवी के कुछ अधिकरियों ने दिया. दौड़ शुरू हो गयी. शुरू में बहुत से बच्चे तेज़ी से भागे और सबसे आगे निकल गए पर थोड़ी देर में ही वो थककर या तो बैठ गए या फिर गिर गए. मैं अपने एक ले में दौड़ता रहा कोई जल्दबाजी नही की. जिसका परिणाम ये हुआ की मैं १३ वें नम्बर पर अपने लक्ष्य पर पहुँच गया. इस दौड़ में नियम के मुताबिक ६० लोगों को लेना था. मैंने ये दौड़ जीतकर मानो सारा जहाँ जीत लिया हो. जो जीता था ये रेस सब चिल्ला रहे थे. मैं भी सभी के साथ खुशियाँ मन रहा था. मैं इसलिए खुश था की जो लड़के मेरे साथ सोनीपत वाले लाइन में बहार थे वो भी रेस जीत चुके थे. और हम सब एक साथ मिलकर लंच खा रहे थे. लगभग एक घंटे बाद दूसरे राउंड की प्रक्रिया शुरू हुयी. जिसमे मैं बहार हो गया क्यूंकि उसमे बन्दर बनकर चलना था. वैसे मुझे अभी लगता है की मैं सही था और उन लोगों ने चीटिंग की नही तो मेरा दूसरा राउंड बन्दर वाला भी क्लेअर था. लेकिन ये भी हो सकता है की मैं बाहर हो गया और मन को दिलासा दिलाने के लिए ऐसा कह रहा हूँ. लेकिन जो भी रहा ये मेरी ज़िंदगी का सबसे अनोखा और रोमांचक पल था जिसमे मुझे ये पता चला की हजारों की भीड़ में कैसे कोई एक जीतता है. इस पर मैं इतना ही कहूंगा जय नेवी और जय जवान अमित द्विवेदी

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

आवो चलें शिरडी वाले बाबा के पास

मस्त बहारों का मैं आशिक जो मैं चाहूं यार करूँ ।
मेरी गाडी जो मुझे शिरडी तक ले गयी।

नासिक से २६ किलोमीटर दूर इस घाट पर जाने का आनंद ही अलग है।


मैं जब यहाँ से गुजरा तो ये सुहाना दृश्य देखकर गाडी पर ब्रेक लगा दिया। इस गांव का नाम खोपडी गांव है।








आजकल बरसात का मौसम है। नासिक के आसपास खूब बरसात हो रही है जब से मैं यहाँ आया हूँ भगवान सूर्या के दर्शन नही हुए हैं। शिरडी से ४० किलोमीटर पहले खोपडी गांव के पास एक ऐसी ही अनुपम छठा देखने को मिलती है। अगर आप भक्त होने के साथ प्रकृति प्रेमी हैं तो देर किस बात की ज़ल्दी कीजिये पता नही कब ये बरसात का मौसम चला जाए।

सोमवार, 15 सितंबर 2008

ये कैसा प्यार है?

एक व्यक्ति था वो काफी बुद्धिमान था उसे अपने ऊपर पूरा कांफिडेंस था। जो चाहता था भगवन की दया से उसे सबकुछ मिल जाता था। उसके पिता जी मध्य प्रदेस में एक सरकारी फर्म में चीफ engeener थे। पर उनकी डेथ सिर्फ़ ३९ साल की उम्र में ही हो गयी थी। उस समय वो व्यक्ति १४ साल का था। पर हर चीज़ में अवल रहने वाले उस व्यक्ति ने माँ के पालन पोषण में अपना एक पक्ष कमजोर कर लिया। वो पक्ष था उसकी लड़कियों के प्रति कमजोरी। ठीक समय पर उसकी शादी हो गयी। कुछ सालों बाद उसे एक बेटा भी हुआ। पर पाँच साल बाद उसने अपनी बेवी को तलाक दे दिया उसका क्या कारन था उसका ठीक से मुझे पता नही है। वो औरत अपने बच्चे को छोड़कर चली गयी। उसे तलाक देने के बाद वो व्यक्ति कुछ दिनों तक अकेला रहा। पर अचानक एक दिन उसकी मुलाकात एअरपोर्ट जेट ऐर्वाय्स के लिए काम करने वाली औरत से हो जाती है। ठीक उसी समय उसे उससे प्यार हो गया। बस क्या था कुछ महीने बाद उस लडकी से एक मन्दिर में जाकर महोदय ने गंधर्ब विवाह कर लिया। इस बीवी से महोदय को एक बच्चे हुयी। अपनी इस बीवी के साथ महोदय तीन साल तक रहे। इसके बाद उन्होंने अपनी इस बीवी को इसलिए छोड़ दिया क्यूंकि उन्हें इस बार एक २५ साल की मॉडल से प्यार हो गया कुछ महीने पहले अपनी माँ को साक्षी मानकर उससे विवाह कर लिया। थोड़े दिन उस लडकी ने जिस लिए शादी की थी वो पैसा वैसा बटोर के चलती बनी। जिस व्यक्ति की मैं बात कर रहा हूँ उसके तीन फाइव स्टार होलेल हैं इंडिया में। कई देशों में उसके ब्रान्चेस हैं। दो दिन पहले की बात है लगभग ४५ साल का ये व्यक्ति अपनी नयी बीवी के घर पहुँच गया। जहाँ पर उस नयी बीवी ने उसके साथ रहने से मना कर दिया। बस क्या था महोदय ने अपनी पिस्टल निकाल कर कहा तुम्हारे वगैर मैं नही रह सकता। यही कहकर उन्होंने गोली रविवार को अपने सीने में दाग लिया। गोली उनके दिल की थोड़ी से दूर रहती हुयी पार हो गयी। मुंबई के एक बड़े हॉस्पिटल में वो ज़िंदगी मौत से लड़ रहे हैं। अब आप ही बताएं एक बन्दा जिसके पास इतना सारा पैसा है उसने आपके साथ ऐसा क्यूँ किया। दुनिया की सबसे महँगी गाडियां उस बन्दे के पास हैं। वो मेरा बहुत खास है इसलिए अजीब लग रहा है। पर ये कौन सा प्यार है गलती किसकी है इसमे ये समझ नही आ रहा। इसलिए मैंने सोचा क्यूँ ना आज भड़ास निकला जाए। ये मसालेदार ख़बर नही है एक हकीकत है।
अमित द्विवेदी नासिक से

गुरुवार, 31 जुलाई 2008

जय भोले और ये दे मारा

किस पुराण में लिखा है की किसी को सताकर भी आप भक्ति कर सकते हैं. सिर्फ़ हरिद्वार जाने से ही वहां का गंगाजल पैदल चलकर लाने से ही भगवान् खुश नही हो जाते. अभी मैंने कंवाद के मेले में जो देखा उसका जिक्र यहाँ कर रहा हूँ जो आप सुनकर दंग रह जायेंगे. मैं अपने घर वापस जा रहा था आश्रम के पास से डाक कांवड़ वाले जा रहे थे एक आदमी गंगाजल लेकर दौड़ रहा था और एक मिनी ट्रक में १५ के लगभग लोग भगवे रंग के ड्रेस में बैठे हुए थे. इस ट्रक के आगे ६ लोग मोटर साइकिल पर सवार थे जिनके हाथ में मज़बूत हान्कियाँ थीं. ये लोग रास्ता खाली करवाने का काम कर रहे थे. मैंने अपनी आंखों से देखा की जय भोले के नाम का नारा लगते ये लोग रास्ता खाली करवाने के लिए तीन चार गाड़ियों के शीशे तोड़ दिए. एक बार मेरा मन हुआ की लावो मैं इन्हे भोले की महिमा बता दूँ पर चुप रहा क्यूँकी ये आस्था का सवाल था. अब हमारे देश में आडम्बर के नाम पर इस तरह से अपने ही लोगों के लिए मुसीबतें खादी कर रहे हैं जो किस हद तक जायज़ है ये सोचने वाली बात है. अब जी गाड़ियों के शीशे टूटे थे वो कहीं इसकी शिकायत भी नही कर सकते क्यूंकि ये आस्था का सवाल था. अब आप ही सोचिये क्या ऐसे दोषियों को सज़ा देने का प्रावधान हमें नही बनाना चाहिए. पता नही क्यूँ जब इस तरह के भोले बने लोगों को मैं देखता हूँ ज़ल भुन जाता हूँ. अरे भइया किसी के लिए कुछ न कर सको तो कम से कम उनका बुरा तो मत करो. भोले सबकी रक्षा के लिए जाने जाते हैं सिर्फ़ आग लगाने के लिए और दंगा फैलाने के लिए नही. अमित द्विवेदी