
रविवार, 29 नवंबर 2009
रविवार, 22 नवंबर 2009
शुक्रवार, 20 नवंबर 2009
बुधवार, 11 नवंबर 2009
मंगलवार, 10 नवंबर 2009
रविवार, 8 नवंबर 2009
रविवार, 1 नवंबर 2009
रविवार, 18 अक्टूबर 2009
शनिवार, 17 अक्टूबर 2009
आओ मन का दीप जलाएं

हर रस्ते में दीप जले हैं, हर घर में उजियारा है
क्यों उदास बैठा है प्यारे, मन में क्यों अंधियारा है
यह उत्सव का मौका है, इसको व्यर्थ न जाने दो
निकलो खुश होकर तुम घर से, यह दिन सबसे प्यारा है
लेबल:
मन का दीप
रविवार, 11 अक्टूबर 2009
बुधवार, 7 अक्टूबर 2009
रविवार, 27 सितंबर 2009
सोमवार, 21 सितंबर 2009
जब अतीत बना हकीकत
कॉलेज से निकलकर मैंने पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के लिए एडमिशन लिया था। पर दोपहर के बाद पढ़ाई होने की वजह से मैं पार्टटाइम में कुछ काम किया करता था। वह काम मेरे परिवार के प्रोफेशन से जुड़ा हुआ था। मैं पूजा पाठ करवाया करता था। बहुत अच्छे तरीके से तो याद नहीं है पर हां मैंने कई शादियां भी करवाई हैं। लोग कम ार्चे में शादी करने के लिए मंदिरों में शादी कर लेते थे। एेसे लोगों की शादियों का मैं एक दो बार नहीं कई बार गवाह बना। हालांकि मेरे मंत्रोच्चारण के बाद उनकी शादी कितनी कामयाब है यह मुझे नहीं पता। मैंने उच्च वर्गीय परिवारों में हवन पूजा करवाई थी। मैं वह दिन कभी नहीं भूल सकता जब पृथ्वीराज रोड पर मैं साहिब सिंह बर्मा के सरकारी आवास पर हवन करवा रहा रहा था। यह बात उस समय की है जब इसके पहले के लोकसभा चुनाव हुए थे और साहिब सिंह जी दक्षिणी दिल्ली के लोकसभा सीट से चुनाव लड़े थे। उनको इस बात का अहसास था कि वे चुनाव हारने जा रहे हैं पर अपने मन की शांति के लिए कुछ करीबी लोगों के बहकावे में आकर उन्होंने घर में बंग्लामु ाी का हवन करवाया था। बर्मा जी के वे करीबी मुझे जानते थे सो वे मुझे ही पकड़ ले गए। रात के समय फोन कॉल्स से बुरी तरह से व्यस्त बर्मा जी ने किसी तरह से समय निकाला और हवन में आकर बैठ गए। रात के बारह बजे चुके थे। हवन करते कराते काफी समय हो गया। अपने दिल की तसल्ली के लिए वर्मा जी ने मेरे से पूछा पंडित जी आपको क्या लगता है मैं चुनाव जीतूंगा? मैंने भी एक पंडित के व्यावसायिक धर्म को निभाते हुए कह दिया हां आप जीतने जा रहे हैं इसके अलावा मैं और कोई जवाब नहीं देता इसका अंदाजा आप भी लगा सकते हैं। मैं जिसके लालच में वहां गया था वह मिल गया मुझे 1१ सौ रुपये की दक्षिणा साहिब सिंह जी ने मेरा पैर छूकर दी। दूसरे दिन रिजल्ट आया बर्मा जी हार गए। मुझे बहुत दु ा हुआ एेसा लगा जैसे यह काम सिर्फ पैसे के लिए करना अच्छी बात नहीं है। मुझे थोड़े दिन बाद जागरण में नौकरी मिल गई मैंने यह काम छोड़ दिया। पर अचानक 20 सिंतबर को कुछ एेसा घटा कि मुझे यह घटना ताजा हो गई। मेरे एक दोस्त जेपी यादव जो कि मेरे साथ ही हिंदुस्तान में नौकरी करते हैं उन्होंने गाजियाबाद के वसुंधरा में एक घर ारीदा। 20 को मुझे उन्होंने गृह प्रवेश पर आमंत्रित किया था। घर में सब मेहमान इकट्ठा हो गए पर पंडित जी ने उन्हें अंतिम क्षणों में धो ाा दे दिया। जेपी को संकट में पड़ा दे ा मेरा पंडित्व जागृत हो गया और मैंने पंडिताई का जि मा संभाला। मंत्र याद नहीं थे इसलिए मैंने अपने चाचा को फोन मिलाया जो कि चिराग दिल्ली के एक मंदिर में पंडित जी हैं वे मंत्र बोलते गए मैंने फोन स्पीकर ऑन कर दिया। सारे काम विधि-विधान से हो गए। मेरे ऊपर सभी हंस रहे थे पर मुझे बुरा नहीं लगा क्योंकि मेरे बुरे दिनों में आर्थिक कमाई का पंडिताई ही जरिया था। पर मोबाइल से पूजा करवाकर मुझे बहुत मजा आया। जेपी ने ाुश होकर मुझे मोटी दक्षिणा भी दी। क्योंकि अब मैं इस काम को छोड़ चुका हूं इसलिए सारा का सारा पैसा मैंने अपने चाचा को दे दिया। पर आप मेरी ाुशी का अंदाजा नहीं लगा सकते। इस घटना ने मुझे मेरा बीता हुुआ अतीत याद दिला दिया। यार मैं वैसा भी था, अब एेसा हूं तो क्या हुआ आ िारकार मैं एक पंडित हूं। तो आई बात समझ जरूरत हो याद करना पूजा पाठ करवाने के लिए। हा हा हा!!!!!!!
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जब अतीत बना हकीकत
शुक्रवार, 18 सितंबर 2009
बुधवार, 16 सितंबर 2009
रविवार, 6 सितंबर 2009
बालाचढी इतिहास का अनोखा पन्ना
हिटलर के सताए पोलिश बच्चे जब समुद्र में बहती हुई जहाज में अपनी जिंदगी बचाकर जब जामनगर से 35 किलोमीटर दूर बालाचढी केसमुद्र तट पर लगे। उस समय अलग दुनिया पाकर वे बच्चे जब जिंदा निकले भी तो उनके लिए सबकुछ नया था। यह वाकया आज सेलगभग 67साल पहले की है। द्वितीय विश्वयुद्व के दौरान हिटलर ने निर्दयता का परिचय देते हुए लगभग दो हजार पोलिश बच्चों को एक जहाज में डालकर समुद्र में छोड दिया था। वह जहाज कई महीने बाद बालाचढी के पास समुद्र के किनारे जामनगर के राजा को दिखा। राजा ने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि वह जहाज वहां से किनारे लाया जाए। सिपाहियों ने जब जहाज में जाकर देखा तो उसमें बहुत से बच्चों की मौत हो चुकी थी पर कुछ बच्चे जिंदा थे। राजा ने उन बच्चों के लिए वहां पर स्थान बनवाया स्कूल बनवाया जहां पर ये बच्चे 1942 से लेकर 1946 तक रहे। जो बच्चे मर गए थे राजा ने उनकी समाधि भी यहां बनवाई। उस दौर को देखने वाले लोग बताते हैं कि उस घटना ने आसपास के लोगों को हिलाकर रख दिया था। हमेशा शांत रहने वाली इस जगह पर समुद्र की तेज लहरों से ऐसा लग रहा था जैसे वह इस घटना से दुखी होकर मानो प्रलय मचाने वाला है। पर जामनगर के राजा ने जो किया उसके लिए उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा। आज वह स्कूल सैनिक स्कूल के नाम से मशहूर है भारत के सभी सैनिक स्कूलों में बालाचढी के इस सैनिक स्कूल को सबसे अधिक धनी माना जाता है। वे बच्चे आज भी इस स्कूल को अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा मानते हैं। स्कूल के मुख्य गेट पर लगा ममतामयी स्टेचू और उस पर लिखे शब्द इस बात की गवाही देते हैं कि वे बच्चे इस भूमि से कितना अटैच हैं। इस जगह स्थित यह स्कूल सिर्फ स्कूल नहीं है बल्कि मेहमाननवाजी का मिसाल है। अगर कभी मौका मिले तो यहां आकर देखियेगा पता चलेगा कि शांति किसे कहते हैं और शांति की खोज कैसे की जाती है। यहां दिखने वाले हर आदमी से बात करने का मन करता है क्योंकि वहां लोग हैं ही नहीं।
सोमवार, 31 अगस्त 2009
......और मैम चली गईं
अरे नालायकों जल्दी आ जाओ देखो टीवी पर कौन आ रहा है, आज की खबर सुन तो बाद में काम आएंगी देश विदेश में क्या हो रहा है तुम सबको जानना चाहिए। ये घुडकी आज की नहीं बल्कि 12-15 साल पुरानी है। इसे हमारे पिता जी प्रयोग दिया करते थे। उस समय की यह घटना मुझे आज इसलिए याद आ गई क्योंकि आज जो घटा शायद इतना बडा मेरे सामने अब न घटे। मैंने दो माह पहले हिंदुस्तान ज्वाइन किया था। मेरा साक्षात्कार म्रिणाल मैम ने लिया था। जब मेरा उनसे सामना हुआ तो मैं बहुत खुश हुआ क्योंकि जिन लाइनों का जिक्र मैंने उपर किया उसकी वजह मैम थीं। वे दूरदर्शन पर समाचार पढती थीं। मेरे चाचा की शादी में एक अप्ट्रान टीवी मिला था। वह टीवी बैट्री से चलती थी जिसे हम अपने गांव से पांच किलोमीटर दूर चार्ज कराने ले जाते थे। म्रिणाल पांडे मैम को मेरा पूरा गांव जानता था क्योंकि सब इकट्रठा होकर समाचार सुनते थे। पर आज जो हुआ उसकी उम्मीद किसी को नहीं थी मैम ने संस्थान को हमेशा के लिए छोड दिया। सैकडों लोग दुखी मन से उन्हें विदा कर रहे थे मैं भी उत्सुकता भरी नजरों से उन्हें देख रहा था तथा उनकी मधुर आवाज से निकल रहे विदाई संदेश को सुनता जा रहा था। मैम के साथ मुझे काम करने का अधिक मौका नहीं मिला पर वे मेरे लिए किसी आदर्श से कम नहीं थीं क्योंकि मैंने उन्हें देखकर अपना बचपन बिताया था इसलिए उन्हें अचानक जाते देख थोडी निराशा हुई। पर एक खुशी इस बात की थी कि चलो जिसके साथ अमर उजाला में रहकर काम सीखा था अब वे नए बिग बॉस के रूप में हमारे संस्थान में आ चुके हैं। पर हिंदी मीडिया की इस बडी घटना का गवाह बनना भी मेरे लिए किसी गर्व से कम नहीं था। हो सकता है कि बहुत से लोग मेरी बातों से सहमत न हों कि मैंने मैम की अच्छाई बताई है पर मैं अपनी जगह सही हूं क्योंकि मैंने मैम के साथ सिर्फ दो महीने ही काम किया इसलिए इतने कम समय में किसी को बुरा कहना उसके साथ नाइंसाफी होगी। वैसे भी हर आदमी हर किसी के लिए बुरा नहीं होता। यह सच्चाई है। बुरा मानोगे तो पूरी दुनिया बुरी अच्छा समझोगे तो हर कोई अच्छा। पर मैं सच में मैडम का इस बात के लिए आभारी हूं कि उन्होंने मुझे अपने साथ पूरे दो महीने काम करने का अवसर दिया।
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और वो चली गईं
शनिवार, 29 अगस्त 2009
पारंपरिक योग से हास्य योग तक बाबा का सफर

आज घर पहुंचा तो टीवी पर मां रजत शर्मा का आपकी अदालत देख रही थीं। कार्यक्रम में बाबा रामदेव संभावना सेठ और कश्मीरा के साथ योग को साबित करने में जुटे हुए थे। चरित्र के पवित्रता पर वे लगातार बोले जा रहे थे। वहीं संभावना और कश्मीरा अपनी बातों से बाबा के धर्म को डिगाने की कोशिश कर रही थीं। बाबा की हरकतों को देखकर ऐसा लगा जैसे अब बाबा रामदेव धर्म समाज के लालू यादव बनते जा रहे हैं। अब उनको देखकर सिर्फ हंसी आती है। एक बात समझ में नहीं आती बाबा रामदेव को ऐसे कार्यक्रमों में आने में इतना मजा क्यों आता है? मैंने इतने पुराण और शास्त्रों के बारे में पढा है पर किसी भी योगी को लडकियों में इतनी दिलचस्पी लेते नहीं देखा। आजकल बाबा जी मीडिया में छाए हुए हैं क्योंकि वे लडकियों की बातें करते हैं हीरोइनों को सभ्यता सिखा रहे हैं। पर बाबा में तो एक बात है अकेले अपने दम पर बाबा ने बॉलीवुड की दो बडबोली अभिनेत्रियों का मुंह बंद कर दिया। पर कुल मिलाकर बाबा जी ऐसा लग रहा है कि लालू यादव की जगह पूरी करने के लिए हास्य योग का सहारा ले रहे हैं। कांग्रेस ने तो लालू ने किनारा कर ही लिया क्योंकि जनता ने उन्हें समर्थन नहीं दिया। इसलिए इस खाली जगह को भरने के लिए बाबा रामदेव ने बीडा उठाया और ऐसा लगता है बाबा जी ने आसानी से हठ योग से हास्य योग तक का सफर तय कर लिया है। पर कुछ भी हो बाबा की बातों में लोगों को मल्लिका शेरावत के कम कपडों मे लगाए गए ठुमके से अधिक आनंद आता है। क्योंकि बाबा जी पूरे कपडे पहनकर जो बातें करते हैं उसमें से झलकने वाली अश्लीलता का रस मीडिया को भी अच्छा लगता है जनता को भी। अब अगर बाबा बाबा हैं तो उन्हें संभावना और कश्मीरा से बहस करने की क्या जरूरत है। बाबा जी मैं तो आपसे कहता हूं कि अब लोगों को योगा सिखाने के बजाय सेक्स शिक्षा पर ध्यान देना शुरू कर दीजिए क्योंकि भारत सरकार इस पर करोडों रुपये खर्च कर देती है।
बुधवार, 26 अगस्त 2009
उन इशारों ने जीत लिया दिल
अभी कुछ दिन पहले मैं गुजरात गया। वहां पर मेरे साथ एक ऐसा वाकया हुआ जिसे मैं जिंदगी भर नहीं भूल पाउंगा। मैं दिल्ली पोरबंदर से जामनगर 10 बजकर 30 मिनट पर पहुंचा। जामनगर से मुझे बालाचढी जाना था। बालाचढी जामनगर से 35 किलोमीटर दूर है वहां पर मेरे भैया सैनिक स्कूल में शिक्षक हैं। बस के अलावा वहां तक पहुंचने के बहुत कठिन साधन हैं अगर आपके पास अपनी गाडी नहीं है तो। मैं रेलवे स्टेशन से सीधे जामनगर के एसटी गया जहां से मुझे बालाचढी के लिए बस मिलती। वहां जाकर मैंने बस का पता किया तो पता चला कि बस 12 बजकर 30 मिनट पर जाएगी। मेरे पास एक घंटा इंतजार करने के सिवा और कोई चारा नहीं था। मैंने लोगों की भीड में एक जगह खोज निकाली। सारी एनाउंसमेंट गुजराती में हो रही थी इसलिए मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। एक घंटे में दो दर्जन से भी अधिक बसें अपने मुसापिफरों को लेकर चली गईं इसके बावजूद मेरी बस नहीं आई। एक घंटा बीत जाने के बाद मैंने काउंटर पर जाकर पूछा भाई बस कब आएगी। उस बंदे ने बडी अभद्रता के साथ जवाब दिया कि अभी उदघोषणा होगी सुन लेना। मैंने उस बंदे को कहा भाई मुझे गुजराती नहीं आती। इस पर उसे और गुस्सा आ गया उसने कहा तो जाकर गुजराती सीख लो। मैंने उसे झगडा करने के बजाय गांधीगिरी करने की सोची। मैं हर पांच मिनट पर वहां जाता और सिर्फ उसे अपना थोपडा दिखाकर वापस आ जाता। लेकिन उस बंदे का दिल नहीं पसीजा। इतने मैंने सोचा कि क्यों न किसी और की सहायता ली जाए मैंने अपने सामने एक व्यक्ति को बैठा देखा। वह गठीले बदन का एक 35 चालीस साल का व्यक्ति था। उसके चेहरे को देखकर पता चलता था कि वह कितने आत्मविश्वास से लवरेज है। मैंने उससे कहा भैया मेरी थोडी मदद कर दो। उस बंदे को कुछ समझ नहीं आया उसने जेब से एक पेन निकाली और अपना हाथ आगे करके उस पर लिखने का इशारा किया। साथ में अपने हाथों के इशारों से बताया कि वह न तो बोल सकता है न ही सुन सकता है। उससे पेन लेते हुए मैं चौंका कि क्या यह हिंदी जानता है, पर मेरी इस हैरानी का समाधान दो मिनट में हो गया उससे मैंने जो लिखकर पूछा था उसने उसका जवाब लिखकर दिया। उसने जाकर इशारे से मेरे लिए यह भी पता कर लिया कि आखिर बस अब तक क्यों नहीं आई। बस दो घंटे लेट थी क्योंकि वह रास्ते में खराब हो गई थी और वहां से कोई दूसरी बस नहीं थी। उस दौरान उस व्यक्ति से मैंने साक्षात्कार किया और पता लगाया कि वह क्या करता है। इस वार्तालाप को पूरा करने के लिए मैंने अपनी रेलेवे ई टिकट का इस्तेमाल किया। इस दौरान उसने अपनी बीवी से मुझे मिलाया वह भी न तो बोल सकती थी न सुन सकती थी। उसके दो बच्चे पास में ही खेल रहे थे वे बोलना जानते थे और सुनते भी थे पर वे बोलने से अधिक इशारे से बात कर रहे थे क्योंकि अपने मम्मी पापा से सिर्फ वे इशारे से ही बात करते हैं। क्योंकि अभी वे छोटे थे इसलिए अपने पापा का लिखा भी नहीं समझते थे। बस इशारे से ही उनके मम्मी पापा उन पर अपना प्यार उडेलते थे डांटते थे और दुलारते थे। उसने बताया कि वह पेशे से पेंटर है थोडे दिन पहले दिल्ली भी होकर गया था। उसके तीन भाई हैं सब अलग अलग काम करते हैं। मम्मी पापा भगवान को प्यारे हो चुके हैं तथा उसका नाम दिनेश था। इस तरह से उससे बातें करते हुए मेरा सारा समय बीत गया और उसने मुझे कहा कि मैं उसे अपना पता दे दूं तो वह मुझे चिट्ठी लिखेगा। मैंने उसे अपना पता दिया है अगर उसकी चिटठी आई तो उसे यहां जरूर लिखूंगा। थोडी देर में मेरी बस आई उसने मेरा बैग बस तक पहुंचाया और तब तक वह और उसके बच्चे हाथ हिलाते रहे जब तक कि मेरी बस उनको दिखती रही। अरे अरे रुको मैं तो भूल ही गया यह बताना कि वे वहां कर क्या रहे थे। दिनेश् अपनी किसी रिश्तेदारी में जा रहा था उसकी बस और देर से आ रही थी। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जो लोग सुन नहीं पाते बोल नहीं पाते देख नहीं पाते भगवान उनको भी लोगों से कम्यूनिकेट करने का तरीका देता है। यह मेरे जीवन का ऐसा वाकया है जो दिल को छू गया।
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