
बुधवार, 17 फ़रवरी 2010
बुधवार, 3 फ़रवरी 2010
और यूं बीत गया महाकुंभ
लंबी-लंबी लाइनें, हर ओर चल रहे डांस फरफार्मेंसेस, कहीं बाइक पर स्टंट दिखाते कलाकार तो किसी ओर फिल्मी कलाकारों को देखने के लिए पागल होती भीड़। अरे भाई ये सब कहीं हो नहीं रहा है बल्कि बीत चुका है। मैं ऐसे महाकुंभ की बात कर रहा हूं जो 1986 से देश में छोटे पैमाने पर लगना शुरू हुआ था पर अब वह बिकराल रूप ले चुका है। चलो हो गया अब गैस मत करो मैं खुद बता देता हूं। ये महाकुंभ था ऑटो एक्सपो का, जो दिल्ली के प्रगति मैदान में 5 जनवरी से 11 जनवरी तक चला।
शो तो था गाड़ियों का पर लड़कियों को यहां पर गाड़ियों से अधिक खूबसूरत बनाकर पेश किया गया। पूरे बीस लाख लोग जिस शो को देखने आए और कहा गया कि यह दुनिया का सबसे बड़ा ऑटो शो साबित हुआ। पर सच में इस शो में गाड़ियों से अधिक लोगों ने उन मॉडलों के किए जो बॉडी शूट में गाड़ियों की खूबसूरती फीका करने का सफल प्रयास कर रही थीं।
10 जनवरी को इस ऑटो शो में दिल्ली पुलिस की धमाकेदार एंट्री हुई परिणामस्वरूप पुलिसवालों ने इस ऑटो शो के कल्चरल शो को बंद करवा दिया। कारण ये था कि कम कपड़े में लड़कियों को नाचता देख जनता बेकाबू हो गई। शो बंद होते ही कंपनी वालों के साथ-साथ आयोजकों की भौहें भी तनीं पर सुरक्षा के लिहाज से इस शो में पुलिस का शो सबसे शानदार रहा। न आयोजकों की चली न कंपनी की विजिटर निराश थे क्योंकि उनकी मेहनत की कमाई पुलिसिया सख्ती की भेंट चढ़ गई।
अरे सबसे अच्छी बात तो तब हुई जब 9 बार के मोटरसाइकिल रेस चैंपियन वोलेंटोनी रॉसी जो कि यमाहा के ब्रांड अंबेस्डर हैं उनको कंपनी ने पहली बार भारत बुलाया। उनका स्वागत दिल्ली के थकाते ट्रैफिक में हुआ, बेचारे किसी तरह से प्रगति मैदान पहुंचे तो वहां पर पहुंचते ही जैसे लोगों को परिचय मिला बस क्या था यमाहा के पवेलियन में ऐसा धमाका हुआ जिससे इस चैंपियन के होश उड़ गए और महोदय किसी तरह से कुछ बाउंसर की मदद से बाहर आने में सफल रहे। पर यमाहा ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और आनन फानन में जॉन और रॉसी की प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करवाई। मुझे भी रॉसी से दो चार बातें करने का मौका मिला। पर जो रॉसी ने कहा उसे सुनकर आपका दिल भी पसीज जाएगा। रॉसी का कहना था कि यहां पर सिर्फ बाइक से ही चला जा सकता है क्योंकि दिल्ली में तो कारें रेंगती हैं। ये रॉसी का दर्द था जिसे उन्होंने बिना रेस भरे कम शब्दों में कह दिया।
युवाओं की नगरी में बड़ी गाड़ियों के उन शौकीनों का ख्वाब पूरा हुआ जो सिर्फ ऑडी, बीएमडब्लू या फिर अन्य महंगी कारें देखना चाहते थे। पर कुछ का ख्वाब टूटा भी क्योंकि वे दो साल में एक बार आने वाले इस महाकुंभ के दरवाजे पर दस्तक देने तो पहुंचे, पर अंदर जाने के लिए न उन्हें टिकट मिला न ही किसी पास का इंतजाम हो सका। देखते-देखते शो खत्म हुआ यातायात बहाल हुआ, बहुत से लोगों ने दुआ मांगी की भगवान गाड़ियां सिर्फ शो में ही सिमट जाएं तो अच्छा होता क्योंकि अगर ये सड़क पर आईं तो इन सड़कों का क्या होगा।
शो तो था गाड़ियों का पर लड़कियों को यहां पर गाड़ियों से अधिक खूबसूरत बनाकर पेश किया गया। पूरे बीस लाख लोग जिस शो को देखने आए और कहा गया कि यह दुनिया का सबसे बड़ा ऑटो शो साबित हुआ। पर सच में इस शो में गाड़ियों से अधिक लोगों ने उन मॉडलों के किए जो बॉडी शूट में गाड़ियों की खूबसूरती फीका करने का सफल प्रयास कर रही थीं।
10 जनवरी को इस ऑटो शो में दिल्ली पुलिस की धमाकेदार एंट्री हुई परिणामस्वरूप पुलिसवालों ने इस ऑटो शो के कल्चरल शो को बंद करवा दिया। कारण ये था कि कम कपड़े में लड़कियों को नाचता देख जनता बेकाबू हो गई। शो बंद होते ही कंपनी वालों के साथ-साथ आयोजकों की भौहें भी तनीं पर सुरक्षा के लिहाज से इस शो में पुलिस का शो सबसे शानदार रहा। न आयोजकों की चली न कंपनी की विजिटर निराश थे क्योंकि उनकी मेहनत की कमाई पुलिसिया सख्ती की भेंट चढ़ गई।
अरे सबसे अच्छी बात तो तब हुई जब 9 बार के मोटरसाइकिल रेस चैंपियन वोलेंटोनी रॉसी जो कि यमाहा के ब्रांड अंबेस्डर हैं उनको कंपनी ने पहली बार भारत बुलाया। उनका स्वागत दिल्ली के थकाते ट्रैफिक में हुआ, बेचारे किसी तरह से प्रगति मैदान पहुंचे तो वहां पर पहुंचते ही जैसे लोगों को परिचय मिला बस क्या था यमाहा के पवेलियन में ऐसा धमाका हुआ जिससे इस चैंपियन के होश उड़ गए और महोदय किसी तरह से कुछ बाउंसर की मदद से बाहर आने में सफल रहे। पर यमाहा ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और आनन फानन में जॉन और रॉसी की प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करवाई। मुझे भी रॉसी से दो चार बातें करने का मौका मिला। पर जो रॉसी ने कहा उसे सुनकर आपका दिल भी पसीज जाएगा। रॉसी का कहना था कि यहां पर सिर्फ बाइक से ही चला जा सकता है क्योंकि दिल्ली में तो कारें रेंगती हैं। ये रॉसी का दर्द था जिसे उन्होंने बिना रेस भरे कम शब्दों में कह दिया।
युवाओं की नगरी में बड़ी गाड़ियों के उन शौकीनों का ख्वाब पूरा हुआ जो सिर्फ ऑडी, बीएमडब्लू या फिर अन्य महंगी कारें देखना चाहते थे। पर कुछ का ख्वाब टूटा भी क्योंकि वे दो साल में एक बार आने वाले इस महाकुंभ के दरवाजे पर दस्तक देने तो पहुंचे, पर अंदर जाने के लिए न उन्हें टिकट मिला न ही किसी पास का इंतजाम हो सका। देखते-देखते शो खत्म हुआ यातायात बहाल हुआ, बहुत से लोगों ने दुआ मांगी की भगवान गाड़ियां सिर्फ शो में ही सिमट जाएं तो अच्छा होता क्योंकि अगर ये सड़क पर आईं तो इन सड़कों का क्या होगा।
लेबल:
और यूं बीत गया महाकुंभ
शुक्रवार, 22 जनवरी 2010
रविवार, 17 जनवरी 2010
सोमवार, 11 जनवरी 2010
रविवार, 10 जनवरी 2010
शनिवार, 9 जनवरी 2010
शुक्रवार, 8 जनवरी 2010
गुरुवार, 7 जनवरी 2010
बुधवार, 6 जनवरी 2010
रविवार, 3 जनवरी 2010
गुरुवार, 31 दिसंबर 2009
मंगलवार, 29 दिसंबर 2009
रविवार, 27 दिसंबर 2009
सोमवार, 21 दिसंबर 2009
सोमवार, 14 दिसंबर 2009
रविवार, 13 दिसंबर 2009
रविवार, 6 दिसंबर 2009
रविवार, 29 नवंबर 2009
रविवार, 22 नवंबर 2009
शुक्रवार, 20 नवंबर 2009
बुधवार, 11 नवंबर 2009
मंगलवार, 10 नवंबर 2009
रविवार, 8 नवंबर 2009
रविवार, 1 नवंबर 2009
रविवार, 18 अक्टूबर 2009
शनिवार, 17 अक्टूबर 2009
आओ मन का दीप जलाएं

हर रस्ते में दीप जले हैं, हर घर में उजियारा है
क्यों उदास बैठा है प्यारे, मन में क्यों अंधियारा है
यह उत्सव का मौका है, इसको व्यर्थ न जाने दो
निकलो खुश होकर तुम घर से, यह दिन सबसे प्यारा है
लेबल:
मन का दीप
रविवार, 11 अक्टूबर 2009
बुधवार, 7 अक्टूबर 2009
रविवार, 27 सितंबर 2009
सोमवार, 21 सितंबर 2009
जब अतीत बना हकीकत
कॉलेज से निकलकर मैंने पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के लिए एडमिशन लिया था। पर दोपहर के बाद पढ़ाई होने की वजह से मैं पार्टटाइम में कुछ काम किया करता था। वह काम मेरे परिवार के प्रोफेशन से जुड़ा हुआ था। मैं पूजा पाठ करवाया करता था। बहुत अच्छे तरीके से तो याद नहीं है पर हां मैंने कई शादियां भी करवाई हैं। लोग कम ार्चे में शादी करने के लिए मंदिरों में शादी कर लेते थे। एेसे लोगों की शादियों का मैं एक दो बार नहीं कई बार गवाह बना। हालांकि मेरे मंत्रोच्चारण के बाद उनकी शादी कितनी कामयाब है यह मुझे नहीं पता। मैंने उच्च वर्गीय परिवारों में हवन पूजा करवाई थी। मैं वह दिन कभी नहीं भूल सकता जब पृथ्वीराज रोड पर मैं साहिब सिंह बर्मा के सरकारी आवास पर हवन करवा रहा रहा था। यह बात उस समय की है जब इसके पहले के लोकसभा चुनाव हुए थे और साहिब सिंह जी दक्षिणी दिल्ली के लोकसभा सीट से चुनाव लड़े थे। उनको इस बात का अहसास था कि वे चुनाव हारने जा रहे हैं पर अपने मन की शांति के लिए कुछ करीबी लोगों के बहकावे में आकर उन्होंने घर में बंग्लामु ाी का हवन करवाया था। बर्मा जी के वे करीबी मुझे जानते थे सो वे मुझे ही पकड़ ले गए। रात के समय फोन कॉल्स से बुरी तरह से व्यस्त बर्मा जी ने किसी तरह से समय निकाला और हवन में आकर बैठ गए। रात के बारह बजे चुके थे। हवन करते कराते काफी समय हो गया। अपने दिल की तसल्ली के लिए वर्मा जी ने मेरे से पूछा पंडित जी आपको क्या लगता है मैं चुनाव जीतूंगा? मैंने भी एक पंडित के व्यावसायिक धर्म को निभाते हुए कह दिया हां आप जीतने जा रहे हैं इसके अलावा मैं और कोई जवाब नहीं देता इसका अंदाजा आप भी लगा सकते हैं। मैं जिसके लालच में वहां गया था वह मिल गया मुझे 1१ सौ रुपये की दक्षिणा साहिब सिंह जी ने मेरा पैर छूकर दी। दूसरे दिन रिजल्ट आया बर्मा जी हार गए। मुझे बहुत दु ा हुआ एेसा लगा जैसे यह काम सिर्फ पैसे के लिए करना अच्छी बात नहीं है। मुझे थोड़े दिन बाद जागरण में नौकरी मिल गई मैंने यह काम छोड़ दिया। पर अचानक 20 सिंतबर को कुछ एेसा घटा कि मुझे यह घटना ताजा हो गई। मेरे एक दोस्त जेपी यादव जो कि मेरे साथ ही हिंदुस्तान में नौकरी करते हैं उन्होंने गाजियाबाद के वसुंधरा में एक घर ारीदा। 20 को मुझे उन्होंने गृह प्रवेश पर आमंत्रित किया था। घर में सब मेहमान इकट्ठा हो गए पर पंडित जी ने उन्हें अंतिम क्षणों में धो ाा दे दिया। जेपी को संकट में पड़ा दे ा मेरा पंडित्व जागृत हो गया और मैंने पंडिताई का जि मा संभाला। मंत्र याद नहीं थे इसलिए मैंने अपने चाचा को फोन मिलाया जो कि चिराग दिल्ली के एक मंदिर में पंडित जी हैं वे मंत्र बोलते गए मैंने फोन स्पीकर ऑन कर दिया। सारे काम विधि-विधान से हो गए। मेरे ऊपर सभी हंस रहे थे पर मुझे बुरा नहीं लगा क्योंकि मेरे बुरे दिनों में आर्थिक कमाई का पंडिताई ही जरिया था। पर मोबाइल से पूजा करवाकर मुझे बहुत मजा आया। जेपी ने ाुश होकर मुझे मोटी दक्षिणा भी दी। क्योंकि अब मैं इस काम को छोड़ चुका हूं इसलिए सारा का सारा पैसा मैंने अपने चाचा को दे दिया। पर आप मेरी ाुशी का अंदाजा नहीं लगा सकते। इस घटना ने मुझे मेरा बीता हुुआ अतीत याद दिला दिया। यार मैं वैसा भी था, अब एेसा हूं तो क्या हुआ आ िारकार मैं एक पंडित हूं। तो आई बात समझ जरूरत हो याद करना पूजा पाठ करवाने के लिए। हा हा हा!!!!!!!
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जब अतीत बना हकीकत
शुक्रवार, 18 सितंबर 2009
बुधवार, 16 सितंबर 2009
रविवार, 6 सितंबर 2009
बालाचढी इतिहास का अनोखा पन्ना
हिटलर के सताए पोलिश बच्चे जब समुद्र में बहती हुई जहाज में अपनी जिंदगी बचाकर जब जामनगर से 35 किलोमीटर दूर बालाचढी केसमुद्र तट पर लगे। उस समय अलग दुनिया पाकर वे बच्चे जब जिंदा निकले भी तो उनके लिए सबकुछ नया था। यह वाकया आज सेलगभग 67साल पहले की है। द्वितीय विश्वयुद्व के दौरान हिटलर ने निर्दयता का परिचय देते हुए लगभग दो हजार पोलिश बच्चों को एक जहाज में डालकर समुद्र में छोड दिया था। वह जहाज कई महीने बाद बालाचढी के पास समुद्र के किनारे जामनगर के राजा को दिखा। राजा ने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि वह जहाज वहां से किनारे लाया जाए। सिपाहियों ने जब जहाज में जाकर देखा तो उसमें बहुत से बच्चों की मौत हो चुकी थी पर कुछ बच्चे जिंदा थे। राजा ने उन बच्चों के लिए वहां पर स्थान बनवाया स्कूल बनवाया जहां पर ये बच्चे 1942 से लेकर 1946 तक रहे। जो बच्चे मर गए थे राजा ने उनकी समाधि भी यहां बनवाई। उस दौर को देखने वाले लोग बताते हैं कि उस घटना ने आसपास के लोगों को हिलाकर रख दिया था। हमेशा शांत रहने वाली इस जगह पर समुद्र की तेज लहरों से ऐसा लग रहा था जैसे वह इस घटना से दुखी होकर मानो प्रलय मचाने वाला है। पर जामनगर के राजा ने जो किया उसके लिए उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा। आज वह स्कूल सैनिक स्कूल के नाम से मशहूर है भारत के सभी सैनिक स्कूलों में बालाचढी के इस सैनिक स्कूल को सबसे अधिक धनी माना जाता है। वे बच्चे आज भी इस स्कूल को अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा मानते हैं। स्कूल के मुख्य गेट पर लगा ममतामयी स्टेचू और उस पर लिखे शब्द इस बात की गवाही देते हैं कि वे बच्चे इस भूमि से कितना अटैच हैं। इस जगह स्थित यह स्कूल सिर्फ स्कूल नहीं है बल्कि मेहमाननवाजी का मिसाल है। अगर कभी मौका मिले तो यहां आकर देखियेगा पता चलेगा कि शांति किसे कहते हैं और शांति की खोज कैसे की जाती है। यहां दिखने वाले हर आदमी से बात करने का मन करता है क्योंकि वहां लोग हैं ही नहीं।
सोमवार, 31 अगस्त 2009
......और मैम चली गईं
अरे नालायकों जल्दी आ जाओ देखो टीवी पर कौन आ रहा है, आज की खबर सुन तो बाद में काम आएंगी देश विदेश में क्या हो रहा है तुम सबको जानना चाहिए। ये घुडकी आज की नहीं बल्कि 12-15 साल पुरानी है। इसे हमारे पिता जी प्रयोग दिया करते थे। उस समय की यह घटना मुझे आज इसलिए याद आ गई क्योंकि आज जो घटा शायद इतना बडा मेरे सामने अब न घटे। मैंने दो माह पहले हिंदुस्तान ज्वाइन किया था। मेरा साक्षात्कार म्रिणाल मैम ने लिया था। जब मेरा उनसे सामना हुआ तो मैं बहुत खुश हुआ क्योंकि जिन लाइनों का जिक्र मैंने उपर किया उसकी वजह मैम थीं। वे दूरदर्शन पर समाचार पढती थीं। मेरे चाचा की शादी में एक अप्ट्रान टीवी मिला था। वह टीवी बैट्री से चलती थी जिसे हम अपने गांव से पांच किलोमीटर दूर चार्ज कराने ले जाते थे। म्रिणाल पांडे मैम को मेरा पूरा गांव जानता था क्योंकि सब इकट्रठा होकर समाचार सुनते थे। पर आज जो हुआ उसकी उम्मीद किसी को नहीं थी मैम ने संस्थान को हमेशा के लिए छोड दिया। सैकडों लोग दुखी मन से उन्हें विदा कर रहे थे मैं भी उत्सुकता भरी नजरों से उन्हें देख रहा था तथा उनकी मधुर आवाज से निकल रहे विदाई संदेश को सुनता जा रहा था। मैम के साथ मुझे काम करने का अधिक मौका नहीं मिला पर वे मेरे लिए किसी आदर्श से कम नहीं थीं क्योंकि मैंने उन्हें देखकर अपना बचपन बिताया था इसलिए उन्हें अचानक जाते देख थोडी निराशा हुई। पर एक खुशी इस बात की थी कि चलो जिसके साथ अमर उजाला में रहकर काम सीखा था अब वे नए बिग बॉस के रूप में हमारे संस्थान में आ चुके हैं। पर हिंदी मीडिया की इस बडी घटना का गवाह बनना भी मेरे लिए किसी गर्व से कम नहीं था। हो सकता है कि बहुत से लोग मेरी बातों से सहमत न हों कि मैंने मैम की अच्छाई बताई है पर मैं अपनी जगह सही हूं क्योंकि मैंने मैम के साथ सिर्फ दो महीने ही काम किया इसलिए इतने कम समय में किसी को बुरा कहना उसके साथ नाइंसाफी होगी। वैसे भी हर आदमी हर किसी के लिए बुरा नहीं होता। यह सच्चाई है। बुरा मानोगे तो पूरी दुनिया बुरी अच्छा समझोगे तो हर कोई अच्छा। पर मैं सच में मैडम का इस बात के लिए आभारी हूं कि उन्होंने मुझे अपने साथ पूरे दो महीने काम करने का अवसर दिया।
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और वो चली गईं
शनिवार, 29 अगस्त 2009
पारंपरिक योग से हास्य योग तक बाबा का सफर

आज घर पहुंचा तो टीवी पर मां रजत शर्मा का आपकी अदालत देख रही थीं। कार्यक्रम में बाबा रामदेव संभावना सेठ और कश्मीरा के साथ योग को साबित करने में जुटे हुए थे। चरित्र के पवित्रता पर वे लगातार बोले जा रहे थे। वहीं संभावना और कश्मीरा अपनी बातों से बाबा के धर्म को डिगाने की कोशिश कर रही थीं। बाबा की हरकतों को देखकर ऐसा लगा जैसे अब बाबा रामदेव धर्म समाज के लालू यादव बनते जा रहे हैं। अब उनको देखकर सिर्फ हंसी आती है। एक बात समझ में नहीं आती बाबा रामदेव को ऐसे कार्यक्रमों में आने में इतना मजा क्यों आता है? मैंने इतने पुराण और शास्त्रों के बारे में पढा है पर किसी भी योगी को लडकियों में इतनी दिलचस्पी लेते नहीं देखा। आजकल बाबा जी मीडिया में छाए हुए हैं क्योंकि वे लडकियों की बातें करते हैं हीरोइनों को सभ्यता सिखा रहे हैं। पर बाबा में तो एक बात है अकेले अपने दम पर बाबा ने बॉलीवुड की दो बडबोली अभिनेत्रियों का मुंह बंद कर दिया। पर कुल मिलाकर बाबा जी ऐसा लग रहा है कि लालू यादव की जगह पूरी करने के लिए हास्य योग का सहारा ले रहे हैं। कांग्रेस ने तो लालू ने किनारा कर ही लिया क्योंकि जनता ने उन्हें समर्थन नहीं दिया। इसलिए इस खाली जगह को भरने के लिए बाबा रामदेव ने बीडा उठाया और ऐसा लगता है बाबा जी ने आसानी से हठ योग से हास्य योग तक का सफर तय कर लिया है। पर कुछ भी हो बाबा की बातों में लोगों को मल्लिका शेरावत के कम कपडों मे लगाए गए ठुमके से अधिक आनंद आता है। क्योंकि बाबा जी पूरे कपडे पहनकर जो बातें करते हैं उसमें से झलकने वाली अश्लीलता का रस मीडिया को भी अच्छा लगता है जनता को भी। अब अगर बाबा बाबा हैं तो उन्हें संभावना और कश्मीरा से बहस करने की क्या जरूरत है। बाबा जी मैं तो आपसे कहता हूं कि अब लोगों को योगा सिखाने के बजाय सेक्स शिक्षा पर ध्यान देना शुरू कर दीजिए क्योंकि भारत सरकार इस पर करोडों रुपये खर्च कर देती है।
बुधवार, 26 अगस्त 2009
उन इशारों ने जीत लिया दिल
अभी कुछ दिन पहले मैं गुजरात गया। वहां पर मेरे साथ एक ऐसा वाकया हुआ जिसे मैं जिंदगी भर नहीं भूल पाउंगा। मैं दिल्ली पोरबंदर से जामनगर 10 बजकर 30 मिनट पर पहुंचा। जामनगर से मुझे बालाचढी जाना था। बालाचढी जामनगर से 35 किलोमीटर दूर है वहां पर मेरे भैया सैनिक स्कूल में शिक्षक हैं। बस के अलावा वहां तक पहुंचने के बहुत कठिन साधन हैं अगर आपके पास अपनी गाडी नहीं है तो। मैं रेलवे स्टेशन से सीधे जामनगर के एसटी गया जहां से मुझे बालाचढी के लिए बस मिलती। वहां जाकर मैंने बस का पता किया तो पता चला कि बस 12 बजकर 30 मिनट पर जाएगी। मेरे पास एक घंटा इंतजार करने के सिवा और कोई चारा नहीं था। मैंने लोगों की भीड में एक जगह खोज निकाली। सारी एनाउंसमेंट गुजराती में हो रही थी इसलिए मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। एक घंटे में दो दर्जन से भी अधिक बसें अपने मुसापिफरों को लेकर चली गईं इसके बावजूद मेरी बस नहीं आई। एक घंटा बीत जाने के बाद मैंने काउंटर पर जाकर पूछा भाई बस कब आएगी। उस बंदे ने बडी अभद्रता के साथ जवाब दिया कि अभी उदघोषणा होगी सुन लेना। मैंने उस बंदे को कहा भाई मुझे गुजराती नहीं आती। इस पर उसे और गुस्सा आ गया उसने कहा तो जाकर गुजराती सीख लो। मैंने उसे झगडा करने के बजाय गांधीगिरी करने की सोची। मैं हर पांच मिनट पर वहां जाता और सिर्फ उसे अपना थोपडा दिखाकर वापस आ जाता। लेकिन उस बंदे का दिल नहीं पसीजा। इतने मैंने सोचा कि क्यों न किसी और की सहायता ली जाए मैंने अपने सामने एक व्यक्ति को बैठा देखा। वह गठीले बदन का एक 35 चालीस साल का व्यक्ति था। उसके चेहरे को देखकर पता चलता था कि वह कितने आत्मविश्वास से लवरेज है। मैंने उससे कहा भैया मेरी थोडी मदद कर दो। उस बंदे को कुछ समझ नहीं आया उसने जेब से एक पेन निकाली और अपना हाथ आगे करके उस पर लिखने का इशारा किया। साथ में अपने हाथों के इशारों से बताया कि वह न तो बोल सकता है न ही सुन सकता है। उससे पेन लेते हुए मैं चौंका कि क्या यह हिंदी जानता है, पर मेरी इस हैरानी का समाधान दो मिनट में हो गया उससे मैंने जो लिखकर पूछा था उसने उसका जवाब लिखकर दिया। उसने जाकर इशारे से मेरे लिए यह भी पता कर लिया कि आखिर बस अब तक क्यों नहीं आई। बस दो घंटे लेट थी क्योंकि वह रास्ते में खराब हो गई थी और वहां से कोई दूसरी बस नहीं थी। उस दौरान उस व्यक्ति से मैंने साक्षात्कार किया और पता लगाया कि वह क्या करता है। इस वार्तालाप को पूरा करने के लिए मैंने अपनी रेलेवे ई टिकट का इस्तेमाल किया। इस दौरान उसने अपनी बीवी से मुझे मिलाया वह भी न तो बोल सकती थी न सुन सकती थी। उसके दो बच्चे पास में ही खेल रहे थे वे बोलना जानते थे और सुनते भी थे पर वे बोलने से अधिक इशारे से बात कर रहे थे क्योंकि अपने मम्मी पापा से सिर्फ वे इशारे से ही बात करते हैं। क्योंकि अभी वे छोटे थे इसलिए अपने पापा का लिखा भी नहीं समझते थे। बस इशारे से ही उनके मम्मी पापा उन पर अपना प्यार उडेलते थे डांटते थे और दुलारते थे। उसने बताया कि वह पेशे से पेंटर है थोडे दिन पहले दिल्ली भी होकर गया था। उसके तीन भाई हैं सब अलग अलग काम करते हैं। मम्मी पापा भगवान को प्यारे हो चुके हैं तथा उसका नाम दिनेश था। इस तरह से उससे बातें करते हुए मेरा सारा समय बीत गया और उसने मुझे कहा कि मैं उसे अपना पता दे दूं तो वह मुझे चिट्ठी लिखेगा। मैंने उसे अपना पता दिया है अगर उसकी चिटठी आई तो उसे यहां जरूर लिखूंगा। थोडी देर में मेरी बस आई उसने मेरा बैग बस तक पहुंचाया और तब तक वह और उसके बच्चे हाथ हिलाते रहे जब तक कि मेरी बस उनको दिखती रही। अरे अरे रुको मैं तो भूल ही गया यह बताना कि वे वहां कर क्या रहे थे। दिनेश् अपनी किसी रिश्तेदारी में जा रहा था उसकी बस और देर से आ रही थी। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जो लोग सुन नहीं पाते बोल नहीं पाते देख नहीं पाते भगवान उनको भी लोगों से कम्यूनिकेट करने का तरीका देता है। यह मेरे जीवन का ऐसा वाकया है जो दिल को छू गया।
रविवार, 16 अगस्त 2009
शुक्रवार, 14 अगस्त 2009
बूढी होती स्वतंत्रता के बदलते मायने
रिमझिम बरसात, बादलों भरा आसमान, खामोशी तोडते देश भक्ति से भरे गीत मुझमें इतना जोश भर रहे हैं जिसका बयान मैं अपनी लेखनी से नहीं कर सकता, इसे सिर्फ मैं महसूस कर रहा हूं। लाल किले पर पीएम का तिरंगा फहराते देखना उनका भाषण सुनना यह मेरे हर 15 अगस्त का रुटीन है। पर आज अचानक मुझे ऐसा लगा कि कहीं जिंदगी के गुजरते सालों की तरह हमारी स्वतंत्रता भी बूढी तो नहीं होती जा रही है। शहीद मूवी में मनोज कुमार का कोडे खाना, तरह-तरह की यातनाएं सहना देखकर ऐसा लगा जब ये मूवी बनी थी उस समय हमारी स्वतंत्रता जवान थी इसीलिए उस समय लोग इसकी कीमत समझते थे। पर समय परिवर्तन के साथ-साथ लोगों की स्वतंत्रता सिर्फ भाषणों और कविताओं तक ही सिमट कर रह गई है। आज भी वीर रस के कवि पाकिस्तान से प्रेरित होकर देश भक्ति की कविताएं स्टेज पर ऐसे पढते हैं जैसे वे दो मिनट में पाकिस्तान को अपने शब्दों के परमाणु बम से स्वाहा कर देंगे। पर ऐसी कविता पढने वाला कोई नहीं दिखा जो अपने देश के अंदर के राक्षस को मिटाने की बात करता हो। अब ज्यादा क्या कहें जिस देश की मदर टंग को ही बोलने में लोग शर्म महसूस करते हैं वे और अपने देश के हित की क्या बात करेंगे। हिंदी की खाने वाले उससे अपना पेट पालने वाले जब अपने ही किसी हिंदी भाई से बात करते हैं तो अंग्रेजी के प्रवाह की ऐसी गंगा बहा देते हैं जैसे हिंदी उनकी कुछ लगती ही न हो। पिछले दिनों हिंदी पर किए गए एक अध्ययन को पढ रहा था जिसे देखकर मैं चौंक गया कि हमारी इसी उपेक्षित भाषा से अरबों का बिजनेस पूरी दुनिया में हो रहा है। हमारे अंग्रेजी मूवी स्टार भी इसी भाषा की बदौलत अपनी दुकानदारी चला रहे हैं अब भले ही वे हिंदी में बात करना सार्वजनिक रूप से पसंद न करें। यह है हमारे स्वतंत्रता की फीकी पडती चमक का एक ज्वलंत उदाहरण। अब मैं दूसरे बिंदु पर आता हूं, हमारी युवा पीढी अपने बुजुर्गों का सम्मान करना भूलती जा रही है उसे लग रहा है कि उसे कभी बूढा ही नहीं होना है। लाखों की संख्या में मां बाप अपने जिंदगी के बचे दिनों को बुजुर्ग आश्रम में बिता रहे हैं क्योंकि उनके बच्चों के पास उनके लिए समय नहीं है। यह हमारी बूढी होती स्वतंत्रता का एक और उदाहरण है। तीसरे उदाहरण के रूप में मैं अपने अपमानित नेताओं का नाम लेना पसंद करुंगा। जिन्हें लोगों ने चुनकर एक ओहदा दिया और वे उसका फायदा उठाकर सारे कुकर्म कर रहे हैं। बात चाहे माया की हो या मुलायम की यह सभी प्रतिशोध लेने के लिए तैयार हैं। अपनी मूर्तियों पर नाम के लिए लोगों का पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं। राज्य में बिजली की हालत क्या है कितने लोग भूखे सो रहे हैं इससे उपर है उनका अपना स्वार्थ, जिसे सिद्व करने के लिए वे किसी भी हद तक गिर सकते हैं। इसे देखकर ऐसा आप महसूस कर सकते हैं कि हमारे नेताओं के लिए स्वतंत्रता का मतलब क्या है। उनके लिए स्वतंत्रता का मतलब लोगों का खून चूसकर पैसा जमा करना है जो उनके भी काम नहीं आता उसे भोगने से पहले वे भगवान को प्यारे हो जाते हैं। इस तरह से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पहले जब हमारी स्वतंत्रता किशोरावस्था में थी तो उसके मायने सबके लिए एक थे पर अब सभी के लिए स्वतंत्रता के मायने बदल चुके हैं। जिसमें अनुशासन का नाम कहीं भी नही दिखता।
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बूढी स्वतंत्रता
गुरुवार, 13 अगस्त 2009
हरे-भरे पेडों का कब्रगाह माया का नया पार्क
बात उन दिनों की है जब मैंने जागरण में नौकरी शुरु की थी और मुझे खोडा से निकलकर नोएडा में मेडिकल बीट देखने का अवसर मिला था। अक्सर इस पार्क में जाकर खाली समय अकेले बिताया करता था। यह फोटो मेरे एक सहयोगी साथी राजेश गौतम ने 2005 में नोएडा के गौतमबुद्व नगर पार्क में ली थी। यह वही पार्क है जिस पर आजकल बवाल चल रहा है क्योंकि मायावती ने इस पार्क का अस्तित्व हमेशा के लिए मिटाकर वहां पर अपनी खूबसूरत प्रतिमाओं और हाथियों के मूर्तियों का जमघट पता नहीं कितने सौ करोड रुपये खर्च करके लगवा दिया। उस समय तक यह पार्क पूरे नोएडा की जान हुआ करता था। यहां पर लोग अपने पूरे परिवार के साथ आकर मस्तियां करते थे। नोएडा टोल से सटे इस पार्क को तोडकर यहां कुछ और बनवाने का फैसला माया ने क्यों लिया ये तो मैं नहीं जानता पर हां इससे इतना तो जरूर कहा जा सकता है कि ऐसा करके माया ने अपनी स्वतंत्रता का असल उदाहरण पेश किया है कि देखो जब पावर हो तो कुछ भी किया जा सकता है। एक खूबसूरत पार्क को उजडवाकर माया ने ऐसा पाप किया है जिसके लिए न तो उन्हें मैं माफ करुंगा न ही नोएडा की जनता। मैं उन लकी लोगों में से हूं जिन्होंने इस पार्क का दीदार काफी करीब से किया था। आप सबके लिए मैं यहां अपनी कुछ फोटो डाल रहा हूं जिससे आप उस पार्क के खूबसूरती का अंदाजा लगा सकते हैं।
पार्क का फव्वारा जो हर शाम को रंग बिरंगे लाइट्स में चमक उठता था। दिन में भी इसकी खूबसूरती कम नहीं रहती थी।
अब भी जब मैं इस फोटो को देखता हूं तो मुझे गर्व महसूस होता है कि मैंने उस पार्क को देखा था जिसे माया ने अपने नाम के लिए शहीद कर दिया। माया की उन बेजान मूर्तियों में हरे-भरे पेडों की आह दिखती है जिसे शहीद कर दिया गया। माया के द्वारा बनाया गया पार्क भले ही कितने रुपयों से तैयार हुआ साहो पर कुल मिलाकर वह सिर्फ हरे-भरे पेडों की कब्रगाह के अलावा और कुछ नहीं।
पार्क का फव्वारा जो हर शाम को रंग बिरंगे लाइट्स में चमक उठता था। दिन में भी इसकी खूबसूरती कम नहीं रहती थी।
अब भी जब मैं इस फोटो को देखता हूं तो मुझे गर्व महसूस होता है कि मैंने उस पार्क को देखा था जिसे माया ने अपने नाम के लिए शहीद कर दिया। माया की उन बेजान मूर्तियों में हरे-भरे पेडों की आह दिखती है जिसे शहीद कर दिया गया। माया के द्वारा बनाया गया पार्क भले ही कितने रुपयों से तैयार हुआ साहो पर कुल मिलाकर वह सिर्फ हरे-भरे पेडों की कब्रगाह के अलावा और कुछ नहीं।
लेबल:
माया
मंगलवार, 11 अगस्त 2009
पहनावे पर भारी पडती भगवान की रचना
जब भगवान ने लोगों को बनाया था उस समय उन्होंने वस्त्र के बारे में सोचा ही नहीं था। ऐसे में कहा जा सकता है कि अगर लोग भगवान की रचना हैं तो ऐसे में वस्त्र के रचयिता कोई और नहीं हम और आप हैं। पर इतना समझने में कि भगवान ने वस्त्र का निर्माण नहीं किया था हमें कई सदियां लग गईं। अब जाकर आधुनिक संसार में लोगों को इसकी महिमा समझ में आई है। मैं उदाहरण दूंगा विश्व में आयोजित एक बडे फैशन शो की उसमें डिजाइनर्स ने अच्छे-अच्छे परिधान डिजाइन किए थे। पर पुरस्कार उसको मिला जिसने महिलाओं के ऐसे अंर्तवस्त्र बनाए थे जिसमें से बहुत कुछ नजर आता था। उस समय मेरे दिमाग में एक ख्याल आया अगर वस्त्रों का अंबार लोगों के शरीर से यूं ही घटता गया तो वह दिन दूर नहीं जब भगवान को बेस्ट ड्रेस डिजाइनिंग का अवार्ड देने के लिए चुना जाएगा।मंगलवार की सुबह जब मैं जिम पहुंचा और पार्किंग में गाडी पार्क करके आगे बढा तो एक साथ ढेर सारी भाषाओं में गीत सुनकर चौंक गया। मेरी नजर एक लडकी पर पडी जो मेरे जिम में मुझे रोज मिला करती थी पर मंगलवार को पार्किंग में दिख गई। सुबह के समय काफी लोग ऐसे जिम में आते हैं जो अपने ड्राइवर के साथ आते हैं वह सारे ड्राइवर सुबह पार्किंग में लडकियां देखकर यूं ही पास करते हैं। तो मैं मैडम की तारीफ कर रहा था मैडम को उपर से देखकर चौंक गया मेरे पैरों से जमीन खिसकते-खिसकते रह गई क्योंकि मैंने जब मैडम को उपर से देखा तो लगा वो जल्दी-जल्दी में नीचे अपना ट्राउजर पहनना भूल गईं। पर बाद में मैडम के कांफीडेंस को देखकर लगा ये उनका फैशन है। जिसे देखकर सारी गलियों में संगीत गूंजने लगा था हर कोई अपनी भाषा में उसके लिए गीत गा रहा था और मैडम इतराती बलखाती मल्लिका से भी कम कपडे पहनकर जिम की ओर मुस्कराती हुई बढती चली जा रही थीं। भाई साहब मैडम को तो लोगों ने बाहर देखा तो इतने खुश हो गए और अब आप मेरा अंदाजा लगाइए मैंने उनके साथ एक घंटा जिम के अंदर गुजारा। पर मैडम का जादू हर तरफ चल रहा था आप जानकर हंसेंगे जिन हाथों से 30 किलो के डंबल उठते थे मंगलवार को पांच किलो उठाने भी भारी पड रहे थे। पर कुछ भी हो ये है भगवान की असल रचना की थोडी सी झलक जो धीरे-धीरे अपनी पूर्णता की ओर बढ रही है। जिस दिन ये परदा भी हट जाएगा समझ जाइएगा लोगों को सत्य का ज्ञान हो गया है।
रविवार, 2 अगस्त 2009
राखी ने अगस्त में सबको बनाया अप्रैल फूल
क्या इस बार राखी को अपने सपनों का राजकुमार मिल पाएगा। क्या इस बार कोई राखी को धोखा देने वाला नहीं आएगा। क्या अब सच में राखी को अपने सपनों का राजकुमार मिलेगा। इन सभी सवालों का जवाब देने के लिए देखिए राखी का स्वयंबर पार्ट-2 सिर्फ एनडीटीवी इमेजिन पर। इन लाइनों को पढकर आप चौंकिए मत क्योंकि आने वाले चार पांच महीनों में एनडीटीवी पर राखी का स्वयंबर पार्ट-2 दिखाया जा सकता है। ये लाइनें उस शो के प्रोमो में राखी के शुभ मुख से सुनने को मिलेगी। राखी ने एक चैनल के साथ मिलकर करोडों भारतीय दर्शकों का उल्लू बनाकर यह साबित कर दिया कि देखो मुझमें कितना दम है। पर यह बात भी मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि थोडे दिन बाद अगर इसी टीवी पर राखी के स्वयंबर का दूसरा पार्ट दिखाया जाएगा तो वह इससे भी अधिक हिट होगा। क्योंकि राखी की छिछोरी हरकतें देखने वालों की दुनिया में कमी नहीं है।
पूरे एक महीने तक नौटंकी करके मैडम ने सिर्फ ने सगाई की क्योंकि राखी को अच्छी तरह से पता है सगाइयां आसानी से टूट जाया करती हैं। थोडे दिन बाद निलेश राखी को भूल जाएगा और राखी उसे राखी का रास्ता साफ होगा और एक स्वयंबर की रूपरेखा आसानी से पिफर तैयार हो जाएगी। राखी की आदतें सिर्फ स्वयंबर रचा सकती हैं जिससे उन्हें पैसा मिल जाए पर सच्चाई ये है कि राखी शादी कर ही नहीं सकती क्योंकि उन्हें अपने कैरियर से बहुत प्यार है। दूसरी बात ये है कि उनसे कोई और शादी कर ही नहीं सकता क्योंकि लोग लडकियों से शादी कर सकते हैं पर किसी मुसीबत से नहीं। रविवार को जब फाइनल घडी थी और राखी ने नीलेश के गले में जयमाला पहनाया उस समय दो और दूल्हों के चेहरे पर कोई परेशानी की लकीर नहीं थी क्योंकि उन्हें पता था कि जो हुआ अच्छा हुआ मुसीबत बिना परेशानी के टल गई। इस शो के एक प्रतिभागी मनमोहन ने सबसे अच्छा काम किया जब राखी रिषिकेश उसके घर गईं और उसके पापा ने राखी को पांच बजे ही चाय बनाने के लिए जगा दिया और उसने राखी से कह दिया कि वह उससे शादी नहीं करेगा। राखी उसकी ये बातें सुनकर भडक गईं और कहने लगीं तुम जैसे मेर पीछे पंद्रहों घूमते हैं। यह सुनकर मनमोहन बाबू प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह ही शांत था क्योंकि उसे पता था उसने इतने दिन टीवी पर दिखकर काफी नाम किया लिया और उसे आगे जाने की क्या जरूरत है। पर जो भी हो राखी को मीडिया की सुर्खी बने रहना अच्छी तरह आता है। वह इसके लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। राखी अपनी तुलना सीता जी से कर रही थीं पर उन्हें यह मालूम है कि सीता जी ने कभी किसी अभिषेक से डेटिंग नहीं की थी बस वे राम की हो गई थीं। जबकि राखी के बारे में तो सिर्फ इतना कहा जा सकता है सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।
पूरे एक महीने तक नौटंकी करके मैडम ने सिर्फ ने सगाई की क्योंकि राखी को अच्छी तरह से पता है सगाइयां आसानी से टूट जाया करती हैं। थोडे दिन बाद निलेश राखी को भूल जाएगा और राखी उसे राखी का रास्ता साफ होगा और एक स्वयंबर की रूपरेखा आसानी से पिफर तैयार हो जाएगी। राखी की आदतें सिर्फ स्वयंबर रचा सकती हैं जिससे उन्हें पैसा मिल जाए पर सच्चाई ये है कि राखी शादी कर ही नहीं सकती क्योंकि उन्हें अपने कैरियर से बहुत प्यार है। दूसरी बात ये है कि उनसे कोई और शादी कर ही नहीं सकता क्योंकि लोग लडकियों से शादी कर सकते हैं पर किसी मुसीबत से नहीं। रविवार को जब फाइनल घडी थी और राखी ने नीलेश के गले में जयमाला पहनाया उस समय दो और दूल्हों के चेहरे पर कोई परेशानी की लकीर नहीं थी क्योंकि उन्हें पता था कि जो हुआ अच्छा हुआ मुसीबत बिना परेशानी के टल गई। इस शो के एक प्रतिभागी मनमोहन ने सबसे अच्छा काम किया जब राखी रिषिकेश उसके घर गईं और उसके पापा ने राखी को पांच बजे ही चाय बनाने के लिए जगा दिया और उसने राखी से कह दिया कि वह उससे शादी नहीं करेगा। राखी उसकी ये बातें सुनकर भडक गईं और कहने लगीं तुम जैसे मेर पीछे पंद्रहों घूमते हैं। यह सुनकर मनमोहन बाबू प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह ही शांत था क्योंकि उसे पता था उसने इतने दिन टीवी पर दिखकर काफी नाम किया लिया और उसे आगे जाने की क्या जरूरत है। पर जो भी हो राखी को मीडिया की सुर्खी बने रहना अच्छी तरह आता है। वह इसके लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। राखी अपनी तुलना सीता जी से कर रही थीं पर उन्हें यह मालूम है कि सीता जी ने कभी किसी अभिषेक से डेटिंग नहीं की थी बस वे राम की हो गई थीं। जबकि राखी के बारे में तो सिर्फ इतना कहा जा सकता है सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।
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राखी ने
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