सोमवार, 31 अगस्त 2009

......और मैम चली गईं

अरे नालायकों जल्‍दी आ जाओ देखो टीवी पर कौन आ रहा है, आज की खबर सुन तो बाद में काम आएंगी देश विदेश में क्‍या हो रहा है तुम सबको जानना चाहिए। ये घुडकी आज की नहीं बल्कि 12-15 साल पुरानी है। इसे हमारे पिता जी प्रयोग दिया करते थे। उस समय की यह घटना मुझे आज इसलिए याद आ गई क्‍योंकि आज जो घटा शायद इतना बडा मेरे सामने अब न घटे। मैंने दो माह पहले हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन किया था। मेरा साक्षात्‍कार म्रिणाल मैम ने लिया था। जब मेरा उनसे सामना हुआ तो मैं बहुत खुश हुआ क्‍योंकि जिन लाइनों का जिक्र मैंने उपर किया उसकी वजह मैम थीं। वे दूरदर्शन पर समाचार पढती थीं। मेरे चाचा की शादी में एक अप्‍ट्रान टीवी मिला था। वह टीवी बैट्री से चलती थी जिसे हम अपने गांव से पांच किलोमीटर दूर चार्ज कराने ले जाते थे। म्रिणाल पांडे मैम को मेरा पूरा गांव जानता था क्‍योंकि सब इकट्रठा होकर समाचार सुनते थे। पर आज जो हुआ उसकी उम्‍मीद किसी को नहीं थी मैम ने संस्‍थान को हमेशा के लिए छोड दिया। सैकडों लोग दुखी मन से उन्‍हें विदा कर रहे थे मैं भी उत्‍सुकता भरी नजरों से उन्‍हें देख रहा था तथा उनकी मधुर आवाज से निकल रहे विदाई संदेश को सुनता जा रहा था। मैम के साथ मुझे काम करने का अधिक मौका नहीं मिला पर वे मेरे लिए किसी आदर्श से कम नहीं थीं क्‍योंकि मैंने उन्‍हें देखकर अपना बचपन बिताया था इसलिए उन्‍हें अचानक जाते देख थोडी निराशा हुई। पर एक खुशी इस बात की थी कि चलो जिसके साथ अमर उजाला में रहकर काम सीखा था अब वे नए बिग बॉस के रूप में हमारे संस्‍थान में आ चुके हैं। पर हिंदी मीडिया की इस बडी घटना का गवाह बनना भी मेरे लिए किसी गर्व से कम नहीं था। हो सकता है कि बहुत से लोग मेरी बातों से सहमत न हों कि मैंने मैम की अच्‍छाई बताई है पर मैं अपनी जगह सही हूं क्‍योंकि मैंने मैम के साथ सिर्फ दो महीने ही काम किया इसलिए इतने कम समय में किसी को बुरा कहना उसके साथ नाइंसाफी होगी। वैसे भी हर आदमी हर किसी के लिए बुरा नहीं होता। यह सच्‍चाई है। बुरा मानोगे तो पूरी दुनिया बुरी अच्‍छा समझोगे तो हर कोई अच्‍छा। पर मैं सच में मैडम का इस बात के लिए आभारी हूं कि उन्‍होंने मुझे अपने साथ पूरे दो महीने काम करने का अवसर दिया।

शनिवार, 29 अगस्त 2009

तेज़ी के साथ बढ़ता जिम का कारोबार
































पारंपरिक योग से हास्‍य योग तक बाबा का सफर


आज घर पहुंचा तो टीवी पर मां रजत शर्मा का आपकी अदालत देख रही थीं। कार्यक्रम में बाबा रामदेव संभावना सेठ और कश्‍मीरा के साथ योग को साबित करने में जुटे हुए थे। चरित्र के पवित्रता पर वे लगातार बोले जा रहे थे। वहीं संभावना और कश्‍मीरा अपनी बातों से बाबा के धर्म को डिगाने की कोशिश कर रही थीं। बाबा की हरकतों को देखकर ऐसा लगा जैसे अब बाबा रामदेव धर्म समाज के लालू यादव बनते जा रहे हैं। अब उनको देखकर सिर्फ हंसी आती है। एक बात समझ में नहीं आती बाबा रामदेव को ऐसे कार्यक्रमों में आने में इतना मजा क्‍यों आता है? मैंने इतने पुराण और शास्‍त्रों के बारे में पढा है पर किसी भी योगी को लडकियों में इतनी दिलचस्‍पी लेते नहीं देखा। आजकल बाबा जी मीडिया में छाए हुए हैं क्‍योंकि वे लडकियों की बातें करते हैं हीरोइनों को सभ्‍यता सिखा रहे हैं। पर बाबा में तो एक बात है अकेले अपने दम पर बाबा ने बॉलीवुड की दो बडबोली अभिनेत्रियों का मुंह बंद कर दिया। पर कुल मिलाकर बाबा जी ऐसा लग रहा है कि लालू यादव की जगह पूरी करने के लिए हास्‍य योग का सहारा ले रहे हैं। कांग्रेस ने तो लालू ने किनारा कर ही लिया क्‍योंकि जनता ने उन्‍हें समर्थन नहीं दिया। इसलिए इस खाली जगह को भरने के लिए बाबा रामदेव ने बीडा उठाया और ऐसा लगता है बाबा जी ने आसानी से हठ योग से हास्‍य योग तक का सफर तय कर लिया है। पर कुछ भी हो बाबा की बातों में लोगों को मल्लिका शेरावत के कम कपडों मे लगाए गए ठुमके से अधिक आनंद आता है। क्‍योंकि बाबा जी पूरे कपडे पहनकर जो बातें करते हैं उसमें से झलकने वाली अश्‍लीलता का रस मीडिया को भी अच्‍छा लगता है जनता को भी। अब अगर बाबा बाबा हैं तो उन्‍हें संभावना और कश्‍मीरा से बहस करने की क्‍या जरूरत है। बाबा जी मैं तो आपसे कहता हूं कि अब लोगों को योगा सिखाने के बजाय सेक्‍स शिक्षा पर ध्‍यान देना शुरू कर दीजिए क्‍योंकि भारत सरकार इस पर करोडों रुपये खर्च कर देती है।

बुधवार, 26 अगस्त 2009

उन इशारों ने जीत लिया दिल

अभी कुछ दिन पहले मैं गुजरात गया। वहां पर मेरे साथ एक ऐसा वाकया हुआ जिसे मैं जिंदगी भर नहीं भूल पाउंगा। मैं दिल्‍ली पोरबंदर से जामनगर 10 बजकर 30 मिनट पर पहुंचा। जामनगर से मुझे बालाचढी जाना था। बालाचढी जामनगर से 35 किलोमीटर दूर है वहां पर मेरे भैया सैनिक स्‍कूल में शिक्षक हैं। बस के अलावा वहां तक पहुंचने के बहुत कठिन साधन हैं अगर आपके पास अपनी गाडी नहीं है तो। मैं रेलवे स्‍टेशन से सीधे जामनगर के एसटी गया जहां से मुझे बालाचढी के लिए बस मिलती। वहां जाकर मैंने बस का पता किया तो पता चला कि बस 12 बजकर 30 मिनट पर जाएगी। मेरे पास एक घंटा इंतजार करने के सिवा और कोई चारा नहीं था। मैंने लोगों की भीड में एक जगह खोज निकाली। सारी एनाउंसमेंट गुजराती में हो रही थी इसलिए मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। एक घंटे में दो दर्जन से भी अधिक बसें अपने मुसापिफरों को लेकर चली गईं इसके बावजूद मेरी बस नहीं आई। एक घंटा बीत जाने के बाद मैंने काउंटर पर जाकर पूछा भाई बस कब आएगी। उस बंदे ने बडी अभद्रता के साथ जवाब दिया कि अभी उदघोषणा होगी सुन लेना। मैंने उस बंदे को कहा भाई मुझे गुजराती नहीं आती। इस पर उसे और गुस्‍सा आ गया उसने कहा तो जाकर गुजराती सीख लो। मैंने उसे झगडा करने के बजाय गांधीगिरी करने की सोची। मैं हर पांच मिनट पर वहां जाता और सिर्फ उसे अपना थोपडा दिखाकर वापस आ जाता। लेकिन उस बंदे का दिल नहीं पसीजा। इतने मैंने सोचा कि क्‍यों न किसी और की सहायता ली जाए मैंने अपने सामने एक व्‍यक्ति को बैठा देखा। वह गठीले बदन का एक 35 चालीस साल का व्‍यक्ति था। उसके चेहरे को देखकर पता चलता था कि वह कितने आत्‍मविश्‍वास से लवरेज है। मैंने उससे कहा भैया मेरी थोडी मदद कर दो। उस बंदे को कुछ समझ नहीं आया उसने जेब से एक पेन निकाली और अपना हाथ आगे करके उस पर लिखने का इशारा किया। साथ में अपने हाथों के इशारों से बताया कि वह न तो बोल सकता है न ही सुन सकता है। उससे पेन लेते हुए मैं चौंका कि क्‍या यह हिंदी जानता है, पर मेरी इस हैरानी का समाधान दो मिनट में हो गया उससे मैंने जो लिखकर पूछा था उसने उसका जवाब लिखकर दिया। उसने जाकर इशारे से मेरे लिए यह भी पता कर लिया कि आखिर बस अब तक क्‍यों नहीं आई। बस दो घंटे लेट थी क्‍योंकि वह रास्‍ते में खराब हो गई थी और वहां से कोई दूसरी बस नहीं थी। उस दौरान उस व्‍यक्ति से मैंने साक्षात्‍कार किया और पता लगाया कि वह क्‍या करता है। इस वार्तालाप को पूरा करने के लिए मैंने अपनी रेलेवे ई टिकट का इस्‍तेमाल किया। इस दौरान उसने अपनी बीवी से मुझे मिलाया वह भी न तो बोल सकती थी न सुन सकती थी। उसके दो बच्‍चे पास में ही खेल रहे थे वे बोलना जानते थे और सुनते भी थे पर वे बोलने से अधिक इशारे से बात कर रहे थे क्‍योंकि अपने मम्‍मी पापा से सिर्फ वे इशारे से ही बात करते हैं। क्‍योंकि अभी वे छोटे थे इसलिए अपने पापा का लिखा भी नहीं समझते थे। बस इशारे से ही उनके मम्‍मी पापा उन पर अपना प्‍यार उडेलते थे डांटते थे और दुलारते थे। उसने बताया कि वह पेशे से पेंटर है थोडे दिन पहले दिल्‍ली भी होकर गया था। उसके तीन भाई हैं सब अलग अलग काम करते हैं। मम्‍मी पापा भगवान को प्‍यारे हो चुके हैं तथा उसका नाम दिनेश था। इस तरह से उससे बातें करते हुए मेरा सारा समय बीत गया और उसने मुझे कहा कि मैं उसे अपना पता दे दूं तो वह मुझे चिट्ठी लिखेगा। मैंने उसे अपना पता दिया है अगर उसकी चिटठी आई तो उसे यहां जरूर लिखूंगा। थोडी देर में मेरी बस आई उसने मेरा बैग बस तक पहुंचाया और तब तक वह और उसके बच्‍चे हाथ हिलाते रहे जब तक कि मेरी बस उनको दिखती रही। अरे अरे रुको मैं तो भूल ही गया यह बताना कि वे वहां कर क्‍या रहे थे। दिनेश् अपनी किसी रिश्‍तेदारी में जा रहा था उसकी बस और देर से आ रही थी। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जो लोग सुन नहीं पाते बोल नहीं पाते देख नहीं पाते भगवान उनको भी लोगों से कम्‍यूनिकेट करने का तरीका देता है। यह मेरे जीवन का ऐसा वाकया है जो दिल को छू गया।

रविवार, 16 अगस्त 2009

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

बूढी होती स्‍वतंत्रता के बदलते मायने

रिमझिम बरसात, बादलों भरा आसमान, खामोशी तोडते देश भक्ति से भरे गीत मुझमें इतना जोश भर रहे हैं जिसका बयान मैं अपनी लेखनी से नहीं कर सकता, इसे सिर्फ मैं महसूस कर रहा हूं। लाल किले पर पीएम का तिरंगा फहराते देखना उनका भाषण सुनना यह मेरे हर 15 अगस्‍त का रुटीन है। पर आज अचानक मुझे ऐसा लगा कि कहीं जिंदगी के गुजरते सालों की तरह हमारी स्‍वतंत्रता भी बूढी तो नहीं होती जा रही है। शहीद मूवी में मनोज कुमार का कोडे खाना, तरह-तरह की यातनाएं सहना देखकर ऐसा लगा जब ये मूवी बनी थी उस समय हमारी स्‍वतंत्रता जवान थी इसीलिए उस समय लोग इसकी कीमत समझते थे। पर समय परिवर्तन के साथ-साथ लोगों की स्‍वतंत्रता सिर्फ भाषणों और कविताओं तक ही सिमट कर रह गई है। आज भी वीर रस के कवि पाकिस्‍तान से प्रेरित होकर देश भक्ति की कविताएं स्‍टेज पर ऐसे पढते हैं जैसे वे दो मिनट में पाकिस्‍तान को अपने शब्‍दों के परमाणु बम से स्‍वाहा कर देंगे। पर ऐसी कविता पढने वाला कोई नहीं दिखा जो अपने देश के अंदर के राक्षस को मिटाने की बात करता हो। अब ज्‍यादा क्‍या कहें जिस देश की मदर टंग को ही बोलने में लोग शर्म महसूस करते हैं वे और अपने देश के हित की क्‍या बात करेंगे। हिंदी की खाने वाले उससे अपना पेट पालने वाले जब अपने ही किसी हिंदी भाई से बात करते हैं तो अंग्रेजी के प्रवाह की ऐसी गंगा बहा देते हैं जैसे हिंदी उनकी कुछ लगती ही न हो। पिछले दिनों हिंदी पर किए गए एक अध्‍ययन को पढ रहा था जिसे देखकर मैं चौंक गया कि हमारी इसी उपेक्षित भाषा से अरबों का बिजनेस पूरी दुनिया में हो रहा है। हमारे अंग्रेजी मूवी स्‍टार भी इसी भाषा की बदौलत अपनी दुकानदारी चला रहे हैं अब भले ही वे हिंदी में बात करना सार्वजनिक रूप से पसंद न करें। यह है हमारे स्‍वतंत्रता की फीकी पडती चमक का एक ज्‍वलंत उदाहरण। अब मैं दूसरे बिंदु पर आता हूं, हमारी युवा पीढी अपने बुजुर्गों का सम्‍मान करना भूलती जा रही है उसे लग रहा है कि उसे कभी बूढा ही नहीं होना है। लाखों की संख्‍या में मां बाप अपने जिंदगी के बचे दिनों को बुजुर्ग आश्रम में बिता रहे हैं क्‍योंकि उनके बच्‍चों के पास उनके लिए समय नहीं है। यह हमारी बूढी होती स्‍वतंत्रता का एक और उदाहरण है। तीसरे उदाहरण के रूप में मैं अपने अपमानित नेताओं का नाम लेना पसंद करुंगा। जिन्‍हें लोगों ने चुनकर एक ओहदा दिया और वे उसका फायदा उठाकर सारे कुकर्म कर रहे हैं। बात चाहे माया की हो या मुलायम की यह सभी प्रतिशोध लेने के लिए तैयार हैं। अपनी मूर्तियों पर नाम के लिए लोगों का पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं। राज्‍य में बिजली की हालत क्‍या है कितने लोग भूखे सो रहे हैं इससे उपर है उनका अपना स्‍वार्थ, जिसे सिद्व करने के लिए वे किसी भी हद तक गिर सकते हैं। इसे देखकर ऐसा आप महसूस कर सकते हैं कि हमारे नेताओं के लिए स्‍वतंत्रता का मतलब क्‍या है। उनके लिए स्‍वतंत्रता का मतलब लोगों का खून चूसकर पैसा जमा करना है जो उनके भी काम नहीं आता उसे भोगने से पहले वे भगवान को प्‍यारे हो जाते हैं। इस तरह से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पहले जब हमारी स्‍वतंत्रता किशोरावस्‍था में थी तो उसके मायने सबके लिए एक थे पर अब सभी के लिए स्‍वतंत्रता के मायने बदल चुके हैं। जिसमें अनुशासन का नाम कहीं भी नही दिखता।

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

हरे-भरे पेडों का कब्रगाह माया का नया पार्क

बात उन दिनों की है जब मैंने जागरण में नौकरी शुरु की थी और मुझे खोडा से निकलकर नोएडा में मेडिकल बीट देखने का अवसर मिला था। अक्‍सर इस पार्क में जाकर खाली समय अकेले बिताया करता था। यह फोटो मेरे एक सहयोगी साथी राजेश गौतम ने 2005 में नोएडा के गौतमबुद्व नगर पार्क में ली थी। यह वही पार्क है जिस पर आजकल बवाल चल रहा है क्‍योंकि मायावती ने इस पार्क का अस्तित्‍व हमेशा के लिए मिटाकर वहां पर अपनी खूबसूरत प्रतिमाओं और हाथियों के मूर्तियों का जमघट पता नहीं कितने सौ करोड रुपये खर्च करके लगवा दिया। उस समय तक यह पार्क पूरे नोएडा की जान हुआ करता था। यहां पर लोग अपने पूरे परिवार के साथ आकर मस्तियां करते थे। नोएडा टोल से सटे इस पार्क को तोडकर यहां कुछ और बनवाने का फैसला माया ने क्‍यों लिया ये तो मैं नहीं जानता पर हां इससे इतना तो जरूर कहा जा सकता है कि ऐसा करके माया ने अपनी स्‍वतंत्रता का असल उदाहरण पेश किया है कि देखो जब पावर हो तो कुछ भी किया जा सकता है। एक खूबसूरत पार्क को उजडवाकर माया ने ऐसा पाप किया है जिसके लिए न तो उन्‍हें मैं माफ करुंगा न ही नोएडा की जनता। मैं उन लकी लोगों में से हूं जिन्‍होंने इस पार्क का दीदार काफी करीब से किया था। आप सबके लिए मैं यहां अपनी कुछ फोटो डाल रहा हूं जिससे आप उस पार्क के खूबसूरती का अंदाजा लगा सकते हैं।
पार्क का फव्‍वारा जो हर शाम को रंग बिरंगे लाइट्स में चमक उठता था। दिन में भी इसकी खूबसूरती कम नहीं रहती थी।
अब भी जब मैं इस फोटो को देखता हूं तो मुझे गर्व महसूस होता है कि मैंने उस पार्क को देखा था जिसे माया ने अपने नाम के लिए शहीद कर दिया। माया की उन बेजान मूर्तियों में हरे-भरे पेडों की आह दिखती है जिसे शहीद कर दिया गया। माया के द्वारा बनाया गया पार्क भले ही कितने रुपयों से तैयार हुआ साहो पर कुल मिलाकर वह सिर्फ हरे-भरे पेडों की कब्रगाह के अलावा और कुछ नहीं।

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

पहनावे पर भारी पडती भगवान की रचना

जब भगवान ने लोगों को बनाया था उस समय उन्‍होंने वस्‍त्र के बारे में सोचा ही नहीं था। ऐसे में कहा जा सकता है कि अगर लोग भगवान की रचना हैं तो ऐसे में वस्‍त्र के रचयिता कोई और नहीं हम और आप हैं। पर इतना समझने में कि भगवान ने वस्‍त्र का निर्माण नहीं किया था हमें कई सदियां लग गईं। अब जाकर आधुनिक संसार में लोगों को इसकी महिमा समझ में आई है। मैं उदाहरण दूंगा विश्‍व में आयोजित एक बडे फैशन शो की उसमें डिजाइनर्स ने अच्‍छे-अच्‍छे परिधान डिजाइन किए थे। पर पुरस्‍कार उसको मिला जिसने महिलाओं के ऐसे अंर्तवस्‍त्र बनाए थे जिसमें से बहुत कुछ नजर आता था। उस समय मेरे दिमाग में एक ख्‍याल आया अगर वस्‍त्रों का अंबार लोगों के शरीर से यूं ही घटता गया तो वह दिन दूर नहीं जब भगवान को बेस्‍ट ड्रेस डिजाइनिंग का अवार्ड देने के लिए चुना जाएगा।
मंगलवार की सुबह जब मैं जिम पहुंचा और पार्किंग में गाडी पार्क करके आगे बढा तो एक साथ ढेर सारी भाषाओं में गीत सुनकर चौंक गया। मेरी नजर एक लडकी पर पडी जो मेरे जिम में मुझे रोज मिला करती थी पर मंगलवार को पार्किंग में दिख गई। सुबह के समय काफी लोग ऐसे जिम में आते हैं जो अपने ड्राइवर के साथ आते हैं वह सारे ड्राइवर सुबह पार्किंग में लडकियां देखकर यूं ही पास करते हैं। तो मैं मैडम की तारीफ कर रहा था मैडम को उपर से देखकर चौंक गया मेरे पैरों से जमीन खिसकते-खिसकते रह गई क्‍योंकि मैंने जब मैडम को उपर से देखा तो लगा वो जल्‍दी-जल्‍दी में नीचे अपना ट्राउजर पहनना भूल गईं। पर बाद में मैडम के कांफीडेंस को देखकर लगा ये उनका फैशन है। जिसे देखकर सारी गलियों में संगीत गूंजने लगा था हर कोई अपनी भाषा में उसके लिए गीत गा रहा था और मैडम इतराती बलखाती मल्लिका से भी कम कपडे पहनकर जिम की ओर मुस्‍कराती हुई बढती चली जा रही थीं। भाई साहब मैडम को तो लोगों ने बाहर देखा तो इतने खुश हो गए और अब आप मेरा अंदाजा लगाइए मैंने उनके साथ एक घंटा जिम के अंदर गुजारा। पर मैडम का जादू हर तरफ चल रहा था आप जानकर हंसेंगे जिन हाथों से 30 किलो के डंबल उठते थे मंगलवार को पांच किलो उठाने भी भारी पड र‍हे थे। पर कुछ भी हो ये है भगवान की असल रचना की थोडी सी झलक जो धीरे-धीरे अपनी पूर्णता की ओर बढ रही है। जिस दिन ये परदा भी हट जाएगा समझ जाइएगा लोगों को सत्‍य का ज्ञान हो गया है।

रविवार, 2 अगस्त 2009

राखी ने अगस्‍त में सबको बनाया अप्रैल फूल

क्‍या इस बार राखी को अपने सपनों का राजकुमार मिल पाएगा। क्‍या इस बार कोई राखी को धोखा देने वाला नहीं आएगा। क्‍या अब सच में राखी को अपने सपनों का राजकुमार मिलेगा। इन सभी सवालों का जवाब देने के लिए देखिए राखी का स्‍वयंबर पार्ट-2 सिर्फ एनडीटीवी इमेजिन पर। इन लाइनों को पढकर आप चौंकिए मत क्‍योंकि आने वाले चार पांच महीनों में एनडीटीवी पर राखी का स्‍वयंबर पार्ट-2 दिखाया जा सकता है। ये लाइनें उस शो के प्रोमो में राखी के शुभ मुख से सुनने को मिलेगी। राखी ने एक चैनल के साथ मिलकर करोडों भारतीय दर्शकों का उल्‍लू बनाकर यह साबित कर दिया कि देखो मुझमें कितना दम है। पर यह बात भी मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि थोडे दिन बाद अगर इसी टीवी पर राखी के स्‍वयंबर का दूसरा पार्ट दिखाया जाएगा तो वह इससे भी अधिक हिट होगा। क्‍योंकि राखी की छिछोरी हरकतें देखने वालों की दुनिया में कमी नहीं है।
पूरे एक महीने तक नौटंकी करके मैडम ने सिर्फ ने सगाई की क्‍योंकि राखी को अच्‍छी तरह से पता है सगाइयां आसानी से टूट जाया करती हैं। थोडे दिन बाद निलेश राखी को भूल जाएगा और राखी उसे राखी का रास्‍ता साफ होगा और एक स्‍वयंबर की रूपरेखा आसानी से पिफर तैयार हो जाएगी। राखी की आदतें सिर्फ स्‍वयंबर रचा सकती हैं जिससे उन्‍हें पैसा मिल जाए पर सच्‍चाई ये है कि राखी शादी कर ही नहीं सकती क्‍योंकि उन्‍हें अपने कैरियर से बहुत प्‍यार है। दूसरी बात ये है कि उनसे कोई और शादी कर ही नहीं सकता क्‍योंकि लोग लडकियों से शादी कर सकते हैं पर किसी मुसीबत से नहीं। रविवार को जब फाइनल घडी थी और राखी ने नीलेश के गले में जयमाला पहनाया उस समय दो और दूल्‍हों के चेहरे पर कोई परेशानी की लकीर नहीं थी क्‍योंकि उन्‍हें पता था कि जो हुआ अच्‍छा हुआ मुसीबत बिना परेशानी के टल गई। इस शो के एक प्रतिभागी मनमोहन ने सबसे अच्‍छा काम किया जब राखी रिषिकेश उसके घर गईं और उसके पापा ने राखी को पांच बजे ही चाय बनाने के लिए जगा दिया और उसने राखी से कह दिया कि वह उससे शादी नहीं करेगा। राखी उसकी ये बातें सुनकर भडक गईं और कहने लगीं तुम जैसे मेर पीछे पंद्रहों घूमते हैं। यह सुनकर मनमोहन बाबू प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह ही शांत था क्‍योंकि उसे पता था उसने इतने दिन टीवी पर दिखकर काफी नाम किया लिया और उसे आगे जाने की क्‍या जरूरत है। पर जो भी हो राखी को मीडिया की सुर्खी बने रहना अच्‍छी तरह आता है। वह इसके लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। राखी अपनी तुलना सीता जी से कर रही थीं पर उन्‍हें यह मालूम है कि सीता जी ने कभी किसी अभिषेक से डेटिंग नहीं की थी बस वे राम की हो गई थीं। जबकि राखी के बारे में तो सिर्फ इतना कहा जा सकता है सौ चूहे खाकर बिल्‍ली हज को चली।

सोमवार, 13 जुलाई 2009

शनिवार, 11 जुलाई 2009

सोमवार, 29 जून 2009

भूखों मर गया संगीत का शहंशाह

शोर-शराबा संगीत के बेताज बादशाह माइकल जैक्‍सन इतना लोकप्रिय अपने कैरियर के दौर में नहीं हुए जितना की अपनी मौत के बाद होते जा रहे हैं। माइकल को भूल चुके लोग तथा नई पीढी के बच्‍चे इस बात को सुनकर बेहद परेशान हैं कि संगीत का बेताज बादशाह भूखों मर गया। अमर होने की चाहत जब इंसान करने लगता है तो वह कुदरत की दी हुई जिंदगी भी पूरी नहीं जी पाता। जो भी प्रक्रति के साथ खिलवाड करता है वह कहीं का नहीं रहता। माइकल ने अपनी सफलता हासिल करते ही सबसे पहले यही काम किया। चेहरे को बंदर के आकार का बनाने के लिए प्‍लास्टिक सर्जरी का सहारा लिया। अपना सेक्‍स चेंज करवाने का प्रयत्‍न किया। जिस तरह से जिंदगी माइकल पर हावी हो रही थी वह अंधविश्‍वास से घिरता जा रहा था। पंडितों की बातों पर उसका विश्‍वास जम रहा था। तांत्रिकों की बातें उसे रास आने लगी थीं। उसे संसार अपनी मुटठी में दिख रहा था। उसे लगता था कि वह वो सबकुछ कर सकता है जो इस जगत में कोई और नहीं कर सका। पर जब माइकल की मौत हुई तो वह चिल्‍ला भी नहीं पाया बस बडे आराम से मौत की आगोश में सो गया। पर इसके बाद पूरी दूनिया में तहलका मच गया। यह होना स्‍वा‍भाविक भी था क्‍योंकि जो माइकल सैकडों साल जीने की ख्‍वाहिश रखता था वह अपनी जिंदगी की हाफ सेंचुरी ही लगाने में सफल हो पाया। अगर माइकल को दवाओं का सहारा नहीं होता तो वह कई साल पूर्व ही इस दुनिया को अलविदा कह जाता। क्‍योंकि बहुत समय पहले ही उसके पापों का घडा भर चुका था।
माइकल जैक्सन की लीक पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चलता है कि महान पॉप गायक पिछले कुछ समय से कुछ नहीं खा रहे थे और हड्डियों का ढांचा मात्र रह गए थे और जिस समय उनकी मौत हुई, उनके पेट में केवल गोलियां थीं। दी सन द्वारा प्रकाशित पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, जैक्सन गंजा हो चुका था, उसके शरीर पर खरोंच के निशान थे और उसकी पसलियां टूटी हुई थीं। जैक्सन के कूल्हों, जांघों और कंधों पर सुइयों के घाव थे, जिनके बारे में कहा गया है कि ये उन मादक दर्दनिवारक इंजेक्शनों का परिणाम रहे होंगे जो सालों से उन्हें दिन में तीन बार लगाए जाते थे। अभी भी दुनिया के कोने में मौजूद माइकल के प्रशंसक उन्‍हें महान बनाने में जुटे हुए हैं। पर सच्‍चाई में माइकल महान नहीं हैं क्‍योंकि अगर ऐसा हुआ तो महानता की परिभाषा बदल जाएगी। विवादों से गहरा नाता रखने वाला माइकल कभी भी किसी का नहीं हुआ उसने जो कुछ किया वह अपने स्‍वार्थ के लिए। अपनी अय़याशियों के लिए पैसे पानी की तरह बहाए। आज जब माइकल मरा तो वह कर्ज के बोझ तले दबा हुआ था। मैं नहीं मानता माइकल के जाने से संगीत जगत को कोई क्षति हुई है। पर इस घटना से मुझे एक बात समझ में आ गई है कि आदमी जितना बडा होता जाता है अंधविश्‍वास उसकी सबसे बडी दोस्‍त बनती जाती है जो बाद में बर्बादी का कारण बनती है। ईश्‍वर है बस यही सच है कोई भी इस जगत में ऐसा नहीं है जो तंत्र मंत्र के सहारे आपका कुछ बिगाड सकता है। अगर तुम अपने अंदर के ईश्‍वर को नहीं पहचानोगे तो जिंदगी इस बिखर जाएगी कि उसे समेटना मुश्किल हो जाएगा। सबसे बडा सत्‍य यही है कि संगीत का बेताज बादशाह भूखों मर गया। मरने के बाद उसने दुनिया में कमाया तो वह बदनामी और बडा सा कर्ज। अगर पुराणों की बातों पर भरोसा किया जाए तो जैक्‍सन को गधा बनकर यह कर्ज उतारना ही पडेगा। यह संसार है जो यहां आया है वह जाएगा।

शुक्रवार, 26 जून 2009

अमेरिका की खुली चमचागिरी है न्‍यूयॉर्क

इरफान खान के इस मूवी के डायलॉग हमेशा सही बताने में लगे रहे कि अमेरिका कितना अच्‍छा देश है। बीच-बीच संवादों को संतुलित करने के लिए उन्‍होंने यह बात भी स्‍वीकार की अमेरिका ने कई बडी गलतियां की हैं। पर इसके अलावा इस मूवी में एक बात ही समझ में आई कि इस मूवी का निर्माण आदित्‍य ने सिर्फ यह बताने के लिए किया कि अमेरिका में वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद 12 सौ मुसलमानों पर एफबीआई ने जुर्म ढाए थे जिन पर सभी आरोप बाद में खारिज हो गए थे। यह ऐसी बात है जिसे इंटरनेट के माध्‍यम से हर कोई जानता है पर मूवी समाप्‍त होने पर यह संदेश दिखता है। इस मूवी में कहीं रोमांच दिखता हो यह याद नहीं आता क्‍योंकि सभी को पता था कि न्‍यूयॉर्क की एफबीआई बिल्डिंग को जान अब्राहम नहीं उडाएंगें। पर मुझे इस बात पर काफी गुस्‍सा आया कि जब जान यानी की समीर को गोली लगी तो निर्देशक कबीर खान साथ में कटरीना यानी की माया को क्‍यूं मरवा दिया। वो जिंदा रहती तो कम से कम दर्शक यह तो कह पाते चलो अच्‍छा हुआ नील नितिन मुकेश को उसका प्‍यार वापस मिल गया भले ही वह एक बच्‍चे के साथ मिला। पर मूवी के अंत में नील को ढेर सारे संघर्षों के बाद अपनी प्रेमिका का बच्‍चा मिलता है। इस मूवी को जिस वर्ग को ध्‍यान में रखकर बनाया गया है वह पढा लिखा तपका है इसलिए अंग्रेजी के संवादों की कमी नहीं है। हिंदी जानने वालों के लिए ट्रिकर का प्रयोग किया गया है पर वह उतना प्रभावशाली नहीं है। जान ने अपनी भूमिका को सजीव बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोडी है। नील और कटरीना की भूमिका औसत है। न्‍यूयार्क का कोई ऐसा संवाद नहीं जिस पर हंसी आती हो पर कहीं-कहीं हास्‍य के पुट डालने की कोशिश जरूर लगती है। उदाहरण के लिए जब इरफान नील को कुछ माइक्रोफोन देता है और नील उसे पटक देता है इस पर इरफान कहता है कि तुम इसे पटके बिना भी अपनी बात कह सकते थे। अगर संगीत की बात की जाए तो जुबान पर कोई गाना याद नहीं आता। जिस हाल में मैंने यह मूवी देखी वहां के दर्शक कलाकारों से अधिक प्रतिभाशाली थे। एक द्रष्‍य में जब इरफान को यह बताता है कि माया यानी की कटरीना की शादी हो गई है और उसके एक तीन साल का बच्‍चा भी है। इस पर दर्शकों की प्रतिक्रिया थी, साला मामू बन गया। अब मजे कर। कुल मिलाकर इस मूवी में ऐसा कुछ नहीं है जिसे दर्शक पसंद करें। अगर अमेरिका की बहादुरी देखनी है उसकी तारीफ सुननी है तो जरूर इस मूवी को देखें।

सोमवार, 22 जून 2009

गलत जवाब पर भी मिली नौकरी

15 नवंबर 2006 को दोपहर 1 बजे का समय था। मैंने एक तय अप्‍वांटमेंट के तहत अमर उजाला के संपादक शशि शेखर जी के दफतर में दस्‍तक दी। फार्मल परिचय के बाद सर ने पूछा जयशंकर प्रसाद ने कितने महाकाव्‍य लिखे थे ? मैंने जवाब दिया आठ महाकाव्‍य। इतना सुनते ही चेहरे का गंभीर भाव बनाते हुए सर ने कहा सामने वाले को तुम मूर्ख समझते हो। अगर तुमसे कोई सवाल कर रहा है इसका मतलब उसको जवाब जरूर पता होगा। अगर तुम ऐसे सवालों पर तुक्‍का लगाते हुए इसका मतलब हुआ कि तुम सामने वाले को मूर्ख समझते हो। जवाब न आना दूसरी बात है पर झूठ बोलना सबसे बुरी बात है अगर तुम्‍हें किसी सवाल का जवाब नहीं पता तो साफ मना कर सकते हो। वैसे भी नौकरी मिलने का मतलब ये नहीं होता कि आप पढना छोड दें। पुरानी चीजें दोहराने में कोई बुराई नहीं है। चलो कोई बात नहीं तुम्‍हें जब नौकरी ज्‍वाइन करनी होगी शंभूनाथ जी को बता देना वे तुम्‍हें तुम्‍हारा काम समझा देंगे। ये मेरा अमर उजाला का अनोखा साक्षात्‍कार है जिसमें मैंने किसी ऐसे व्‍यक्ति से मुलाकात की जिसे मैंने कई आदर्श पात्रों के रूप में किताबों में पढा था। इस घटना ने मुझे एक ऐसी सीख दी जिसे आजतक मैंने याद रखा है। मैंने पहली बार इंटरव्‍यू दिया और उसमें सवाल का गलत जवाब दिया और मुझे उस दिन परमानेंट नौकरी मिल गई।यहां पर मैं जागरण से आया था। जागरण में मैं पूरे ढाई साल रहा। वहां स्टिंगर था पर खुश था क्‍योंकि बहुत सारी बाईलाइन छपती थी।
अचानक वहां पर एक ऐसी घटना घटी जिसमें मेरे बास का ट्रांसफर हो गया। एक दूसरे बॉस का आगमन हुआ जो शक्‍ल से भले मालूम होते थे। पर नोएडा में ज्‍वाइन करते ही अपने असली रंग में आ गए। शराब से महोदय का गहरा नाता था। कार्यालय में उनके साथ काम करने वालों के लिए एक नया फार्मूला बनाया गया जिसमें हर सप्‍ताह एक बंदे को शराब का इंतजाम करना था। मुझे इससे परेशानी नहीं थी कि कोई शराब पीता है क्‍योंकि यह किसी की स्‍वतंत्रता हो सकती है। पर उनके इस नए प्रावधान का मैं जबरन शिकार होने लगा। मैं दारू नहीं पीता पर उनकी पार्टी में मुझे जबरदस्‍ती शिरकत करना था। मैंने इसका विरोध किया तो मेरी बीट चली गई। एक दिन महोदय ने मुझसे माफीनामा लिखने को कहा और मेरा धैर्य जवाब दे गया और मेरे मुंह से ऐसी बातें निकल गईं जिसे एक कार्यालय के लिए अच्‍छा नहीं समझा जाता। मैंने उनसे लडाई करके नौकरी छोड दी। उस शराबी ब्‍यूरो चीफ को अपना सबसे बडा दुश्‍मन समझने लगा। पर जब मुझे अमर उजाला में नौकरी मिली तो मुझे ऐसा लगा बुरा आदमी भी अगर कुछ करता है तो उससे भी आपका भला हो सकता है। आज मैं जिस मुकाम पर हूं इसमें एक शराबी का भी हाथ है मैं उस व्‍यक्ति को मिलकर धन्‍यवाद तो कहने नहीं जाउंगा पर हां उसके लिए मेरे दिल से कोटि-कोटि थैंक्‍स निकल रहा है।
मेरे कैरियर को अमर उजाला ने जो दिशा दी उसे मैं जिंदगी भर नहीं भूलूंगा क्‍योंकि यह ऐसा हिंदी संस्‍थान है जहां पर सच में काम करने का कारपोरेट माहौल है। अच्‍छा काम करो तो उसका फल जरूर मिलेगा। बास के पांव छूने की परंपरा नहीं है किसी को कोई समस्‍या हो तो वह सीधे शशि जी से संपर्क कर सकता है। जहां तक मैं जानता हूं संस्‍थान के 80 फीसदी लोग जब कुछ कहना होता है तो सीधे संपादक जी को मेल करते हैं। जून में सबका प्रमोशन हुआ तो मैंने सोचा मेरा पिफर कुछ नहीं हुआ। 8 को मैं अयोध्‍या से लौटा तो मेरी सेलरी का संदेश मेरे मोबाइल पर आया। सेलरी देखकर मैं चौंक गया और सीधे अपने बास के कमरे में गया। मैंने उनसे कहा सर गजब हो गया देखिए न मेरी सेलरी इस बार कितनी ज्‍यादा आई है। सर ने मुस्‍कराते हुए कहा अच्‍छा एक काम करो जितना ज्‍यादा आई है उसे मुझे दे दो। इतना कहकर वे हंसने लगे और बोले तुम्‍हारा प्रमोशन हो गया है साथ में इंक्रीमेंट भी मिला है। पर इसके साथ ही सर ने यह शर्त रख दी कि देखो तुम इसे किसी को बताना मत।
मैं सीनियर सब एडिटर/सीनियर रिपोर्टर बन गया और ये बात किसी को न बताउं ये मेरे लिए बहुत बडी बात थी। मैंने इस बात को कुछ वि‍श्‍वसनीय लोगों से शेयर किया। पर संस्‍थान में और किसी को पता नहीं चला। पर मैं इस बात को शब्‍दों में बयां नहीं कर सकता कि इस प्रमोशन ने मुझे कितनी खुशी दी। पर इस खुशी को सेलीब्रेट करने का मौका मुझे अधिक नहीं मिला। दूसरे दिन मुझे हिंदुस्‍तान से फोन आ गया जिसके लिए मैं कई महीनों से इंतजार कर रहा था। पर हिंदुस्‍तान को ज्‍वाइन करने से पहले मेरे साथ दो ऐसी घटनाएं घटीं जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता। पहली बार जब हिंदुस्‍तान में मैं टेस्‍ट देकर लौट रहा था तो फोन पर बात करते हुए यातायात पुलिस ने मुझे पकड लिया। पर पत्रकार होने के नाते उन्‍होंने रेड लाइट तोडने का 100 रुपये का जुर्माना लगाकर छोड दिया। इसके कुछ महीने बाद जब एचटी से फाइनल काल आई तो मैं भजनपुरा के तरफ से हिंदुस्‍तान की ओर जा रहा था गाडी की स्‍पीड 80 से भी अधिक थी। पता नहीं किन ख्‍यालों में खोया हुआ था वहां पहले से तैनात पुलिस की स्‍पीड चेक करने वाली वैन में मैं रिकार्ड हो गया। आगे ट्रैफिक पुलिस से मेरा सामना हुआ। उन्‍होंने मेरी गलती बताते हुए अपनी चालान काटने की किताब निकाली। मैंने बिना कोई प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त किए हुए अपनी गलती का खामियाजा भुगता और चालान के रूप में एक हजार रुपये भरे।
मुझे हिंदुस्‍तान से 20 को आफर लेटर मिला। मैंने 30 जून 2009 को ज्‍वाइनिंग डेट तय की और इसकी सूचना अपने सर को दे दी। मैंने नोटिस दिया पर मुझे तुरंत कार्यमुक्‍त कर दिया गया। 21 तारीख को मैं आखिरी बार अपने प्‍यारे संस्‍थान अमर उजाला में गया। वहां से जब मैं निकला तो ऐसा लगा जैसे मैं कुछ ऐसा छोड रहा हूं जिसकी कमी मुझे जरूर खलेगी। नौकरी छोड दी यहां के अच्‍छे लोगों का साथ छूट गया। दूसरे दिन घर में बैठा हुआ ऐसा लग रहा था जैसे मैंने कुछ खो दिया है। पर एक नए चैलेंज को स्‍वीकार करते हुए मैंने यह कठोर फैसला लिया। मैंने अपने कैरियर को संवारने के लिए यह कदम उठाया। बहुत से लोगों ने मेरे इस कदम की खुलकर सराहना की। अमर उजाला में मेरा बुरा चाहने वाला या सोचने वाला कोई भी शख्‍श नहीं था। इस संस्‍थान ने मुझे सौरव, गौरव और महेश जैसे दोस्‍त दिए। ये ऐसे लोग हैं जो हमेशा मेरे साथ खडे रहते हैं। मैं बहुत नया हूं नौकरियां बदलने का मेरा कोई शौक नहीं रहा है पर अब तक जहां तक मैंने काम किया उसमें अमर उजाला को अव्‍वल पाया हर मामले में। चाहे कोई कारपोरेट कल्‍चर की बात करे या कर्मचारियों के हितों की। पर अब मैं एक ऐसी जगह पहुंच गया हूं जहां पर आने का सपना मैं कई सालों से देख रहा था। हिंदुस्‍तान के लिए मैंने बहुत सारी फ्रीलांसिंग की है। पर अब यहां की एडीटोरियल टीम का हिस्‍सा बनकर खुश हूं।

बुधवार, 17 जून 2009

दो पवित्र आत्‍माओं का ठरक्‍कपन है आधुनिक बलात्‍कार

एकदिन मैं एक घर में बैठा हुआ था। जिसके यहां पर मैं गया हुआ था उनके यहां एक पांच साल का बच्‍चा था। एक खिलौने के लिए वह बुरी तरह से नाराज हो गया हाथ पैर चलाने लगा उसके पिता उसे बहलाने की कोशिश कर रहे थे पर वे उसे उठा भी नहीं पा रहे रहे थे। उसके पैर की चोट से उसके पिता जी के नाक से खून निकलने लगा। इस घटना से मुझे एक बात पर संदेह हुआ कि जब एक पांच साल का बच्‍चा कोई अकेला आदमी संभाल नहीं सकता तो ऐसे में पांच फुट से भी लंबी लडकियों का एक आदमी भला कैसे बलात्‍कार कर लेता है। आजकल अभिनेता शाइनी आहूजा बलात्‍कार के केश में फंसे हुए हैं। पर यह केस अगर सही से देखा जाए तो इससे सिर्फ शाइनी की चरित्रहीनता ही साबित हो सकती है न कि उन्‍हें बलात्‍कारी करार दिया जाएगा।
एक लडकी ही सहमति के बिना उसके साथ सिर्फ एक व्‍यक्ति जबरदस्‍ती नहीं कर सकता। बलात्‍कार पांच लोग मिलकर या पिफर दो लोग करें तो यह बात हजम होती है। आजकल पुरुषों से कंधा मिलाने के चक्‍कर में लडकियां पहले सहमति से किसी के साथ संबंध बनाती हैं पर उसमें डबल मजा करने के लिए लडकी होने का फायदा उठाकर उस व्‍यक्ति को फंसा देती हैं। अब चाहे मोनिका लिंविस्‍की या पिफर शाइनी की नौकरानी की ही क्‍यों न हो। अगर प्‍यार की बात की जाए तो इसे दो आत्‍माओं का मिलन कहा जाता है लेकिन अगर इसे इस केस में डिफाइन किया जाए तो इसे दो आत्‍माओं का ठरक्‍पन कहा जाएगा। जिसमें लडकियों की पवित्र आत्‍माएं पुरुषों की ठरक्‍कपन भावनाओं की बलि चढा देती हैं। यह सब नाम रोशन करने और पैसा कमाने का रोचक जरिया है जिसमें गंभीर दिलचस्‍पी लेकर हमारे मीडिया और कानून वाले इसे लोगों के सामने आदर्श के रूप में प्रस्‍तुत कर रहे हैं जिससे और लडकियां बलात्‍कार का नाम लेकर कुछ धन अर्जित कर सकें। जब भी कोई मुझे कहेगा कि एक आदमी ने बलात्‍कार किया मैं उसे कतई नहीं मानूंगा क्‍योंकि एक आदमी द्वारा किया गया बलात्‍कार दो आत्‍माओं का पवित्र ठरक्‍कपन है। इसमें इससे ज्‍यादा और कुछ नहीं है। बलात्‍कार उस समय होता है जब किसी अबोध मासूम बच्‍ची को कोई दरिंदा हवस का शिकार बनाता है या पिफर एक से अधिक लोग मिलकर किसी अबला की इज्‍जत लूटते हैं।

सोमवार, 25 मई 2009

हिम्‍मत है तो आस्ट्रिया में जाकर आग लगाओ

अमेरिका में एक हिंदू की हत्‍या कर दी गई, आस्‍ट्रेलिया में सिखों पर कहर बरपाया, आस्ट्रिया में झडप में एक सिख गुरू की मौत। इस खबर को सुनते ही हमारे प्‍यारे देशवासी अपने घरों से निकले ट्रेनें फूंक दीं। पटरियां उखाड दीं। कारों में आग लगा दिया। पुलिस की गाडियों को फूंक दिया। रास्‍ते जाम कर दिए। जितना हो सका अपने देश की प्रापर्टी को फूंक दिया जिससे बाहर देश के लोगों को पता चले कि अगर तुम हमारे आदमियों पर बुरी नजर डालोगे तो हम अपने देश को ऐसे ही बर्बाद करेंगे। आज सुबह पंजाब में जिस तरह से लोगों ने अपने देश की प्रापर्टी को नुकसान पहुंचाया इससे क्‍या उन सिख गुरू को न्याय मिल पाया जो इस घटना का शिकार हुए थे। अगर किसी में दम है तो यह काम जो आज भारत माता को जलाकर किया जा रहा है यही आस्ट्रिया में होना चाहिए था। पर वहां की खुंदक अपने देश पर उतारकर सिर्फ एक मूर्खता की मिशाल पेश कर रहे हैं हमारे देशवासी। बसें जल जाएंगी तो कल से लोगों को चलने में दिक्‍कत होगी। ट्रेनें नहीं रहेंगी तो यात्रा कैसे करोगे। शहर फूंक दोगे तो उसे व्‍यवस्थित कौन करवाएगा। आज आप जोश में आकर अपने देश को उजाड रहे हो कल जब पानी की कमी होगी, परिवहन के साधन नहीं होंगे, सडकें तालाब का रूप ले लेंगी। तो एक बार आप के दिल में सरकार के प्रति रोष पनपेगा और आप इसे सरकार के उपर थोपकर पिफर अपने ही देश को तोडोगे। मुझे लगता है अगर धर्म के नाम पर लोग सरकारी प्रापर्टी जो कि हमारी ही है उसको नुकसान पहुंचाना बंद कर दें तो हमें बहुत सी समस्‍याओं से निजात मिल जाएगी। आज जिस घटना पर पंजाब जल रहा है उसमें पंजाब का कोई दोष नहीं है दोषी तो वे हैं जो यह क्रत्‍य कर रहे हैं। इससे उन पवित्र संत रामानंद जी की आत्‍मा को भी ठेस लगेगी। क्‍योंकि कोई भी संत उग्रवाद का पाठ नहीं पढाता। भाई जब पंजाब की इसमें कोई गलती नहीं तो उसे बर्बाद क्‍यों कर रहे हो? अगर कुछ करना ही तो चलो आष्‍ट्रिया चलते हैं और उसका अस्तित्‍व मिटाते हैं क्‍योंकि वहां हमारे संत पर हमला हुआ है। पर किसी को भारत माता को नुकसान पहुंचाने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसा कोई भी दुनिया का मुल्‍क नहीं करता। अरे हम पर दुनिया हंस रही होगी और हमें पागल कह रही होगी कि देखो घटना कहीं घटी और आग कहीं और लग रही है। भाई अपने आप को संभालो और अपना देश बचा लो।
जय हिंद जय भारत

मंगलवार, 19 मई 2009

समर्थन ले लो समर्थन ले लो, बिना शर्त समर्थन ले लो

समर्थन ले लो समर्थन ले लो। फ्री में समर्थन ले लो। कैबिनेट में जगह भी मत दो मुझे मंत्री भी मत बनाओ पर समर्थन ले लो समर्थन लो। आजकल देश में समर्थन कुछ इस अंदाज में बिक रहा है जैसा कि उस सब्‍जीमंडी में सब्‍जी धेले के भाव बिकने लगती है जहां बरसात शुरू हो जाती है। यूपीए से कई दलों ने चुनाव पूर्व गठबंधन इसलिए नहीं किया क्‍योंकि उन्‍हें लगता था कि कांग्रेस सत्‍ता से बाहर होने जा रही है। पर सबको इसके उलट परिणाम मिला। कांग्रेस इतनी मजबूती के साथ लोगों के बीच आई कि उसे किसी से समर्थन मांगने की जरूरत ही नहीं है। अब ऐसे में कई छोटी पार्टियों को पांच साल बाहर रहने के सिवा और कोई चारा नहीं रह जाता। खासकरके लालू और मुलायम के लिए यह बनवास जैसा है क्‍योंकि उनकी सरकार प्रदेश में भी नहीं है। अब यह बनवास पांच साल तक विपक्ष में बैठकर काटना इन पार्टियों को गंवारा नहीं है। लालू यादव अब अपनी गलती स्‍वीकार रहे हैं और कह रहे हैं कि भाई याद करो मैंने पिछली यूपीए सरकार में कितनी अहम भूमिका निभाई ऐसे में कुछ तो आप हमारी इज्‍जत करो। ये वही लालू हैं जिन्‍होंने मुलायम और पासवान के साथ एक मंच पर खडे होकर कहा था कि कांग्रेस बाबरी मस्जिद तोडवाने की जिम्‍मेदार थी। इतने सालों की राजनी‍ति में पहली मर्तवा लालू के साथ ऐसा हो रहा है कि उन्‍हें कोई नहीं पूछ रहा है अब वे ही लालायित होकर कांग्रेस की तरफ आस भरी नजरों से देख रहे हैं। इन पार्टियों को छोडो जिन्‍होंने एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लडा था अब वे भी कांग्रेस में जाना चाहती हैं रालोद के सामने तो कांग्रेस ने विलय जैसी बडी शर्त रख दी है इसके बावजूद अभी भी अजीत कह रहे हैं कि समर्थन ले लो बिना शर्त समर्थन देने को हम तैयार हैं। वहीं दूसरी ओर मायावती ने भी अपना समर्थन केंद्र सरकार को देने का ऐलान कर दिया है। यह स्थिति देखकर हंसी आती है और उन नेताओं पर दया जो अपने लाभ के लिए चंद महीने पहले कांग्रेस का साथ छोड गए थे। आज सरकार बनाने जा रही कांग्रेस को इन सबकी जरूरत नहीं है बल्कि इन सबको कांग्रेस की जरूरत है। इसीलिए हर कोई आज कांग्रेस के नगर में जोर-जोर से आवाज लगाकर कह रहे हैं कि समर्थन ले लो, बिना शर्त समर्थन ले लो, हमें कुछ नहीं चाहिए बस हम आपकी पार्टी का साथ देना चाहते हैं। ऐसी मार कभी जनता ने नेताओं को नहीं दिया जैसा इस बार दिया है। जिसके चलते अब इन नेताओं को फेरी वाले की तरह आवाज लगाकर समर्थन बेंच रहे हैं।

शनिवार, 16 मई 2009

2009 की दो शामें भुलाए न भूलेंगी

15 मई तक आए एग्जिट पोल से परेशान बडी पार्टी के नेताओं ने छोटे दलों के नेताओं को पटाने के लिए दूर-दूर तक जाल बिखेरा। एनडीए ने माया से लेकर जयललिता तक से बात कर ली तो वहीं दूसरी ओर यूपीए ने लालू मुलायम और पासवान जैसे लोगों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की। इस जद्दोजहद में एक शाम गुजर गई और वह दूसरी सुबह आ गई जिसका सबको बेसब्री से इंतजार था। पर यह सुबह कुछ ऐसी घटी जिसमें यूपीए सबको भूल गया तो छोटी पार्टियों की जमानत जब्‍त हो गई। तीसरा मोर्चा चौथा मोर्चा और पांचवें मोर्चे जैसे कुकुरमुत्‍ते की तरह उगे इन मोर्चों की मिट्टी पलीत हो गई। एनडीए के पीएम इन वेटिंग आडवाणी का दिल इस कदर टूटा की उन्‍होंने राजनीति से संन्‍यास लेने का ही मन बना लिया। पर इस चुनाव में सबसे दिलचस्‍प कहानी बिहार में घटी। लालू यादव जो कि पूरी दुनिया में अपने हिलेरियस अदा के लिए जाने जाते हैं। को बिहार ने ऐसे नकारा कि महोदय अपनी भी एक सीट से हार गए। उनकी पार्टी के पास सिर्फ दो सीटें बचीं। अब कांग्रेस उनको पिफर से रेल मंत्री बनाएगी या नहीं यह कांग्रेस की दया पर निर्भर करता है। क्‍योंकि अब तो लालू के हाथ में कुछ नहीं रहा। लालू यादव ने रामविलास पासवान के साथ कुछ इस कहावत को चरितार्थ किया, हम तो डूबेंगे ही सनम तुम्‍हें भी ले डूबेंगे। पिछले साल पासवान के पास चार सांसदों की फौज थी पर इस बार तो पासवान जी ही संसद से आउट हो गए हैं उनकी पार्टी के पास सिर्फ अब पार्टी का नाम बचा है कोई सीट नहीं। महोदय अपनी भी सीट नहीं बचा सके। ये भी दो गुजरीं शामें जिनका जिक्र हमेशा इतिहास में किया जाएगा कि किस कदर जनता ने बामपंथियों के मुंह पर तमाचा मारकर एक पार्टी को जनाधार दे दिया। इस चुनाव की सबसे बडी खासियल बाहुबलियों का हारना रहा। डीपी यादव और अंसारी जैसे लोगों के मुंह पर जनता ने ऐसा तमाचा जडा है जिसकी चोट इन्‍हें कई जन्‍म तक नहीं भूलेगी। ये था जनता का फैसला जिसने कई बडबोलों के मुंह पर ताला लगा दिया है। अब तो मुझे लगता है कि लालू यादव जी किसी हास्‍य धारावाहिक में बैठकर चुटकुलों को जज करेंगे और पैसे कमाएंगे जैसा कि शेखर सुमन और सिद्धू अब तक करते आए हैं। पर बुरा ही क्‍या है राजनीति में अगर जनता ने इनके साथ ही यही व्‍यवहार जारी रखा है तो कुछ न कुछ तो करना ही पडेगा ना।

शनिवार, 9 मई 2009

आखिर ओवर स्‍पीडिंग क्‍यों करते हैं लोग

आज सुबह मुझे अपने दोस्‍त सौरव के यहां जाना था। वह दिल्‍ली के ज्‍वालानगर में रहता है। सुबह जल्‍दी जाकर जिम करके आया और तैयार हो गया। बाइक उठाकर सुबह साढे आठ बजे हौजखास से निकला। रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा भीड नहीं थी आधे घंटे में मैं आईटीओ पुल क्रास करके लक्ष्‍मी नगर के मोड पर पहुंचा जहां पर कुछ निर्माण कार्य की वजह से रास्‍ता परिवर्तित किया गया है। इसके चलते एक खतरनाक मोड लक्ष्‍मीनगर में प्रवेश से पहले बन गया है। मेरे सामने से एक पल्‍सर बाइक पर सवार दो युवक तेजी के साथ मोड पर आए जिनकी स्‍पीड 90 से भी उपर रही होगी सडक के साथ डिवाइडर पर टकरा गए। उसमें से एक व्‍यक्ति की मौके पर ही मौत हो गई जबकि दूसरे युवक को पुलिस हास्पिटल ले गई उसकी हालत बहुत ही नाजुक थी। यह दर्दनाक हादसा सुबह-सुबह देखकर दिल द्रवित हो उठा। उन दोनों युवकों ने हेलमेट नहीं पहना था मुझे ऐसा लगा अगर आज इन भाइयों ने हेलमेट पहना होता तो शायद इनकी जिंदगी बच जाती। इतना कुछ नियम बनने के बाद भी लोग पता नहीं क्‍यों ओवर स्‍पीडिंग करके अपनी मौत को दावत दे रहे हैं यह बात समझ से बाहर है। आखिरकार अपने लिए न सही अपने परिवार के लिए तो ऐसा नहीं करना चाहिए। भले ही इस घटना के कुछ घंटे बाद सबकुछ सामान्‍य हो गया उस रोड पर यातायात गुलजार हो गया पर जिस घर का चिराग भरी जवानी में बुझ गया उस पर क्‍या गुजरी होगी यह सोचने वाली बात है। आजकल हम लोगों को हर तरह से जागरूक बनाने की बात करते हैं ऐसे मैं लोगों से एक और बात के लिए गुजारिश करना चाहूंगा कि ओवरस्‍पी‍डिंग कभी भी किसी के लिए अच्‍छी नहीं होती अपने अमूल्‍य जीवन के लिए ऐसा मत कीजिए। मैं पूरे देश को इस माध्‍यम से यह जागरूकता फैलाना चाहता हूं अगर इस बात को सिर्फ एक ही युवा मान ले तो मेरा प्रयास सार्थक हो जाएगा। आखिरकार जिंदगी के इस सुहाने सफर को हादसे का सफर बनाने का हमारा क्‍या अधिकार है। आइए प्रण करें हम अपने जीवन को अमूल्‍य समझेंगे और ओवर स्‍पीडिंग से हमेशा बचेंगे। इसके साथ ही मैं इस घटना के शिकार हुए युवकों के परिवार के प्रति संवेदना व्‍यक्‍त करते हुए यही गुजारिश करुंगा कि इस मुश्किल घडी में भगवान उनको धैर्य दे।

गुरुवार, 7 मई 2009

इसलिए लोग बन जाते हैं पप्‍पू

रात में सोते समय मैंने अपना मतदाता पहचान पत्र निकालकर बाहर रख दिया क्‍योंकि मुझे ब्रहस्‍पतिवार की सुबह वोट देने जाना था। सुबह होते ही बडे उत्‍साह के साथ पोलिंग बूथ पर पहुंचा पर उन लोगों ने मुझे निराश कर दिया। क्‍योंकि ऐन वक्‍त पर भाइयों ने बूथ ही बदल दिया एमसीडी स्‍कूल के बजाय पोंलिंग बूथ लक्ष्‍मण पब्लिक स्‍कूल में भेजा। बहुत से लोगों को जिसे पहले एमसीडी स्‍कूल वाला पता बताया गया था सब वहीं पहुंचे जिसके बाद सबको लक्ष्‍मण पब्लिक स्‍कूल भेजा गया। बहुत से लोग तो नाराज होकर पप्‍पू बन गए और फैसला कर लिया कि वोट नहीं करेंगे। यहां की दुर्व्‍यवस्‍था देखकर मुझे लगा कि बहुत सारे पोलिंग स्‍टेशनों पर सरकार के तरफ से बरती जाने वाली इन अनियमितताओं के चलते बहुत से लोग वोट नहीं करते। यहां पर मुझे लगा कि पप्‍पू वाले विज्ञापनों के साथ-साथ सरकार को इन चीजों पर भी विशेष ध्‍यान देना चाहिए। जिससे बहुत से लोगों को वोट करने में सहूलियत मिल सके। पर एक बात इस बार मुझे बहुत अच्‍छी लगी मैंने वोटिंग करते हुए बहुत से ऐसे लोगों को देखा जो कि वोटिंग प्रणाली में इसके पहले भरोसा नहीं करते। एक एलीट क्‍लास वोट करने के लिए निकली। मेरे एक दोस्‍त का फोन आया मैंने उससे पूछा भाई कहां उसका जवाब मिला वोट करने के लिए लाइन में लगा हूं एक घंटे में फ्री हो जाएगा। मेरे इस दोस्‍त को इस बात की खुशी थी कि वह पहली बार वोट कर रहा है। इससे पता चलता है कि लोग अब पप्‍पू बनने से कितना दूर रहना चाहते हैं। वैसे पप्‍पू कहलाने से तो अच्‍छा ही है कि हम अपने मता‍धिकार का प्रयोग कर दिया करें। आखिर ये देश तो हमारा ही है घटिया लोग यहां आएंगे तो इससे देश का बंटाधार हो जाएगा। हम अपने अधिकार का प्रयोग करते रहे तो एकदिन जिन नेताओं का हम सपना देखते हैं वैसे नेताओं का निर्माण शुरू हो जाएगा। अभी तो यह शुरुआत है जिसमें सभी को अपना योगदान देने की जरूरत है। अंत में यही कह सकता हूं कि पप्‍पू वोट कर सकता है।