शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

बूढी होती स्‍वतंत्रता के बदलते मायने

रिमझिम बरसात, बादलों भरा आसमान, खामोशी तोडते देश भक्ति से भरे गीत मुझमें इतना जोश भर रहे हैं जिसका बयान मैं अपनी लेखनी से नहीं कर सकता, इसे सिर्फ मैं महसूस कर रहा हूं। लाल किले पर पीएम का तिरंगा फहराते देखना उनका भाषण सुनना यह मेरे हर 15 अगस्‍त का रुटीन है। पर आज अचानक मुझे ऐसा लगा कि कहीं जिंदगी के गुजरते सालों की तरह हमारी स्‍वतंत्रता भी बूढी तो नहीं होती जा रही है। शहीद मूवी में मनोज कुमार का कोडे खाना, तरह-तरह की यातनाएं सहना देखकर ऐसा लगा जब ये मूवी बनी थी उस समय हमारी स्‍वतंत्रता जवान थी इसीलिए उस समय लोग इसकी कीमत समझते थे। पर समय परिवर्तन के साथ-साथ लोगों की स्‍वतंत्रता सिर्फ भाषणों और कविताओं तक ही सिमट कर रह गई है। आज भी वीर रस के कवि पाकिस्‍तान से प्रेरित होकर देश भक्ति की कविताएं स्‍टेज पर ऐसे पढते हैं जैसे वे दो मिनट में पाकिस्‍तान को अपने शब्‍दों के परमाणु बम से स्‍वाहा कर देंगे। पर ऐसी कविता पढने वाला कोई नहीं दिखा जो अपने देश के अंदर के राक्षस को मिटाने की बात करता हो। अब ज्‍यादा क्‍या कहें जिस देश की मदर टंग को ही बोलने में लोग शर्म महसूस करते हैं वे और अपने देश के हित की क्‍या बात करेंगे। हिंदी की खाने वाले उससे अपना पेट पालने वाले जब अपने ही किसी हिंदी भाई से बात करते हैं तो अंग्रेजी के प्रवाह की ऐसी गंगा बहा देते हैं जैसे हिंदी उनकी कुछ लगती ही न हो। पिछले दिनों हिंदी पर किए गए एक अध्‍ययन को पढ रहा था जिसे देखकर मैं चौंक गया कि हमारी इसी उपेक्षित भाषा से अरबों का बिजनेस पूरी दुनिया में हो रहा है। हमारे अंग्रेजी मूवी स्‍टार भी इसी भाषा की बदौलत अपनी दुकानदारी चला रहे हैं अब भले ही वे हिंदी में बात करना सार्वजनिक रूप से पसंद न करें। यह है हमारे स्‍वतंत्रता की फीकी पडती चमक का एक ज्‍वलंत उदाहरण। अब मैं दूसरे बिंदु पर आता हूं, हमारी युवा पीढी अपने बुजुर्गों का सम्‍मान करना भूलती जा रही है उसे लग रहा है कि उसे कभी बूढा ही नहीं होना है। लाखों की संख्‍या में मां बाप अपने जिंदगी के बचे दिनों को बुजुर्ग आश्रम में बिता रहे हैं क्‍योंकि उनके बच्‍चों के पास उनके लिए समय नहीं है। यह हमारी बूढी होती स्‍वतंत्रता का एक और उदाहरण है। तीसरे उदाहरण के रूप में मैं अपने अपमानित नेताओं का नाम लेना पसंद करुंगा। जिन्‍हें लोगों ने चुनकर एक ओहदा दिया और वे उसका फायदा उठाकर सारे कुकर्म कर रहे हैं। बात चाहे माया की हो या मुलायम की यह सभी प्रतिशोध लेने के लिए तैयार हैं। अपनी मूर्तियों पर नाम के लिए लोगों का पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं। राज्‍य में बिजली की हालत क्‍या है कितने लोग भूखे सो रहे हैं इससे उपर है उनका अपना स्‍वार्थ, जिसे सिद्व करने के लिए वे किसी भी हद तक गिर सकते हैं। इसे देखकर ऐसा आप महसूस कर सकते हैं कि हमारे नेताओं के लिए स्‍वतंत्रता का मतलब क्‍या है। उनके लिए स्‍वतंत्रता का मतलब लोगों का खून चूसकर पैसा जमा करना है जो उनके भी काम नहीं आता उसे भोगने से पहले वे भगवान को प्‍यारे हो जाते हैं। इस तरह से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पहले जब हमारी स्‍वतंत्रता किशोरावस्‍था में थी तो उसके मायने सबके लिए एक थे पर अब सभी के लिए स्‍वतंत्रता के मायने बदल चुके हैं। जिसमें अनुशासन का नाम कहीं भी नही दिखता।

1 टिप्पणी:

अतुल ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है. आज के जमाने का सटीक विवेचन किया है.
अतुल