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हर साल मुंबई में लगभग डेढ़ सौ फिल्में बनती हैं लेकिन हर साल कितने हजार लोग फिल्म बनाने, फिल्म से जुड़ने के सपने को लेकर इस शहर में आते हैं, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। मुंबई के हर गली-मोहल्ले में आपको एक फिल्म वाला मिल जाएगा। हो सकता है कि उनके लिंक बडे ़-बड़े डायरेक्टरों से हों लेकिन वह जहां रहता है और जो उसका रहन-सहन है, वह बहुत ही मामूली है पर उसके सपनों की मंजिल इतनी ऊंची है कि आप अपनी कल्पना शक्ति से भी वहां तक नहीं पहुंच सकते। लेकिन ये मुंबई है, यहां पर पैसा जेबों से अधिक लोगों की जुबान पर रहता है। बॉलीवुड में फिल्मों की प्लानिंग कहां-कहां और कैसे- कैसे होती है, यह बात काफी दिलचस्प है, बता रहे हैं अमित द्विवेदी
अंधेरी का लोखंडवाला
यदि इस इलाके को कलाकारगढ़ कहें तो गलत नहीं होगा। भले ही इस जगह का यह आधिकारिक नाम न हो लेकिन बॉलीवुड की कई जानी-मानी बड़ी-छोटी हस्तियां यहीं रहती हैं। हीरा पन्ना माल के पास बने एक रूम वाले घरों में न जाने कितने कलाकार आए, रहे, बढ़े और फिर बड़ा घर लेकर निकल लिए। ‘पंचवटी’ नाम के इस अपार्टमेंट के बारे में कहते हैं कि कभी रघुवीर यादव, नंदिता दास जैसे कलाकार यहां रहा करते थे। मौजूदा समय में इस अपार्टमेंट्स के एक रूम का किराया 16 हजार रुपये प्रतिमाह है। लेकिन आप इसकी कीमत पर मत जाइए, बस अपार्टमेंट्स के सामने खड़े हो जाइए। हर दो-चार मिनट पर कोई न कोई जाना-पहचाना चेहरा आपको दिख जाएगा। यदि आपको रतन राजपूत का ‘स्वयंवर’ याद हो तो बता दें कि इसी अपार्टमेंट्स के एक छोटे से कमरे में मैडम रहा करती थीं लेकिन ‘स्वयंवर’ के बाद उनको चैनल वालों ने एक घर दे दिया और वह यहां से निकल गई। लेकिन अब भी छोटे परदे पर दिखने वाले कई रईस ठाकुर-ठकुराइनों का आशियाना इसी अपार्टमेंट्स में है। ओशिवारा में स्थित इस बिल्डिंग का अतीत न जाने कितनी सुनहरी यादों को अपने में समेटे हुए है। इसके बाद आपको यहां के दो और दृश्यों से अवगत करा देते हैं। यहां इनफिनिटी मॉल के सामने एक सड़क जाती है, जिस पर चाय की ढेरों दुकानें दिखेंगी लेकिन ये चाय की दुकानें बहु त ही खास हैं क्योंकि न जाने कितनी चुस्कियों में कितनी फिल्मों की कहानियां यहां पैदा होकर सिल्वर स्क्रीन का सफर तय करती हैं। यहां खड़े होकर चाय पीने वाले फिल्म मेकरों के चाय पीने का अंदाज उससे भी निराला है क्योंकि ये लोग पैसा बचाने के लिए एक चाय में जितना संभव हो सकता है, उतनी चाय लेकर उसकी कम मात्रा को भी सिगरेट के धुएं के साथ-साथ घंटे भर में खत्म करते हैं। यहां पर लोगों से बात करके पता चला कि यहां पर वे स्ट्रगलर आते हैं , जिनके पास आइडिया हैं लेकिन जेब में पैसे नहीं, फिर भी उन्हें कुछ न कुछ काम मिल जाता है। हिमाचल प्रदेश के छोटे से गांव से हीरो बनने का सपना लेकर आए राम ठाकुर ने बताया, ‘जिनके पास टैलेंट है उनके पास पैसा नहीं है और जिनके पास पैसा है वे बिना टैलेंट के ही आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि फिल्ममेकर फिल्म बनाने के लिए आजकल पैसा देता कम है लेता ज्यादा है।‘
इस सड़क से सिर्फ 500 मीटर की दूरी पर स्थित लोखंडवाला सर्कल के पास बना कैफे कॉफी डे देर रात तक गुलजार रहता है और यहां पर जो भीड़ जमती है, वह उन कलाकारों की है जिन्हें पैसे की टेंशन नहीं। बस, वे अपने आपको सिल्वर स्क्रीन पर जमाने के लिए मीटिंग करते हैं। यह स्ट्रगलरों का मुंबई में प्रमुख अड्डा है। यहां पर न सिर्फ हीरो- हीरोइन से निर्देशक पहली मुलाकात करते हैं बल्कि कई कहानियां भी हीरो-हीरोइनों को सुनाई जाती हैं। पृथ्वी थिएटर अगर मुंबई में सबसे खास कोई जगह है तो वह है पृथ्वी थिएटर। यहां पर रंगमंच, छोटे पर्दे व बड़े पर्दे के बहुत सारे लोगों से रूबरू होने का मौका मिलता है। जुहू बीच से सटे इस थिएटर की मालकिन अब संजना कपूर हैं। यह ऐसी जगह है जिसे स्ट्रगलरों का एक बड़ा गढ़ माना जाता है। कोई मुंबई घूमने जाता है तो वह भले ही इस जगह नहीं पहुंच पाए लेकिन जब कोई स्ट्रगलर आता है तो उसे यहां का रास्ता भी नहीं पूछना पड़ता। यहां आकर बहुत से लोग अपनी भड़ास भी एक-दूसरे से निकालते हैं तो कुछ छोटा- मोटा काम भी यहां से हासिल कर लेते हैं। शाम को यह जगह मुंबई के लिहाज से किसी स्वर्ग से कम नहीं लगती। यहां पर हांकने वालों का एक पूरा ग्रुप बैठा रहता है जिसकी बातें सुनकर आपको यही लगेगा कि बस, उसी ने अमिताभ, शाहरुख जैसे कलाकारों को यह मुकाम दिलाया है। लेकिन भले ही ये सब यूं ही इधर-उधर की कितनी ही बात क्यों न करें लेकिन मायानगरी में यह सुनना भी किसी दिलचस्प फिल्म देखने से कम नहीं होता।
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गुरुवार, 28 मार्च 2013
बॉलीवुड की मंजिल के हमराही
गुरुवार, 21 मार्च 2013
गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012
बारों में सुने जा सकते हैं भजन के बोल, कोशिश करके तो देखो
शुक्रवार, 18 मई 2012
शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012
हमारी दमन यात्रा लेकिन दीव यहाँ से दूर है
एकदिन बस हम यूँ ही घर में बैठे हुए थे बस ख्याल आया कि क्यों न ऐसी जगह की सैर की जाए जहॉं के बारे में मैंने सिर्फ 9वीं और 10वीं क्लास में भूगोल की किताब में पढा था। दमन दीव यानी कि हमारे देश का केंद्र शासित प्रदेश। इस प्रदेश की आबादी उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर फैजाबाद से भी कम होगी। मैं और मेरी पत्नी ने फैसला किया कि इस जगह हम अकेले नहीं जाऍंगे बल्कि पूरे परिवार के साथ जाऍंगे। बस क्या था हमने अयोध्या फोन किया और अपने चाचा-चाची और उनके दो बच्चों को मुंबई आने का आमंत्रण दिया।
एक महीने बाद एक ऐसी सुबह आई जब हमारी यात्रा का आरंभ टाटा आरिया में हुआ। यह गाडी मैं स्वयं ड्राइव कर रहा था। मेरे घर से यानी कि कांदीवली से दमन की दूरी लगभग 180 किलोमीटर थी। अमदाबाद हाइवे से होते हुए हमें वापी नाम की जगह से बाएं टर्न लेकर इस जगह पहुँचना था। वापी से दमन की दूरी सिर्फ 10 किलोमीटर है।
अब सवाल उठता है कि दमन में देखने लायक क्या है। आपको बता दें कि इस प्रदेश में हमने प्रवेश गलत रास्ते से किया इस वजह से टूटे-फूटे रास्तों ने हमें चौंका दिया और ऐसा प्रतीत हुआ कि बस हमारा वीकेंड चौपट हो गया। यहॉं पर मेरे मामा के बेटे रहते हैं तो हम सबने सबसे पहले उनके घर जाने का फैसला। इसके बाद हम सब साथ में दमन की यात्रा पर निकले।
सबसे पहले आपको बता दूँ कि दमन और दीव एक ही जगह जैसे सुनने में लगते हैं लेकिन दमन और दीव में समंदर बाधा डाले हुए इसलिए आप जब दमन जाऍंगे तो दमन के ही होकर रह जाएँगे। अब मुझसे मत पूछिएगा कि आखिर दीव कैसे जाते हैं। क्योंकि जब यह सवाल मैंने एक लोग से पूछा तो उन्होंने बताया कि अगर आप इस गाडी से वहॉं जाना चाहते हो फिर अहमदाबाद से यहॉं एक रास्ता जाता है इसका मतलब अगर मैं दमन से दीव जाना चाहता तो फिर एक हजार किलोमीटर गाडी चलानी पडती। इसलिए मैंने अपने पूरे परिवार को सिर्फ दमन में ही दीव की छवि निहारने के लिए कहा।
अब बात दमन की जो जगहें हमने यहॉं घूमी। यशोदा बीच यहॉं का सबसे खूबसूरत बीच है। दमन शहर से यहॉं की दूरी लगभग 8 किलोमीटर है। यहॉं पर हमने दो किले और दो बडे बीच देखे। इन बीचों की खूबसूरती ने सबका मन मोह लिया। मुंबई से यात्रा के दौरान पडने वाले द्रष्यों ने सबका मन मोह लिया।
लेकिन अविरल और अभिनव की गाडी में हालत खराब थी और वे दोनों एक्जॉस्ट हो रहे थे। किसी तरह से हम मुंबई लौटे और फिर आगे की यात्रा का प्रबंध किया जो कि मुंबई की थी। इस यात्रा को हम आपके सामने तस्वीरों के जरिए पेश कर रहे हैं।
रविवार, 24 अक्टूबर 2010
शनिवार, 28 अगस्त 2010
कानून का मुजरिम नहीं हीरो डाकू कहिए जनाब
पहले खलनायक की तरह किडनैप किया इसके बाद फिरौती ली और उस व्यक्ति की पत्नी को कुछ गहने गिफ्ट देकर उसे छोड़ दिया जिससे एक डाकू हीरो बन गया। इसमें मुझे जो सबसे अच्छा लगा वह यह कि भले ही सरकार गरीबों के लिए कोई आरक्षण देने को न तैयार हो लेकिन ये डकैत गरीबों की पूजा करते हैं इसीलिए वे फिरौती के लिए किसी ऐसे व्यक्ति का अपहरण करते हैं जो गरीबी रेखा से ऊपर रह रहे हैं।
चलो भगवान ने गरीबों को पैसा नहीं दिया तो अच्छा ही किया कम से कम वे इस पाप की दुनिया में सलामत तो हैं। जिसके पास बहुत सारा धन है वह इस गम से मरा जा रहा है कि कहीं कोई उसका किडनैप न कर ले। मैं तो उस दिन का इंतजार कर रहा हूं जब कोई समाचार चैनल उस डकैत तक पहुंचकर उसका इंटरव्यू लेगा और यह सवाल करेगा कि डाकू सर आखिर आप ऐसा क्यूं करते हैं? इस पर डाकू का वही पुराना जवाब होगा कि मेरे साथ किसी जमींदार ने इस तरह से ज्यादती की उसी का बदला लेने के लिए मैंने हथियार उठाया है।
अब तो टीवी के हास्य शो में भी डकैतों की इन बातों को पेश करके लोगों को हंसाया जा रहा है। एक दिन मैंने टीवी पर देखा कि एक हास्य कलाकार कह रहा था कि इन ठाकुरों और जमींदारों के जुल्मों तले पिसकर चुड़ैलों और डाकुओं का जन्म होता है। जिस तरह से डाकू समाज के लोग आजकल फिरौती की रकम बारगेन कर रहे हैं उस पर आधुनिक बाजार की प्रतिस्पर्धा नजर आती है।
हो सकता है आने वाले दिनों में डाकू एक साथ एक परिवार के दो लोगों का अपहरण करके एक के साथ एक फ्री का ऑफर भी देने लगें। एक की फिरौती दीजिए दूसरे को हम वैसे ही छोड़ देंगे। अगर कानून व्यवस्था का हाल यही रहा तो ऐसा भी होने लगेगा। यही नहीं कुछ दिन बाद डाकू समाज के लोग भी आरक्षण के नाम पर धरना प्रदर्शन करते भी दिखाई दे सकते हैं। एक बहादुर महिला की खबर सबने पढी और उसकी बहादुरी पर नाज किया लेकिन अब तक कोई ऐसा कदम नहीं उठाया गया जिससे हीरो बनने के कगार पर खड़े डाकू भाई साहब पर कानून का शिकंजा कसा जा सके। बस यही हमारे देश की विडंबना है।
अमित द्विवेदी/ /युवा जंक्शन


















