गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012
बारों में सुने जा सकते हैं भजन के बोल, कोशिश करके तो देखो
शुक्रवार, 18 मई 2012
शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012
हमारी दमन यात्रा लेकिन दीव यहाँ से दूर है
एकदिन बस हम यूँ ही घर में बैठे हुए थे बस ख्याल आया कि क्यों न ऐसी जगह की सैर की जाए जहॉं के बारे में मैंने सिर्फ 9वीं और 10वीं क्लास में भूगोल की किताब में पढा था। दमन दीव यानी कि हमारे देश का केंद्र शासित प्रदेश। इस प्रदेश की आबादी उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर फैजाबाद से भी कम होगी। मैं और मेरी पत्नी ने फैसला किया कि इस जगह हम अकेले नहीं जाऍंगे बल्कि पूरे परिवार के साथ जाऍंगे। बस क्या था हमने अयोध्या फोन किया और अपने चाचा-चाची और उनके दो बच्चों को मुंबई आने का आमंत्रण दिया।
एक महीने बाद एक ऐसी सुबह आई जब हमारी यात्रा का आरंभ टाटा आरिया में हुआ। यह गाडी मैं स्वयं ड्राइव कर रहा था। मेरे घर से यानी कि कांदीवली से दमन की दूरी लगभग 180 किलोमीटर थी। अमदाबाद हाइवे से होते हुए हमें वापी नाम की जगह से बाएं टर्न लेकर इस जगह पहुँचना था। वापी से दमन की दूरी सिर्फ 10 किलोमीटर है।
अब सवाल उठता है कि दमन में देखने लायक क्या है। आपको बता दें कि इस प्रदेश में हमने प्रवेश गलत रास्ते से किया इस वजह से टूटे-फूटे रास्तों ने हमें चौंका दिया और ऐसा प्रतीत हुआ कि बस हमारा वीकेंड चौपट हो गया। यहॉं पर मेरे मामा के बेटे रहते हैं तो हम सबने सबसे पहले उनके घर जाने का फैसला। इसके बाद हम सब साथ में दमन की यात्रा पर निकले।
सबसे पहले आपको बता दूँ कि दमन और दीव एक ही जगह जैसे सुनने में लगते हैं लेकिन दमन और दीव में समंदर बाधा डाले हुए इसलिए आप जब दमन जाऍंगे तो दमन के ही होकर रह जाएँगे। अब मुझसे मत पूछिएगा कि आखिर दीव कैसे जाते हैं। क्योंकि जब यह सवाल मैंने एक लोग से पूछा तो उन्होंने बताया कि अगर आप इस गाडी से वहॉं जाना चाहते हो फिर अहमदाबाद से यहॉं एक रास्ता जाता है इसका मतलब अगर मैं दमन से दीव जाना चाहता तो फिर एक हजार किलोमीटर गाडी चलानी पडती। इसलिए मैंने अपने पूरे परिवार को सिर्फ दमन में ही दीव की छवि निहारने के लिए कहा।
अब बात दमन की जो जगहें हमने यहॉं घूमी। यशोदा बीच यहॉं का सबसे खूबसूरत बीच है। दमन शहर से यहॉं की दूरी लगभग 8 किलोमीटर है। यहॉं पर हमने दो किले और दो बडे बीच देखे। इन बीचों की खूबसूरती ने सबका मन मोह लिया। मुंबई से यात्रा के दौरान पडने वाले द्रष्यों ने सबका मन मोह लिया।
लेकिन अविरल और अभिनव की गाडी में हालत खराब थी और वे दोनों एक्जॉस्ट हो रहे थे। किसी तरह से हम मुंबई लौटे और फिर आगे की यात्रा का प्रबंध किया जो कि मुंबई की थी। इस यात्रा को हम आपके सामने तस्वीरों के जरिए पेश कर रहे हैं।
रविवार, 24 अक्टूबर 2010
शनिवार, 28 अगस्त 2010
कानून का मुजरिम नहीं हीरो डाकू कहिए जनाब
पहले खलनायक की तरह किडनैप किया इसके बाद फिरौती ली और उस व्यक्ति की पत्नी को कुछ गहने गिफ्ट देकर उसे छोड़ दिया जिससे एक डाकू हीरो बन गया। इसमें मुझे जो सबसे अच्छा लगा वह यह कि भले ही सरकार गरीबों के लिए कोई आरक्षण देने को न तैयार हो लेकिन ये डकैत गरीबों की पूजा करते हैं इसीलिए वे फिरौती के लिए किसी ऐसे व्यक्ति का अपहरण करते हैं जो गरीबी रेखा से ऊपर रह रहे हैं।
चलो भगवान ने गरीबों को पैसा नहीं दिया तो अच्छा ही किया कम से कम वे इस पाप की दुनिया में सलामत तो हैं। जिसके पास बहुत सारा धन है वह इस गम से मरा जा रहा है कि कहीं कोई उसका किडनैप न कर ले। मैं तो उस दिन का इंतजार कर रहा हूं जब कोई समाचार चैनल उस डकैत तक पहुंचकर उसका इंटरव्यू लेगा और यह सवाल करेगा कि डाकू सर आखिर आप ऐसा क्यूं करते हैं? इस पर डाकू का वही पुराना जवाब होगा कि मेरे साथ किसी जमींदार ने इस तरह से ज्यादती की उसी का बदला लेने के लिए मैंने हथियार उठाया है।
अब तो टीवी के हास्य शो में भी डकैतों की इन बातों को पेश करके लोगों को हंसाया जा रहा है। एक दिन मैंने टीवी पर देखा कि एक हास्य कलाकार कह रहा था कि इन ठाकुरों और जमींदारों के जुल्मों तले पिसकर चुड़ैलों और डाकुओं का जन्म होता है। जिस तरह से डाकू समाज के लोग आजकल फिरौती की रकम बारगेन कर रहे हैं उस पर आधुनिक बाजार की प्रतिस्पर्धा नजर आती है।
हो सकता है आने वाले दिनों में डाकू एक साथ एक परिवार के दो लोगों का अपहरण करके एक के साथ एक फ्री का ऑफर भी देने लगें। एक की फिरौती दीजिए दूसरे को हम वैसे ही छोड़ देंगे। अगर कानून व्यवस्था का हाल यही रहा तो ऐसा भी होने लगेगा। यही नहीं कुछ दिन बाद डाकू समाज के लोग भी आरक्षण के नाम पर धरना प्रदर्शन करते भी दिखाई दे सकते हैं। एक बहादुर महिला की खबर सबने पढी और उसकी बहादुरी पर नाज किया लेकिन अब तक कोई ऐसा कदम नहीं उठाया गया जिससे हीरो बनने के कगार पर खड़े डाकू भाई साहब पर कानून का शिकंजा कसा जा सके। बस यही हमारे देश की विडंबना है।
अमित द्विवेदी/ /युवा जंक्शन
सोमवार, 23 अगस्त 2010
बुधवार, 18 अगस्त 2010
मंगलवार, 10 अगस्त 2010
खास आदमियों की भीड़ में खोते आम लोग
डॉक्टरों के कमरे के सामने लगी लाईनें जस की तस पड़ी थीं पर खास लोग बिना किसी रोक-टोक के मस्ती से इलाज करवाकर जा रहे थे। उन खास लोगों में कुछ डाक्टरों के खास थे तो कुछ सफदरजंग हॉस्पिटल के लोगों के खास। किसी तरह से मेरा नंबर आम आदमी के तौर पर आया मेरे सामने एक महिला खड़ी थी उस महिला को देखकर मुंशी प्रेमचंद की कहानियों के कुछ पात्र आंखों के सामने आ गए। उम्र सिर्फ 30 साल की थी पर काया 60 वर्ष की लग रही थी।
डॉक्टर के पास वह अपना कान दिखाने आई थी। मुंह में मास्क बांधे डॉक्टर महोदया ने उसका सत्कार कुछ यूं किया। तुम फिर आ गईं? अभी तुम्हारा कान ठीक नहीं हुआ? तुम्हें देखते-देखते तो मैं खुद बीमार हो जाऊंगी। एक काम करो रूम नंबर 4** में जाओ वहां डॉक्टर खन्ना से मिलो। इतने शब्दों का इलाज के रूप में प्रसाद पाकर वह महिला चली गई। अब मेरा नंबर था? शक्ल और कपड़ों से थोड़ा ठीक-ठाक दिख रहा था। तो मैडम ने स्टूल खिसकाकर बैठने का इशारा किया। मैंने कहा मैडम गला ठीक नहीं हो रहा बहुत परेशान हूं। चार मिनट में मैडम ने दो सप्ताह की दवा लिखकर दे दी और इस कोर्स को पूरा करके एक बार फिर आना। डॉक्टर को धन्यबाद देकर मैं बाहर निकला।
घर चलने के लिए जैसे ही लिफ्ट के पास पहुंचा उस महिला से मेरी मुलाकात हो गई। मैंने उससे पूछा हो गया आपका इलाज तो उसने जवाब दिया कि अगले महीने की डेट दी है। मैंने उससे पूछा कि आप कहां रहते हो? तो जवाब मिला इटावा जिले के रहने वाले हैं और दो दिन से शनिवार का इंतजार कर रहे थे जिससे रूम नंबर 460 के डॉक्टर से मुलाकात हो जाए। यह सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मन में आया कि डॉक्टर से जाकर अभी लड़ पड़ूं फिर सोचा मैं भी तो आम आदमी हूं उसी लाईन से गुजरकर 4 घंटे में बाहर आया हूं।
मैं नहीं कहता कि सभी लाईनें खत्म हो जाएं या फिर बीमारों को डॉक्टर भगवान की तरह पूजें। पर मन करता है कि सबको एक बेसिक रेसपेक्ट तो दिया ही जा सकता है। आम आदमी को एक इंसान की तरह इज्जत देकर उनका मान खास की तुलना में कुछ तो बढ़ाया ही जा सकता है। माना एक डॉक्टर सरकारी अस्पताल में ढेर सारे मरीज देखता है पर कुछ भी क्यों न हो उनका फर्ज बनता है कि वे किसी के साथ अभद्रता से पेश न आएं।
फिल्म का हीरो नहीं हूं सो व्यवस्था को एक पल में बदल नहीं सकता। सरकार नहीं हूं कि कोई पुख्ता व्यवस्था कर सकूं। पर इससे ऊपर एक आम आदमी हूं जो एक आम आदमी का दर्द समझता है। सबकुछ कैसे बदलेगा मैं नहीं जानता पर हर किसी से एक इंसान को बेसिक रेसपेक्ट देने की उम्मीद रखता हूं।
रविवार, 8 अगस्त 2010
रविवार, 1 अगस्त 2010
सोमवार, 10 मई 2010
रविवार, 2 मई 2010
बुधवार, 17 मार्च 2010
शनिवार, 13 मार्च 2010
गुरुवार, 11 मार्च 2010
बुधवार, 17 फ़रवरी 2010
बुधवार, 3 फ़रवरी 2010
और यूं बीत गया महाकुंभ
शो तो था गाड़ियों का पर लड़कियों को यहां पर गाड़ियों से अधिक खूबसूरत बनाकर पेश किया गया। पूरे बीस लाख लोग जिस शो को देखने आए और कहा गया कि यह दुनिया का सबसे बड़ा ऑटो शो साबित हुआ। पर सच में इस शो में गाड़ियों से अधिक लोगों ने उन मॉडलों के किए जो बॉडी शूट में गाड़ियों की खूबसूरती फीका करने का सफल प्रयास कर रही थीं।
10 जनवरी को इस ऑटो शो में दिल्ली पुलिस की धमाकेदार एंट्री हुई परिणामस्वरूप पुलिसवालों ने इस ऑटो शो के कल्चरल शो को बंद करवा दिया। कारण ये था कि कम कपड़े में लड़कियों को नाचता देख जनता बेकाबू हो गई। शो बंद होते ही कंपनी वालों के साथ-साथ आयोजकों की भौहें भी तनीं पर सुरक्षा के लिहाज से इस शो में पुलिस का शो सबसे शानदार रहा। न आयोजकों की चली न कंपनी की विजिटर निराश थे क्योंकि उनकी मेहनत की कमाई पुलिसिया सख्ती की भेंट चढ़ गई।
अरे सबसे अच्छी बात तो तब हुई जब 9 बार के मोटरसाइकिल रेस चैंपियन वोलेंटोनी रॉसी जो कि यमाहा के ब्रांड अंबेस्डर हैं उनको कंपनी ने पहली बार भारत बुलाया। उनका स्वागत दिल्ली के थकाते ट्रैफिक में हुआ, बेचारे किसी तरह से प्रगति मैदान पहुंचे तो वहां पर पहुंचते ही जैसे लोगों को परिचय मिला बस क्या था यमाहा के पवेलियन में ऐसा धमाका हुआ जिससे इस चैंपियन के होश उड़ गए और महोदय किसी तरह से कुछ बाउंसर की मदद से बाहर आने में सफल रहे। पर यमाहा ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और आनन फानन में जॉन और रॉसी की प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करवाई। मुझे भी रॉसी से दो चार बातें करने का मौका मिला। पर जो रॉसी ने कहा उसे सुनकर आपका दिल भी पसीज जाएगा। रॉसी का कहना था कि यहां पर सिर्फ बाइक से ही चला जा सकता है क्योंकि दिल्ली में तो कारें रेंगती हैं। ये रॉसी का दर्द था जिसे उन्होंने बिना रेस भरे कम शब्दों में कह दिया।
युवाओं की नगरी में बड़ी गाड़ियों के उन शौकीनों का ख्वाब पूरा हुआ जो सिर्फ ऑडी, बीएमडब्लू या फिर अन्य महंगी कारें देखना चाहते थे। पर कुछ का ख्वाब टूटा भी क्योंकि वे दो साल में एक बार आने वाले इस महाकुंभ के दरवाजे पर दस्तक देने तो पहुंचे, पर अंदर जाने के लिए न उन्हें टिकट मिला न ही किसी पास का इंतजाम हो सका। देखते-देखते शो खत्म हुआ यातायात बहाल हुआ, बहुत से लोगों ने दुआ मांगी की भगवान गाड़ियां सिर्फ शो में ही सिमट जाएं तो अच्छा होता क्योंकि अगर ये सड़क पर आईं तो इन सड़कों का क्या होगा।































