गुरुवार, 21 मार्च 2013










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गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

बारों में सुने जा सकते हैं भजन के बोल, कोशिश करके तो देखो



मुंबई से मेरा संबंध बहुत पुराना नहीं है लेकिन यदाकद मैं दो साल पहले तक यहॉं आया करता था और घूमकर वापस चला जाता था। लेकिन मेरे जिंदगी के उतार-चढावों ने मुझे पूरी तरह से इस शहर का बना दिया। मुझे 2010 में पुणे में एक बडी कंपनी में नौकरी मिली और मैं वहॉं शिफट हो गया। लेकिन कहते हैं न कि रिश्‍ते उपर वाला बनाता है इसलिए मेरा एक साल के अंदर मायानगरी से नाता जुड गया क्‍योंकि मेरा दफतर पूरी तरह से मुंबई शिफट हो गया। मेरा काम था गाडियों का परीक्षण करना व उनका रिव्‍यू लिखना इसलिए मुझे पत्रकारिता के मूल रूप से कोई मतलब नहीं रह गया। अखबारों से कोई खास लगाव नहीं रहा और न ही न्‍यूज चैनलों की भ्रामक खबरें अपनी ओर लुभा पा रही थीं।
      मुंबई, पूना, नासिक, गोवा, औरंगाबाद जैसे शहर मेरे लिए नोएडा-दिल्‍ली का सफर बनकर रह गया था। सपने सिर्फ गाडियों के आते थे और जब मैं जगता था तो बस अपने को उनमें ही पाता था। लेकिन अचानक एकदिन मन ने कुछ बदलाव की इच्‍छा जाहिर की। एक बार मेरा मन फिर उस हार्डकोर पत्रकारिता की ओर खिंचा जिसे मैंने अपनी डिक्‍शनरी में मूर्खता के पर्यायवाची के रूप में मार्क कर दिया है। लेकिन मैं वहॉं नौकरी करने की इच्‍छा लेकर आगे नहीं बढा था बल्कि उसका मैं अहसास करना चाहता था।
      तीन दिन पहले मुझे एक संपन्‍न व्‍यक्ति के माध्‍यम से एक ऐसी जगह जाने का मौका मिला जहॉं अब न तो मैं गया था और न ही मेरे खानदान में किसी ने उसका अनुभव लिया था। दिल्‍ली से आए मेरे एक दोस्‍त की जान-पहचान से मैं मुंबई के एक बार में गया(आपकी जानकारी के लिए बता दूँ मुझे नहीं पता था कि मैं कहॉं जा रहा हूँ, बस मैं उनका अनोखा मेहमान था और उनके कहने पर कहीं जा रहा था)
      रात के साढे ग्‍यारह बजे मुंबई के सीलिंक की लाइटें पँक्तिबद्व होकर ऐसे चमक रही थीं मानो अभी अभी मुंबई पर जवानी चढी हो। मेरे लिए यह जगह एकदम नई लग रही थी जबकि मैं पूरे दिन में यहॉं से कम से कम पॉंच बार गुजरता हूँ। लेकिन बीएमडब्‍ल्‍यू 5 सीरीज में बैठकर पहली बार मैं इस रास्‍ते से गुजरा था और यह बताना खास हो जाता है कि पहली बार मैं मुंबई में सीलिंक गुजर रहा था जब गाडी मेरे अलावा कोई और चला रहा था।
      मेरे मेजबान ने अपने गाडी के अनुभव को बताते हुए कहा,''ऐसी गा‍डियों को चलाने का मजा रात में ही आता है।'' सीलिंक पर पैसा देने के बाद हम उस ओर बढे जो हमारी मंजिल थी पर वह मंजिल क्‍या थी वह मुझे पता नहीं था। सीलिंक खत्‍म होने के तीन किलोमीटर बाद हम एक ऐसी जगह रुके जहॉं पूरी तरह से सन्‍नाटा पसरा था। और ऐसा लग रहा था जैसे अंदर कुछ हो ही नहीं रहा। यह जगह इतनी शॉंत थी कि मैं अपनी गाडी के हल्‍के एक्‍जॉस्‍ट नोट को बंद शीशे के अंदर महसूस कर सकता था। वहॉं पहुँचते ही मेरे मेजबान ने अपनी गाडी की चाभी ड्राइवर को दी हम तीन लोग बाहर निकले। दरबान ने एक दरवाजा खोला हम अंदर पहुँच गए।
      हम अपने मेजबान को फॉलो करते हुए आगे बढे तभी एक बेटर टाइप के व्‍यक्ति ने जिसने काले रंग का कोट और काले जूते पहनकर रखे थे तथा उसकी भरी हुई मूछें थी उसने हमें रोका। हमारे रुकते ही उसने कहा सर यहॉं बंद है आप उपर चले जाइए, हम भला आपको कैसे रोक सकते हैं।
      उस बेटर पर थोडी बेरुखी दिखाते हुए हमारे मेजबान ने कहा,''तुम हमें रोक भी नहीं सकते हो।'' हमने 9 सीढियॉं चढीं और एक दरवाजा हमारे स्‍वागत में खुला, और जैसे ही यह दरवाजा खुला पूरे सन्‍नाटे में एक ऐसा शोर घुल गया जिसकी हमने उम्‍मीद नहीं की थी। हम एक गोलाकार हॉल में पहुँचे, जिसके चारों ओर सोफे लगे थे और उसके सामने टेबल लगी थी, एक किनारे चार सिंगर अपना डेरा जमाए हुए थे और बारी-बारी से अपनी पेशकश दे रहे थे। इस हॉल के बीच में 9 लडकियॉं खडी थीं जिन्‍होंने साडी पहन रखी थी उनके ओपन ब्‍लाउज से उनकी हॉटनेस दिख रही थी। कोई डॉंस नहीं कर रहा था, क्‍योंकि इस बदनाम जगह पर कानून के नियमों का अनुसरण किया जा रहा था(मुंबई में बार में डांस पर प्रतिबंध है, इसलिए एक बार में सिर्फ गाना गाया जा सकता है और तीन लडकियॉं सिंगर के तौर पर तीन बेटर के तौर पर बार में मौजूद रह सकती हैं, अब मैं यहॉं यह स्‍पष्‍ट करने नहीं जा रहा कि यहॉं पर किस तरह से कानून का उल्‍लंघन हो रहा था)
      यहॉं बैठे हुए लोगों को जब मैंने ध्‍यान से देखा तो उसमें कई चेहरों को मैंने कई टीवी चैनलों पर किसी न किसी विशेषज्ञ के रूप में देख रखा था। यहॉं पर तकरीबन 40 लोग थे। हर किसी के सामने बीस रुपये के नई नोटों का पहाड लगा हुआ था। लोग दारु पीते थे और लडकियों को निहारते रहते थे और थोडी थोडी देर के अंतराल पर उनको बुला बुलाकर कुछ पैसे दे रहे थे(20 रुपये वाली नोट की हजार रुपये की गडडी )
      10 मिनट यहॉ बैठकर मुझे यह समझ आ गया था कि यह बारों का आधुनिक रूप है जिसमें डॉंस प्रतिबंधित है लेकिन लडकियॉं नहीं। कानून के नियमों का पालन कैसे किया जाता है इसकी जीती जागती मिसाल मैंने यहॉं देखी। अब मैं अपने को यहॉं पर एक पिछडे वर्ग का महसूस कर रहा था क्‍योंकि मेरे पास यहॉं पर लुटाने के लिए रुपये ही नहीं थे। एक बदनाम जगह पर भी कटेगरी होती है। यहॉं खडी लडकियॉं देखकर थोडी देर तक तो इशारे करती रहीं लेकिन इसके बाद हम उनके लिए उन तुच्‍छ प्राणियों में शामिल हो गए थे जैसे कि मुंशी प्रेमचंद की कहानियों के वो पात्र जो पिछडी जातियों का प्रतिनिधित्‍व करते थे।
      यहॉं पर आया हर कोई जो रंगरेलियॉं मनाने आया था उसे हम पर दया आ रही थी। शायद ऐसा ही वे हमारे लिए सोच रहे थे। लेकिन कहते हैं कि जब तूफान आने से पहले एक अनजाना सन्‍नाटा पसर जाता है। और सबकी प्रतिक्रिया हमारे लिए शायद वही सन्‍नाटा थी। हमारा मेजबान नीचे गया और 10 मिनट बाद वह वापस आया, और वापस लौटकर सिगरेट की कस लेते हुए बोला,''दादा जहॉं भी रहो नंबर वन रहो नहीं तो जिंदगी जीने में मजा नहीं आता।''
      इसके पहले हम कोई प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करते तूफान आ चुका था। हमारे मेजबान के एक इशारे पर हमारे सामने बीस के नोटों की इतनी उँची गडडी लग गई थी जितनी और किसी के सामने नहीं थी। दूसरे इशारे पर हमारे सामने सारे सिंगर आ गए और उन्‍हें हिदायत दी गई कि वह पूरे आधे घंटे तक बार में भजन गाऍं और यह गीत वहीं हमारे सामने खडे होकर गाऍं।
      इसके बाद हम नोट उडा रहे थे, भजन चल रहा था, पूरे बार में भक्ति का संचार हो चुका था, जो बुजुर्ग वहॉं अपनी बेटी की उम्र की लडकियों को विलासिता के लिए ढूंढते हुए आए थे उनकी तालियॉं भी हमें दिख रही थीं। हमारे मेजबान ने पूरे आधे घंटे तक नोटों की बारिश जारी रखी और जब पैसे खत्‍म हुए तो जिस म‍हफिल में हम दलित थे उसके हम राजा बन चुके थे फर्क बस इतना था कि हमने लडकियों को एक पैसा नहीं दिया और इसके बावजूद पूरी महफिल लूट ली।
      हमारे मेजबान ने एक बदनाम जगह पर जाकर जो नाम किया वह भले ही और लोगों के समझ में न आया हो लेकिन उसकी यह अदा मुझे बहुत मजेदार लगी। आधे घंटे बाद जब भजन खत्‍म हुआ और हमारे हाथ पैसे उडाकर थक गए तो हम बाहर निकले और अपनी बीएमडब्‍ल्‍यू में बैठकर घर की राह पकडी।
      मैं एक बार से होकर लौट रहा था लेकिन मैंने वहॉं के नेचर के विपरीत कुछ किया था, दारू की जगह मैंने कोक पी, लडकियों की विलासिता छोडकर भजन में सराबोर हुआ। लेकिन आज मुझे एक बात समझ में आ गई इस दुनिया में जिंदगी का मजा सिर्फ दो ही लोग ले सकते हैं एक तो वो जिनके पास अपार पैसा है तथा दूसरे वो जिनके पास पैसा नहीं बल्कि दिमाग है।
      मेरा मेजबान किसी हीरो से कम नहीं था क्‍योंकि उसने अपने पैसे फालतू जगह पर उडाने के बजाए एक ऐसी मिसाल पेश की जिसमें जरा सी भी गंदगी शामिल नहीं थी। आप कह सकते हैं कि यह जगह ठीक नहीं थी लेकिन मेरे हिसाब से यही वो जगहें हैं जहॉं पर भजनों की जरूरत है जिससे लोगों को सदबुदिद्व मिले। घर में भजन गाने का क्‍या फायदा जिससे किसी को फायदा न मिले।
चले थे मगरूर होकर मयखाने को
जेब में फूटी कौडी नहीं थी लुटाने को।।
लेकिन लूट ली महफिल उस जमाने से
जो पैसे फेंककर लेते हैं चुस्‍की पयमाने से।।
हमने सीखी म‍हफिलें जमानी उस बेगाने से
जिनसे मिला था चार दिन पहले एक चौराहे पे।।
वैसे हमें कोई जरूरत नहीं है यह बताने की
क्‍या होता है अब मुंबई के मधुशाले में।।
कल जिसे दादा बनने के भेजा था जेलखाने में
आज वह असली दादा बन बैठा है इस जमाने में।।
बंद कर दो अब गाना गाना गूशलखाने में
क्‍योंकि वहॉं से आवाज नहीं जाती इस गुलशियाने में।।
जब देखा नाम कमाकर नाम रोशन न होगा जमाने में
तो जनाब बदनाम हो गए नाम कमाने को अपने ही इलाके में।।



शुक्रवार, 18 मई 2012

My leh to Delhi journey






शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

हमारी दमन यात्रा लेकिन दीव यहाँ से दूर है

शब्‍द अविरल और अभिनव अभिभावक - किशोर कुमार, कौशांबी, अमित और निधि

एकदिन बस हम यूँ ही घर में बैठे हुए थे बस ख्‍याल आया कि क्‍यों न ऐसी जगह की सैर की जाए जहॉं के बारे में मैंने सिर्फ 9वीं और 10वीं क्‍लास में भूगोल की किताब में पढा था। दमन दीव यानी कि हमारे देश का केंद्र शासित प्रदेश। इस प्रदेश की आबादी उत्‍तर प्रदेश के छोटे से शहर फैजाबाद से भी कम होगी। मैं और मेरी पत्‍नी ने फैसला किया कि इस जगह हम अकेले नहीं जाऍंगे ब‍ल्कि पूरे परिवार के साथ जाऍंगे। बस क्‍या था हमने अयोध्‍या फोन किया और अपने चाचा-चाची और उनके दो बच्‍चों को मुंबई आने का आमंत्रण दिया।

एक महीने बाद एक ऐसी सुबह आई जब हमारी यात्रा का आरंभ टाटा आरिया में हुआ। यह गाडी मैं स्‍वयं ड्राइव कर रहा था। मेरे घर से यानी कि कांदीवली से दमन की दूरी लगभग 180 किलोमीटर थी। अमदाबाद हाइवे से होते हुए हमें वापी नाम की जगह से बाएं टर्न लेकर इस जगह पहुँचना था। वापी से दमन की दूरी सिर्फ 10 किलोमीटर है।

अब सवाल उठता है कि दमन में देखने लायक क्‍या है। आपको बता दें कि इस प्रदेश में हमने प्रवेश गलत रास्‍ते से किया इस वजह से टूटे-फूटे रास्‍तों ने हमें चौंका दिया और ऐसा प्रतीत हुआ कि बस हमारा वीकेंड चौपट हो गया। यहॉं पर मेरे मामा के बेटे रहते हैं तो हम सबने सबसे पहले उनके घर जाने का फैसला। इसके बाद हम सब साथ में दमन की यात्रा पर निकले।

सबसे पहले आपको बता दूँ कि दमन और दीव एक ही जगह जैसे सुनने में लगते हैं लेकिन दमन और दीव में समंदर बाधा डाले हुए इसलिए आप जब दमन जाऍंगे तो दमन के ही होकर रह जाएँगे। अब मुझसे मत पूछिएगा कि आखिर दीव कैसे जाते हैं। क्‍योंकि जब यह सवाल मैंने एक लोग से पूछा तो उन्‍होंने बताया कि अगर आप इस गाडी से वहॉं जाना चाहते हो फिर अहमदाबाद से यहॉं एक रास्‍ता जाता है इसका मतलब अगर मैं दमन से दीव जाना चाहता तो फिर एक हजार किलोमीटर गाडी चलानी पडती। इसलिए मैंने अपने पूरे परिवार को सिर्फ दमन में ही दीव की छवि निहारने के लिए कहा।

अब बात दमन की जो जगहें हमने यहॉं घूमी। यशोदा बीच यहॉं का सबसे खूबसूरत बीच है। दमन शहर से यहॉं की दूरी लगभग 8 किलोमीटर है। यहॉं पर हमने दो किले और दो बडे बीच देखे। इन बीचों की खूबसूरती ने सबका मन मोह लिया। मुंबई से यात्रा के दौरान पडने वाले द्रष्‍यों ने सबका मन मोह लिया।

लेकिन अविरल और अभिनव की गाडी में हालत खराब थी और वे दोनों एक्‍जॉस्‍ट हो रहे थे। किसी तरह से हम मुंबई लौटे और फिर आगे की यात्रा का प्रबंध किया जो कि मुंबई की थी। इस यात्रा को हम आपके सामने तस्‍वीरों के जरिए पेश कर रहे हैं।




यह है दमन की देविका बीच। आपको भी कभी मौका मिले तो जरूर आना बहुत मजा आता है यहॉं नहाने में और घोडा गाडी की सवारी करने में।



मेरे मॉं और बाबू जी और हम दोनों टाटा की आरिया के साथ। यही थी हमारी इस यात्रा की साथी जिसमें हम सवार होकर यहॉं तक गए।

नोट- मुंबई की तस्‍वीरें हम अगले पोस्‍ट में डालेंगे। तब तक करिए इंतजार।

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

आना ज़रूर भगवान का काम है

शनिवार, 28 अगस्त 2010

कानून का मुजरिम नहीं हीरो डाकू कहिए जनाब

यहां के पचास-पचास किलोमीटर तक कोई महिला नजर भी नहीं आती और तुम यहां फिरौती लेकर आई हो? ये डायलॉग किसी फिल्म का होता तो अब तक सबकी जुबान पर चढ़ गया होता। लेकिन यह संवाद वास्तविक जिंदगी के घटनाक्रम का है जिसमें डाकू की दयालुता का हर ओर गुणगान तो हो रहा है लेकिन वह मीडिया के पकड़ से बाहर है। एक महिला की बहादुरी पर डाकू साहब की उदारता शायद ही कोई भूल पाएगा। इससे एक बात का पता चलता है कि कोई कितना भी बड़ा क्रूर और खतरनाक क्यूं न हो जाए लेकिन उसके दिल के किसी कोने में उदारता जरूर बसती है।
पहले खलनायक की तरह किडनैप किया इसके बाद फिरौती ली और उस व्यक्ति की पत्नी को कुछ गहने गिफ्ट देकर उसे छोड़ दिया जिससे एक डाकू हीरो बन गया। इसमें मुझे जो सबसे अच्छा लगा वह यह कि भले ही सरकार गरीबों के लिए कोई आरक्षण देने को न तैयार हो लेकिन ये डकैत गरीबों की पूजा करते हैं इसीलिए वे फिरौती के लिए किसी ऐसे व्यक्ति का अपहरण करते हैं जो गरीबी रेखा से ऊपर रह रहे हैं।
चलो भगवान ने गरीबों को पैसा नहीं दिया तो अच्छा ही किया कम से कम वे इस पाप की दुनिया में सलामत तो हैं। जिसके पास बहुत सारा धन है वह इस गम से मरा जा रहा है कि कहीं कोई उसका किडनैप न कर ले। मैं तो उस दिन का इंतजार कर रहा हूं जब कोई समाचार चैनल उस डकैत तक पहुंचकर उसका इंटरव्यू लेगा और यह सवाल करेगा कि डाकू सर आखिर आप ऐसा क्यूं करते हैं? इस पर डाकू का वही पुराना जवाब होगा कि मेरे साथ किसी जमींदार ने इस तरह से ज्यादती की उसी का बदला लेने के लिए मैंने हथियार उठाया है।
अब तो टीवी के हास्य शो में भी डकैतों की इन बातों को पेश करके लोगों को हंसाया जा रहा है। एक दिन मैंने टीवी पर देखा कि एक हास्य कलाकार कह रहा था कि इन ठाकुरों और जमींदारों के जुल्मों तले पिसकर चुड़ैलों और डाकुओं का जन्म होता है। जिस तरह से डाकू समाज के लोग आजकल फिरौती की रकम बारगेन कर रहे हैं उस पर आधुनिक बाजार की प्रतिस्पर्धा नजर आती है।
हो सकता है आने वाले दिनों में डाकू एक साथ एक परिवार के दो लोगों का अपहरण करके एक के साथ एक फ्री का ऑफर भी देने लगें। एक की फिरौती दीजिए दूसरे को हम वैसे ही छोड़ देंगे। अगर कानून व्यवस्था का हाल यही रहा तो ऐसा भी होने लगेगा। यही नहीं कुछ दिन बाद डाकू समाज के लोग भी आरक्षण के नाम पर धरना प्रदर्शन करते भी दिखाई दे सकते हैं। एक बहादुर महिला की खबर सबने पढी और उसकी बहादुरी पर नाज किया लेकिन अब तक कोई ऐसा कदम नहीं उठाया गया जिससे हीरो बनने के कगार पर खड़े डाकू भाई साहब पर कानून का शिकंजा कसा जा सके। बस यही हमारे देश की विडंबना है।
अमित द्विवेदी/ /युवा जंक्शन

सोमवार, 23 अगस्त 2010

rakhi




बुधवार, 18 अगस्त 2010

न्यू

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

खास आदमियों की भीड़ में खोते आम लोग

गले के इंफेक्शन से परेशान मैंने फैसला किया कि इस बार मैं सफदरजंग हॉस्पिटल में इसका उपचार करवाऊंगा। इसी के तहत शनिवार को मैं सफदरजंग पहुंच गया। सबसे पहले लाईन में लगकर दो घंटे में अपना पर्चा बनवाया। पर्चा बनवाकर चौथे महले पर डॉक्टर के कमरे के सामने वाली लाईन का हिस्सा बना जिसमें मेरा नंबर 28वां था। मैंने जब सोचा कि मैं खुद जाकर बिना किसी सोर्स सिफारिश के अपना इलाज करवाऊंगा तो उस समय दिल बहुत खुश हुआ। पर यहां आकर आम आदमी की हालत देखकर मेरे दिल ने बस यही कहा कि भगवान कुछ भी करो पर किसी को आम आदमी मत बनाओ। आम आदमी का तो बुरा हाल है यार!
डॉक्टरों के कमरे के सामने लगी लाईनें जस की तस पड़ी थीं पर खास लोग बिना किसी रोक-टोक के मस्ती से इलाज करवाकर जा रहे थे। उन खास लोगों में कुछ डाक्टरों के खास थे तो कुछ सफदरजंग हॉस्पिटल के लोगों के खास। किसी तरह से मेरा नंबर आम आदमी के तौर पर आया मेरे सामने एक महिला खड़ी थी उस महिला को देखकर मुंशी प्रेमचंद की कहानियों के कुछ पात्र आंखों के सामने आ गए। उम्र सिर्फ 30 साल की थी पर काया 60 वर्ष की लग रही थी।
डॉक्टर के पास वह अपना कान दिखाने आई थी। मुंह में मास्क बांधे डॉक्टर महोदया ने उसका सत्कार कुछ यूं किया। तुम फिर आ गईं? अभी तुम्हारा कान ठीक नहीं हुआ? तुम्हें देखते-देखते तो मैं खुद बीमार हो जाऊंगी। एक काम करो रूम नंबर 4** में जाओ वहां डॉक्टर खन्ना से मिलो। इतने शब्दों का इलाज के रूप में प्रसाद पाकर वह महिला चली गई। अब मेरा नंबर था? शक्ल और कपड़ों से थोड़ा ठीक-ठाक दिख रहा था। तो मैडम ने स्टूल खिसकाकर बैठने का इशारा किया। मैंने कहा मैडम गला ठीक नहीं हो रहा बहुत परेशान हूं। चार मिनट में मैडम ने दो सप्ताह की दवा लिखकर दे दी और इस कोर्स को पूरा करके एक बार फिर आना। डॉक्टर को धन्यबाद देकर मैं बाहर निकला।
घर चलने के लिए जैसे ही लिफ्ट के पास पहुंचा उस महिला से मेरी मुलाकात हो गई। मैंने उससे पूछा हो गया आपका इलाज तो उसने जवाब दिया कि अगले महीने की डेट दी है। मैंने उससे पूछा कि आप कहां रहते हो? तो जवाब मिला इटावा जिले के रहने वाले हैं और दो दिन से शनिवार का इंतजार कर रहे थे जिससे रूम नंबर 460 के डॉक्टर से मुलाकात हो जाए। यह सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मन में आया कि डॉक्टर से जाकर अभी लड़ पड़ूं फिर सोचा मैं भी तो आम आदमी हूं उसी लाईन से गुजरकर 4 घंटे में बाहर आया हूं।
मैं नहीं कहता कि सभी लाईनें खत्म हो जाएं या फिर बीमारों को डॉक्टर भगवान की तरह पूजें। पर मन करता है कि सबको एक बेसिक रेसपेक्ट तो दिया ही जा सकता है। आम आदमी को एक इंसान की तरह इज्जत देकर उनका मान खास की तुलना में कुछ तो बढ़ाया ही जा सकता है। माना एक डॉक्टर सरकारी अस्पताल में ढेर सारे मरीज देखता है पर कुछ भी क्यों न हो उनका फर्ज बनता है कि वे किसी के साथ अभद्रता से पेश न आएं।
फिल्म का हीरो नहीं हूं सो व्यवस्था को एक पल में बदल नहीं सकता। सरकार नहीं हूं कि कोई पुख्ता व्यवस्था कर सकूं। पर इससे ऊपर एक आम आदमी हूं जो एक आम आदमी का दर्द समझता है। सबकुछ कैसे बदलेगा मैं नहीं जानता पर हर किसी से एक इंसान को बेसिक रेसपेक्ट देने की उम्मीद रखता हूं।

रविवार, 8 अगस्त 2010

नयी कार

kakakaka


रविवार, 1 अगस्त 2010

स्मार्ट फ़ोन स्टोरी


सोमवार, 10 मई 2010

मोबाइल

रविवार, 2 मई 2010

वेटिंग लिस्ट

बुधवार, 17 मार्च 2010

मोबाइल से कॉल करना हुआ मुश्किल


शनिवार, 13 मार्च 2010

गुरुवार, 11 मार्च 2010

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

हिंदुस्तान




बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

और यूं बीत गया महाकुंभ

लंबी-लंबी लाइनें, हर ओर चल रहे डांस फरफार्मेंसेस, कहीं बाइक पर स्टंट दिखाते कलाकार तो किसी ओर फिल्मी कलाकारों को देखने के लिए पागल होती भीड़। अरे भाई ये सब कहीं हो नहीं रहा है बल्कि बीत चुका है। मैं ऐसे महाकुंभ की बात कर रहा हूं जो 1986 से देश में छोटे पैमाने पर लगना शुरू हुआ था पर अब वह बिकराल रूप ले चुका है। चलो हो गया अब गैस मत करो मैं खुद बता देता हूं। ये महाकुंभ था ऑटो एक्सपो का, जो दिल्ली के प्रगति मैदान में 5 जनवरी से 11 जनवरी तक चला।
शो तो था गाड़ियों का पर लड़कियों को यहां पर गाड़ियों से अधिक खूबसूरत बनाकर पेश किया गया। पूरे बीस लाख लोग जिस शो को देखने आए और कहा गया कि यह दुनिया का सबसे बड़ा ऑटो शो साबित हुआ। पर सच में इस शो में गाड़ियों से अधिक लोगों ने उन मॉडलों के किए जो बॉडी शूट में गाड़ियों की खूबसूरती फीका करने का सफल प्रयास कर रही थीं।
10 जनवरी को इस ऑटो शो में दिल्ली पुलिस की धमाकेदार एंट्री हुई परिणामस्वरूप पुलिसवालों ने इस ऑटो शो के कल्चरल शो को बंद करवा दिया। कारण ये था कि कम कपड़े में लड़कियों को नाचता देख जनता बेकाबू हो गई। शो बंद होते ही कंपनी वालों के साथ-साथ आयोजकों की भौहें भी तनीं पर सुरक्षा के लिहाज से इस शो में पुलिस का शो सबसे शानदार रहा। न आयोजकों की चली न कंपनी की विजिटर निराश थे क्योंकि उनकी मेहनत की कमाई पुलिसिया सख्ती की भेंट चढ़ गई।
अरे सबसे अच्छी बात तो तब हुई जब 9 बार के मोटरसाइकिल रेस चैंपियन वोलेंटोनी रॉसी जो कि यमाहा के ब्रांड अंबेस्डर हैं उनको कंपनी ने पहली बार भारत बुलाया। उनका स्वागत दिल्ली के थकाते ट्रैफिक में हुआ, बेचारे किसी तरह से प्रगति मैदान पहुंचे तो वहां पर पहुंचते ही जैसे लोगों को परिचय मिला बस क्या था यमाहा के पवेलियन में ऐसा धमाका हुआ जिससे इस चैंपियन के होश उड़ गए और महोदय किसी तरह से कुछ बाउंसर की मदद से बाहर आने में सफल रहे। पर यमाहा ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और आनन फानन में जॉन और रॉसी की प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करवाई। मुझे भी रॉसी से दो चार बातें करने का मौका मिला। पर जो रॉसी ने कहा उसे सुनकर आपका दिल भी पसीज जाएगा। रॉसी का कहना था कि यहां पर सिर्फ बाइक से ही चला जा सकता है क्योंकि दिल्ली में तो कारें रेंगती हैं। ये रॉसी का दर्द था जिसे उन्होंने बिना रेस भरे कम शब्दों में कह दिया।
युवाओं की नगरी में बड़ी गाड़ियों के उन शौकीनों का ख्वाब पूरा हुआ जो सिर्फ ऑडी, बीएमडब्लू या फिर अन्य महंगी कारें देखना चाहते थे। पर कुछ का ख्वाब टूटा भी क्योंकि वे दो साल में एक बार आने वाले इस महाकुंभ के दरवाजे पर दस्तक देने तो पहुंचे, पर अंदर जाने के लिए न उन्हें टिकट मिला न ही किसी पास का इंतजाम हो सका। देखते-देखते शो खत्म हुआ यातायात बहाल हुआ, बहुत से लोगों ने दुआ मांगी की भगवान गाड़ियां सिर्फ शो में ही सिमट जाएं तो अच्छा होता क्योंकि अगर ये सड़क पर आईं तो इन सड़कों का क्या होगा।